
केरल हाईकोर्ट ने केरव विधानसभा चुनाव में पोस्टल वोटिंग प्रक्रिया में खामियों की शिकायत पर शुक्रवार को चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल को होगी। एक राज्य सरकारी कर्मचारी द्वारा दायर याचिका में दावा किया गया कि सभी जरूरी प्रक्रियाओं का पालन करने के बावजूद उसे वोट देने के अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया गया।
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यह याचिका ऐसे समय आई है, जब राज्य में 9 अप्रैल को 140 विधानसभा सीटों के लिए मतदान हो चुका है और उससे पहले भी पोस्टल वोटिंग को लेकर कई शिकायतें सामने आई थीं। इस नए मामले ने अदालत को पहले दिए गए आश्वासनों की याद दिला दी है। 8 अप्रैल को चुनाव आयोग ने हाईकोर्ट को भरोसा दिलाया था कि चुनाव ड्यूटी में तैनात कर्मचारियों को समय रहते पोस्टल बैलेट के जरिए वोट डालने का पूरा मौका दिया जाएगा। लेकिन अब इस दावे पर सवाल खड़े हो गए हैं।
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यह आश्वासन केरल एनजीओ संघ द्वारा दायर एक रिट याचिका के बाद दिया गया था। यूनियन ने आरोप लगाया था कि चुनाव ड्यूटी में लगे सरकारी कर्मचारियों को पोस्टल बैलेट मिलने में भारी दिक्कतें आ रही हैं, जबकि चुनाव संचालन नियम, 1961 के तहत उन्हें यह अधिकार दिया गया है। यूनियन के मुताबिक, बैलेट पेपर के वितरण में देरी के कारण कई कर्मचारी वोट नहीं डाल सके। 1 से 8 अप्रैल तक की पोस्टल वोटिंग अवधि भी व्यस्त चुनावी तैयारियों के बीच थी, जिससे स्थिति और जटिल हो गई। कई अधिकारियों को 6 अप्रैल तक भी बैलेट नहीं मिले थे, जबकि 8 अप्रैल को उन्हें ईवीएम और अन्य चुनाव सामग्री इकट्ठा करने में ही व्यस्त रहना पड़ा, जिससे मतदान के लिए समय नहीं बचा।
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इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पहले निर्देश दिया था कि 8 अप्रैल दोपहर 2 बजे तक सभी पात्र कर्मचारियों को बैलेट पेपर उपलब्ध कराए जाएं। अब नई याचिका में इन निर्देशों के पालन में चूक का आरोप लगाया गया है, जिससे अदालत ने फिर से हस्तक्षेप किया है। यह मामला उन कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर गंभीर चिंता जताता है, जो खुद चुनाव प्रक्रिया को संचालित करते हैं, लेकिन वोट डालने से वंचित रह जाते हैं।
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