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सुखबीर बादल पर हमला क्या पंजाब की सियासत के किसी खतरनाक मोड़ का संकेत है!

पंजाब के लिए असली चिंता अब सिर्फ़ यह नहीं है कि सुखबीर बादल पर किसने हमला किया। बल्कि असली चिंता यह है कि क्या ऐसे हमले राजनीतिक अभिव्यक्ति का नया ज़रिया बनते जा रहे हैं—और क्या शासन-व्यवस्था इस चलन को आम होने से रोक सकता है।

नांदेड़ में हमले के बाद अस्पातल जाते सुखबीर बादल
नांदेड़ में हमले के बाद अस्पातल जाते सुखबीर बादल 

शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल पर महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित एक गुरुद्वारे में हुए हमले ने एक बार फिर पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य की चिंताजनक कमजोरियों को उजागर कर दिया है। पंजाब विधानसभा के लिए अगले साल होने वाले चुनाव से महज कुछ महीने पहले 13 अगस्त को हुई इस घटना में एक व्यक्ति ने जेड प्लस सुरक्षा वाले सुखबीर बादल पर बेहद नजदीक से कृपाण से जानलेवा हमला किया। हमले में बादल बाल-बाल बचे और उनके दाएं हाथ में चोट आई जबकि उनकी सुरक्षा में तैनात एक पुलिस अफसर भी बादल को बचाने की कोशिश में जख्मी हो गया।

हमलावर की पहचान 60 वर्षीय जसपाल सिंह के रूप में हुई है। वह पुणे का रहने वाला है और फिलहाल नांदेड़ में रहकर बीते 2-3 साल से गुरुद्वारे में सेवादार का काम कर रहा है। जसपाल सिंह उच्च शिक्षित है और उसके पास बीकॉम और कानून की डिग्री है। शुरुआती जांत में उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड या किसी क्राइम नेटवर्क से कोई संपर्क सामने नहीं आया है। हमले के वक्त वह निहंग की पोशाक में था और उसने हमले के लिए कृपाण का इस्तेमाल किया।

यहां सवाल यह उठता है कि जसपाल सिंह ने अकेले ही यह हमला किया या फिर वह किसी बड़ी साजिश का भागीदार है। फिलहाल इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। गहन पूछताछ के बाद भी जांच दल अभी तक हमले का मकसद स्थापित नहीं कर पाए हैं। मामले की जांच में नांदेड़ पुलिस के साथ एटीएस की टीम और खुफिया विभाग (आईबी) भी शामिल है, इससे साफ है कि अधिकारी इस मामले को काफी गंभीरता से ले रहे हैं।

यह पहला मौका नहीं है जब बादल पर हमला हुआ है। करीब दो साल पहले 4 दिसंबर, 2024 को, पूर्व उग्रवादी नारायण सिंह चौड़ा ने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के बाहर उन्हें गोली मारने की कोशिश की। उस समय बादल उन पर लगाई गई सज़ा या 'तनख़ाइया’ के तहत धार्मिक सेवा कर रहे थे। सुरक्षाकर्मियों ने गोली चलाने से पहले ही चौड़ा को काबू कर लिया था।

उस हमले के सिलसिले में बाद में हुई कानूनी कार्यवाही भी चर्चा का विषय बनी। मौके पर गिरफ्तार हमलावर चौड़ा पर हत्या की कोशिश और आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था और वह कई महीनों तक न्यायिक हिरासत में रहा। लेकिन 25 मार्च, 2025 को अमृतसर के एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने उसे ज़मानत दे दी। न्यायाधीश ने यह देखते हुए ज़मानत दी कि वह पहले ही कई महीने हिरासत में बिता चुके हैं और मामले की सुनवाई में काफी समय लग सकता है। ज़मानत बॉन्ड और एक-एक लाख रुपये की ज़मानत राशि जमा करने के बाद उन्हें अगले दिन रिहा कर दिया गया।

बादल पर हुए इस दूसरे हमले की सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने निंदा की है। इससे भी अहम बात यह है कि इसने पंजाब की राजनीति में चरमपंथी और हिंसक तत्वों के लिए बढ़ती जगह को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। ध्यान रहे कि जब राजनीतिक मतभेद, धार्मिक शिकायतें और ऐतिहासिक गुस्सा शारीरिक हमलों का रूप लेने लगते हैं, तो इसके नतीजे सिर्फ़ उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते जिसे निशाना बनाया गया हो।

तख्त हजूर साहिब बोर्ड के एडमिनिस्ट्रेटर डॉ. विजय सतबीर सिंह ने इस मामले को और स्पष्ट रूप से सामने रखा है। उन्होंने कहा कि किसी पवित्र धार्मिक स्थल परिसर के भीतर हिंसा की घटनाएं ऐसी जगहों की गरिमा, धार्मिक पवित्रता और शांति को नुकसान पहुंचाती हैं।

बता दें कि बादल का नांदेड़ दौरा सिर्फ़ एक निजी धार्मिक यात्रा नहीं थी। सुखबीर ने अपने परिवार के साथ तख्त श्री हजूर साहिब में मत्था टेका और जत्थेदार संत बाबा कुलवंत सिंह से मुलाक़ात की। लेकिन इस दौरे के साफ़ तौर पर राजनीतिक और पंथिक मायने भी थे, क्योंकि शिरोमणि अकाली दल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपना समर्थन आधार फिर से मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना ​​है कि तख्त जत्थेदार के साथ उनकी मुलाकात, नांदेड़ तख्त बोर्ड को चलाने वाले कानून में बदलाव के महाराष्ट्र सरकार के प्रस्ताव के खिलाफ अकाली दल के समर्थन को फिर से ज़ाहिर करने जैसा था। कुलवंत सिंह ने 'पंच प्यारे' और कई सिख संगठनों के साथ मिलकर इस प्रस्ताव के विरोध में एक 'गुरमता' (धार्मिक प्रस्ताव) पास किया था, जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने इसे रोक दिया था।

फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि इस पहल से अकाली दल को चुनावी फ़ायदा होगा, या नहीं। लेकिन हमले के बाद, सुखबीर बादल की नांदेड़ यात्रा से जुड़ी राजनीतिक चर्चा पूरी तरह बदल गई है। जिस यात्रा का मकसद धार्मिक और पंथिक जुड़ाव दिखाना था, वह अब इस बात की एक कड़वी याद बन गई है कि धर्म, राजनीति और अनसुलझी शिकायतों का मेल कितना खतरनाक हो सकता है।

इस सबके बीच पंजाब के लिए असली चिंता अब सिर्फ़ यह नहीं है कि सुखबीर बादल पर किसने हमला किया। बल्कि असली चिंता यह है कि क्या ऐसे हमले राजनीतिक अभिव्यक्ति का नया ज़रिया बनते जा रहे हैं—और क्या राज्य इस चलन को आम होने से रोक सकता है।

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