नवंबर-2016 की नोटबंदी आपको याद होगी। रात ने शाम को अपने आगोश में लेना शुरू ही किया था कि दूरदर्शन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बोलता चेहरा अवतरित हुआ। वे लाइव थे। जनता से एकतरफा संवाद कर रहे थे। उन्होंने भारत में तब चलन में रहे 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। कुछ ही घंटे बाद पुराने नोट बंद हो गए। फिर लोगों ने लंबी-लंबी कतारों में खड़े होकर अपने नोट बदले। बैंकों में ओवरटाइम काम हुआ। सरकार की तीखी आलोचना हुई। अर्थशास्त्रियों ने इस फैसले पर सवाल उठाए। तब सरकार ने इन सब आपत्तियों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह फैसला भारत की अर्थव्यवस्था की कथित मजबूती के लिए है। इससे काले धन पर अंकुश लगेगा। बीजेपी ने भी इसे ऐतिहासिक बताया। अब इसी नोटबंदी ने बीजेपी के नेतृत्व में ही काम कर रही झारखंड सरकार को परेशान कर दिया है। मामला कोर्ट-कचहरी के दांव-पेंच के साथ ही तार्किक स्तर पर भी फंसा हुआ है। कई सवाल हैं, लेकिन किसी के पास इनका मुकम्मल जवाब नहीं है।
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क्या है कहानी:
इस कहानी की शुरुआत नोटबंदी से दो साल पहले हुई थी। मार्च-2014 में रांची के एक व्यापारी ओमप्रकाश छापड़िया के एक कर्मचारी से 9 लाख रुपये की लूट हो गई। रांची के कोतवाली थाने की पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की और महज 24 घंटे के भीतर 5.29 लाख रुपये बरामद भी कर लिए। कुछ लोग गिरफ्तार भी किए गए। बाकी के पैसे बरामद नहीं हो सके। तब इन पैसों को कोतवाली थाने के मालखाने में रखवा दिया गया। ओमप्रकाश छापड़िया ने इस पैसे पर अपना दावा ठोकते हुए इसके भुगतान के लिए साल-2015 में कोर्ट में अर्जी लगाई। इस पर सुनवाई चलती रही। कोर्ट अपना निर्णय सुनाता, इससे पहले ही साल 2016 में नोटबंदी की घोषणा कर दी गई। बरामद नोट 500 और 1000 रुपये के थे। नोटबंदी के बाद वे स्क्रैप हो गए। क्योंकि रकम पुलिस के पास थी, सो इसे नए नोटों से नहीं बदला जा सका। इधर, दिसंबर-2016 में रांची जिला अदालत ने इस दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस मामले में गिरफ्तार अभियुक्तों पर केस अभी विचाराधीन है, लिहाजा यह रकम नहीं लौटायी जा सकती है। इस बीच तारीख पर तारीख पड़े और कोर्ट में सबूतों-गवाहों की कार्यवाही चलती रही। जनवरी 2019 में कोर्ट ने इस मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों को बरी कर दिया।
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दोबारा गए कोर्ट:
इसके बाद ओमप्रकाश छापड़िया दोबारा कोर्ट गए। उन्होंने सिविल कोर्ट में अर्जी लगाकर बरामद रकम पर अपना दावा ठोका और उसे रिलीज कराने की मांग की। विगत 22 जुलाई को सिविल कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने कोतवाली पुलिस को आदेश दिया कि वह यह रकम चेक के जरिए ओमप्रकाश छापड़िया को भुगतान कर दे। इसके बाद सकते में पड़ी पुलिस ने कोर्ट में अर्जी लगाकर इस फैसले पर पुनर्विचार की अपील की। पुलिस का तर्क था कि वह नियमानुसार बरामद रुपये ही लौटा सकती है। मतलब 5.29 लाख की वह रकम 500 और 1000 के पुराने नोटों के रूप में ही लौटायी जा सकेगी, क्योंकि पुलिस ने उन्हें उसी स्वरुप में जब्त कर सीलबंद किया था। पुलिस ने कहा कि कोर्ट ही बैंक को यह आदेश दे कि वह इन नोटों को नए नोटों से बदल दे। इसके बाद कोर्ट ने अपना आदेश संशोधित किया और पुलिस को पुराने नोट ही लौटाने की छूट दे दी।
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कैसे फंसा मामला:
अब बैंककर्मी यह दलील दे रहे हैं कि रिजर्व बैंक के मौजूदा नियम उन्हें इन नोटों को बदलने की इजाजत नहीं देते। क्योंकि, सरकार ने पुराने नोटों को नए से बदलने की एक समय सीमा तय की थी। वह अब बीत चुकी है। ऐसे में कोर्ट को ही इसका रास्ता निकालना चाहिए।
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व्यापारी की पीड़ा:
इस मामले के भुक्तभोगी ओमप्रकाश छापड़िया ने मीडिया से कहा कि वे इन नोटों को लेकर क्या करेंगे। पुलिस ने 5.29 लाख की रकम जब्त की थी। तब वे नोट चलन में थे। अब सरकार ने बीच में ही नोटबंदी कर दी, तो इसका रास्ता भी सरकार और कोर्ट को ही निकालना होगा। उन्होंने बताया कि रिजर्व बैंक के स्थानीय अधिकारियों ने इन्हें बदलने से मना कर दिया है। अब मेरा क्या कसूर है जो मैं इस रकम को पुराने 500-1000 के नोटों की शक्ल में लूं। मेरे पैसे लूटे गए। पूरे पैसे बरामद भी नहीं हुए। अब जो रकम बरामद हुई, वह रकम मुझे मिले। क्योंकि पुराने नोट चलन में नहीं हैं, इसलिए नए नोट दिए जाएं।
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फंसा हुआ है पेंच:
बहरहाल, यह मामला अभी फंसा हुआ है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कोर्ट इसका क्या हल निकालता है। क्योंकि, पुलिस इस मुद्दे पर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं बोल रही है। पुलिस का तर्क है कि मामला सबज्यूडिस है, लिहाजा इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते। इस बीच शहर के व्यापारियों के बीच इस मामले की चर्चा जोर-शोर से हो रही है।
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