
योगी आदित्यनाथ, पुष्कर सिंह धामी, देवेंद्र फडणविस और मोहन यादव जैसे बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के नाम जहां इंडिया हेट लैब की 2025 की सूची में दर्ज किए गए हैं, लेकिन इनमें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सर्मा का नाम न होना हैरान करता है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में 2025 के दौरान दर्ज किए गए हेट स्पीच के कुल मामलों के 88 फीसदी मामले बीजेपी शासित राज्यों में हुए हैं, फिर भी असम के मुख्यमंत्री को इससे बाहर रखा गया है।
यह चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि असम के सीएम सर्मा हाल में दावोस में हो रहे विश्व आर्थिक मंच की बैठक से वापस आए हैं। शुक्रवार 23 जनवरी को जब उनसे अपेक्षा थी कि वे इस बैठक के बारे में बात करेंगे, लेकिन उन्होंने तो राज्य में हो रहे मतदाता सूचियों के विशेष परीक्षण का मुद्दा उठाया। बाकी मुख्यमंत्रियों की तरह उन्होंने भी कहा कि यह काम सरकार द्वारा किया जा रहा है। लेकिन मीडिया के साथ बातचीत में उन्होंने जो कुछ कहा, उसे क्या ही कहा जाए:
उन्होंने साफ संकेत दिया कि इस प्रक्रिया को सिर्फ ‘मियां’ (बांग्ला बोलने वाले मुसलमान) को ही नोटिस भेजे जा रहे हैं ताकि उन पर ‘दबाव बनाकर रखा जाए।‘ उन्होंने कहा कि, “एसआईआर को लेकर कोई विवाद नहीं है। किन हिंदुओं को नोटिस दिया गया है? किन असमिया मुसलमानों को नोटिस मिला? नोटिस सिर्फ मियां और ऐसे लोगों को दिया गया है, वर्ना ये लोग तो हमारे सिर पर नाचेंगे।”
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सर्मा ने जोर देकर मीडिया को याद दिलाया कि “इसमें छिपाने वाली कोई बात नहीं है। हम इन लोगों को परेशान करना चाहते हैं।” लेकिन उन्होंने साफ कहा कि वे हमेशा कहते रहे हैं कि उनके शासन में मियां लोग परेशानी में ही रहेंगे। उन्होंने कहा, “उन्हें (मियां लोगों को) समझना होगा कि असम के लोग ‘उनका’ विरोध कर रहे हैं। नहीं तो वे ऐसे ही छूट जाएंगे। इसीलिए कुछ को तो नोटिस भेजा गया है, कुछ लोगों को राज्य छोड़ना होगा, कुछ को सीमापार जाना होगा (यहां वे नागरिकता का इशारा कर रहे थे।)”
सर्मा ने आगे कहा कि “हम तो उत्पात करेंगे, लेकिन कानून के दायरे में रहते हुए....हम गरीब और हाशिए के लोगों के साथ हैं, लेकिन उन्हें हम बरबाद कर देंगे जो हमारी जात (समुदाय) के नहीं हैं।”
जाने-माने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता अमन वदूद ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा है, “जब से मेरे ड्राइवर की मां को नोटिस मिला है, उन्होंने खाना-पानी छोड़ दिया है। वे अकेली ऐसी नहीं हैं। असम के सीएम द्वारा उत्पीड़न और सही प्रक्रिया के उल्लंघन का यह जश्न मनाना, हाल के दिनों में सुनी गई सबसे घिनौनी बात है।"
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पिछले छह महीनों में, हिमंत बिस्वा सरमा ने बार-बार मियां (बंगाली मूल के मुस्लिम) समुदाय को निशाना बनाते हुए भड़काऊ बयान दिए हैं। राज्य में अगले विधानसभा चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं, ऐसे में बिस्वा सरमा लगातार कांग्रेस पर 'मियाओं' के तुष्टिकरण के मुखर आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस नेताओं के इस दावे का ज़िक्र करते हुए कि 126 सदस्यों वाली विधानसभा के लिए कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों से 700 से ज़्यादा आवेदन मिले हैं, बिस्वा सरमा ने मीडिया से कहा कि कांग्रेस को उम्मीदवारों के नामों की लिस्ट जारी करनी चाहिए। इससे उनका यह दावा साबित हो जाएगा कि 700 आवेदकों में से 600 ‘उसी’ समुदाय के थे।
बिस्वा सरमा ने सांप्रदायिक आधार पर चुनाव लड़ने की अपनी योजना को छिपाया नहीं है। हालांकि कानून उन्हें धर्म के नाम पर वोट मांगने से रोकता है, लेकिन दूसरे बीजेपी मुख्यमंत्रियों की तरह, उन पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। दावोस जाने से पहले, उनके हवाले से कहा गया था कि एक 'मियां मुस्लिम' ने उनसे एक बार कहा था कि अगर ज़रूरत पड़ी तो वह उन्हें किडनी दान कर देगा, लेकिन कभी भी उन्हें वोट नहीं देगा।
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2011 में हुई जनगणना के अनुसार, असम में हिंदू आबादी 61.47 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 34.22 प्रतिशत थी। हिमंत बिस्वा सरमा ने बार-बार दावा किया है कि असम में सिर्फ़ तीन प्रतिशत मुस्लिम ही मूल निवासी हैं, जबकि बाकी प्रवासी हैं। उनका यह भी तर्क है कि चूंकि दो जनगणनाओं के बीच 10 साल के गैप में मुस्लिम आबादी पहले लगभग चार प्रतिशत बढ़ी है, इसलिए अब यह 40 प्रतिशत के करीब पहुंच रही होगी।
बिस्वा सरमा जिस बारे में बात नहीं कर रहे हैं, वह है राज्य में असली नागरिकों की पहचान करने के लिए छह साल तक चली कवायद, जिसमें कथित तौर पर मुसलमानों की तुलना में ज़्यादा हिंदू ऐसे निकले जो अपनी वंशावली और नागरिकता के दावे साबित नहीं कर पाए। जबकि बिस्वा सरमा की बयानबाजी मियां समुदाय को बाहरी बताती है और असमिया राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काने की कोशिश करती है, राज्य की मतदाता सूची में बदलाव ने उन्हें मुसलमानों पर निशाना साधने का एक और मौका दे दिया है, जिसे उन्होंने अब सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी लिया है।
हालांकि, चुनाव आयोग ने हिमंत बिस्वा सरमा के इस सार्वजनिक बयान पर चुप्पी साध रखी है कि मुसलमानों को परेशान करने के लिए उन्हें नोटिस दिए जा रहे हैं। कसर बस इतनी ही रह गई है कि असम के सीएम खुलकर यह नहीं कह पाए कि मियां लोगों के 'वोट देने का अधिकार छीनना है', वैसे असली मंशा और मकसद तो यही संकेत देते हैं।
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