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तूलिका, व्यंग्य और विरोध के रंगों का कैनवास बना जंतर-मंतर, छात्रों ने कला को बनाया आंदोलन की आवाज

भाषणों और नारेबाजी के बीच प्रदर्शन स्थल पर हाथ से बनाए गए चित्र, अनोखी वेशभूषा, काव्यात्मक तख्तियां, कार्टून, व्यंग्यचित्र और इंटरनेट पर प्रचलित हास्य चित्र (मीम) नजर आए। इन माध्यमों से छात्र अपनी मांगों को रचनात्मक ढंग से सामने रख रहे हैं।

तूलिका, व्यंग्य और विरोध के रंगों का कैनवास बना जंतर-मंतर, छात्रों ने कला को बनाया आंदोलन की आवाज (फोटो: सोशल मीडिया)
तूलिका, व्यंग्य और विरोध के रंगों का कैनवास बना जंतर-मंतर, छात्रों ने कला को बनाया आंदोलन की आवाज (फोटो: सोशल मीडिया) 

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) प्रश्नपत्र ‘लीक’ मामले में जवाबदेही तय करने और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने अपनी रचनात्मकता को आंदोलन का माध्यम बना दिया है। उन्होंने रंग-तूलिका, चित्रों, व्यंग्य, पोस्टरों और लोकप्रिय संस्कृति के प्रतीकों के जरिए विरोध दर्ज कराते हुए प्रदर्शन स्थल को खुली कला दीर्घा (ओपन-एयर गैलरी) में बदल दिया है।

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के ‘संसद चलो’ मार्च को पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद भी जंतर-मंतर पर छात्रों का धरना जारी है।

भाषणों और नारेबाजी के बीच प्रदर्शन स्थल पर हाथ से बनाए गए चित्र, अनोखी वेशभूषा, काव्यात्मक तख्तियां, कार्टून, व्यंग्यचित्र और इंटरनेट पर प्रचलित हास्य चित्र (मीम) नजर आए। इन माध्यमों से छात्र अपनी मांगों को रचनात्मक ढंग से सामने रख रहे हैं।

यहां एक सैनिटरी पैड पर हाथ से लिखा संदेश नजर आता है, ‘‘...यह पैड भी लीक नहीं होता’’। यह कथित प्रश्नपत्र लीक पर व्यंग्य था।

प्रदर्शन स्थल पर महात्मा गांधी के तीन बंदरों की तर्ज पर बनाई गई एक कलाकृति रखी है। इसमें एक बंदर की आंखों पर पट्टी बंधी थी, दूसरे के मुंह पर ताला लगा था और तीसरा अपने कानों में तेल डालता हुआ दिखाया गया था।

इनके साथ लिखे संदेश थे- ‘‘पट्टी चोट पर लगाओ, आंखों पर नहीं’’, ‘‘ताला दरवाजे पर लगाओ, मुंह पर नहीं’’ और ‘‘तेल कानों में नहीं, बालों में डालो’’। इन संदेशों के जरिए छात्रों ने अधिकारियों से उनकी समस्याओं की अनदेखी नहीं करने, आवाज नहीं दबाने और शिकायतों पर ध्यान देने की अपील की।

इतिहास और क्रांति की झलक भी यहां दिखती है। हाथ से बनाए गए डॉ. भीमराव आंबेडकर के चित्रों के साथ क्यूबा के क्रांतिकारी चे ग्वेरा के पोस्टर भी यहां हैं।

पुनर्चक्रित (रीसाइकिल किए गए) कागज और रोजमर्रा की वस्तुओं से तैयार की गई कलाकृतियों ने प्रदर्शन को युवाओं की ऊर्जा और रचनात्मकता से भर दिया।

कुछ प्रदर्शनकारी महात्मा गांधी का वेश धारण कर पहुंचे। इनमें एक चित्रण में गांधी की आंखों से खून जैसे आंसू बहते हुए दिखाए गए थे।

लोकप्रिय फिल्मों और संस्कृति का भी प्रदर्शन में व्यापक इस्तेमाल किया गया। एक पोस्टर पर फिल्म ‘गोलमाल 3’ के प्रसिद्ध संवाद को बदलकर लिखा गया था, ‘‘जल्दी इस्तीफा दो, सुबह पनवेल जाना है’’। वहीं एक अन्य पोस्टर में फिल्म ‘तू झूठी मैं मक्कार’ के शीर्षक का इस्तेमाल दो राजनीतिक नेताओं के व्यंग्यचित्रों के साथ किया गया था।

एक अन्य पोस्टर में भारत के नक्शे को चाय में डुबोए जा रहे बिस्कुट के रूप में दिखाया गया था।

प्रदर्शनकारी हार्दिक ने कहा, ‘‘मैं दिखाना चाहता था कि देश के साथ कैसा व्यवहार हो रहा है। इस पोस्टर को बनाने में मुझे दो दिन लगे। इसे मैं सोमवार के मार्च में भी लेकर गया था और आज फिर यहां लाया हूं, ताकि अधिक लोग इसका संदेश देख सकें।’’

प्रदर्शनकारी शिवांगी ने जापानी मंगा और एनीमे श्रृंखला ‘वन पीस’ के ‘स्ट्रॉ हैट पाइरेट’ के प्रतीक वाले दुपट्टे की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘यह एक चेतावनी का संकेत है। इसके जरिए हम कहना चाहते हैं कि कुछ बहुत गलत हो रहा है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।’’

प्रदर्शन में हास्य का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है। एक तख्ती पर लिखा है, ‘‘स्थिति इतनी खराब है कि अंतर्मुखी लोग भी यहां आ गए हैं’’, जबकि एक अन्य पोस्टर में आंदोलन का समर्थन करता हुआ कार्टून कॉकरोच बनाया गया था।

मानसून सत्र के पहले दिन सोमवार को कॉजपा के आह्वान पर हजारों लोगों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद की ओर मार्च किया था, लेकिन पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया था।

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