
केरल विधानसभा चुनाव के लिए गुरुवार को सभी 140 विधानसभा सीट पर मतदान होगा। इस चुनाव में सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के बीच सीधा मुकाबला है, जहां एलडीएफ हैट्रिक लगाकर लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की उम्मीद कर रहा है, वहीं यूडीएफ सत्ता में वापसी की पुरजोर कोशिश कर रहा है। वहीं इस चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की राज्य में अपना खाता खोलने के प्रयासों की परख होगी।
लगभग एक महीने के गहन चुनाव प्रचार के बाद इस दक्षिणी राज्य में कल एक ही चरण में विधानसभा चुनाव होंगे। मतदान सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक होंगे। इस चुनाव में कुल 883 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनके राजनीतिक भविष्य का फैसला राज्य के 2.71 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करके करेंगे। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, मतदाताओं में 1.32 करोड़ पुरुष, 1.39 करोड़ महिलाएं और 273 उभयलिंगी हैं। साथ ही 2.42 लाख से अधिक प्रवासी मतदाता भी हैं।
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हालांकि यह मुकाबला त्रिकोणीय है। लेकिन राज्य में सत्ता मुख्य रूप से एलडीएफ और यूडीएफ के बीच हस्तांतरित होती रही है। इस चुनाव के परिणाम से पता चलेगा कि क्या यह पैटर्न बरकरार रहेगा या इसमें बदलाव आएगा। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ एलडीएफ के लिए यह चुनाव लगातार तीसरी बार सत्ता बरकरार रखने की एक अहम लड़ाई है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में, वाम मोर्चा ने अपने 10 साल के शासन रिकॉर्ड को प्रमुखता दी है, जिसमें बुनियादी ढांचा विकास, कल्याणकारी योजनाएं और संकट प्रबंधन शामिल हैं।
हालांकि, एलडीएफ को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें सत्ता विरोधी लहर की चर्चा और 2024 के लोकसभा चुनाव और हाल के स्थानीय निकाय चुनाव में मिली हार के बाद उठे सवाल शामिल हैं। वाम मोर्चा ने निरंतरता, स्थिरता और कामकाज का दावा करते हुए इन आरोपों का मुकाबला करने की कोशिश की है। उसने भ्रष्टाचार और कुशासन के आरोपों को भी खारिज करने की भरपूर कोशिश की है।
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इस बीच, कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ को केरल में सत्ता में वापसी का एक बड़ा अवसर दिख रहा है। उसे केरल के परिवर्तनकारी मतदान पैटर्न और मौजूदा सरकार के प्रति जनता की असंतुष्टि पर भरोसा है। उसने अपना चुनाव प्रचार शासन, कथित भ्रष्टाचार और विजयन प्रशासन के कामकाज के तरीके जैसे मुद्दों पर केंद्रित किया है।
यूडीएफ ने सीपीएम और बीजेपी के बीच मिलीभगत का आरोप लगाकर अपने राजनीतिक संदेश को और भी तीखा बनाने का प्रयास किया है। उसने वामपंथियों पर एसडीपीआई जैसे संगठनों से संबंध रखने का भी आरोप लगाया है, जो प्रतिबंधित इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा है।
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वहीं बीजेपी के नेतृत्व वाले राजग के लिए, यह चुनाव केरल की राजनीति में विस्तार के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। लगातार चुनावों में अपने वोट प्रतिशत में सुधार के बावजूद यह गठबंधन अब तक विधानसभा में एक भी सीट हासिल करने में विफल रहा है। एनडीए ने खुद को एलडीएफ और यूडीएफ दोनों के विकल्प के रूप में पेश किया है। उसने तर्क दिया है कि राज्य में किसी भी मोर्चे के तहत पर्याप्त विकास नहीं हुआ। लेकिन पिछले हर चुनाव में केरल की जनता ने बीजेपी को खारिज ही किया है।
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