
कांग्रेस ने सोमवार कहा कि दिल्ली में आयोजित ‘ब्रिक्स प्लस’ समूह की बैठक में एक संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बनने का एक कारण इजराइल-फलस्तीन के विषय पर भारत सरकार का रुख है और यह शर्मनाक तथा चौंकाने वाली बात है।
ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच युद्ध को लेकर ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच तीखे मतभेदों के कारण पिछले सप्ताह नयी दिल्ली में ब्रिक्स समूह की बैठक के दौरान इस संघर्ष पर आम सहमति बनाने के भारत के प्रयास विफल रहे। आधिकारिक सूत्रों ने रविवार को यह जानकारी दी।
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ब्रिक्स उप-विदेश मंत्रियों और विशेष दूतों की बैठक के कुछ दिनों बाद सूत्रों ने कहा कि फलस्तीन मुद्दे पर भारत के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘तैईस-चौबीस अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में आयोजित उप-विदेश मंत्रियों और विशेष दूतों की ‘ब्रिक्स प्लस’ बैठक बिना किसी संयुक्त बयान के समाप्त हो गई। ईरान और यूएई दोनों 11-सदस्यीय ‘ब्रिक्स प्लस’ का हिस्सा हैं और पश्चिम एशिया में युद्ध पर उनके अलग-अलग रुख की उम्मीद ही की जा सकती है।’’
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उन्होंने कहा कि चौंकाने वाली और शर्मनाक बात यह है कि संयुक्त बयान न होने का दूसरा कारण इजराइल और फलस्तीन के मामले पर भाषा को हल्का करने की भारत की जिद थी, जो रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान के प्रतिनिधियों के लिए अस्वीकार्य था।
कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘भारत दुनिया का एकमात्र प्रमुख देश है जो उस इजराइली शासन के साथ ऐसी दृढ़ एकजुटता दिखाता है जो गाजा में नरसंहार, दक्षिणी लेबनान पर भारी बमबारी और कब्जे वाले वेस्ट बैंक में लाखों फलस्तीनियों का विस्थापन जारी रखता है।’’
जयराम रमेश ने कटाक्ष करते हुए दावा किया, ‘‘भारत के प्रधानमंत्री और इजराइल के प्रधानमंत्री स्पष्ट रूप से आत्मीय साथी हैं तथा इज़राइल भी अब ‘‘मोदानी साम्राज्य’’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।’’
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