
केंद्र सरकार ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए केरल का नाम बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट बैठक के बाद इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने इस फैसले को लंबे समय से चली आ रही मांग को पूरा करने वाला कदम बताया।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अपने संबोधन में कहा कि कैबिनेट में लिए गए अहम फैसलों में सबसे प्रमुख निर्णय केरल का नाम बदलकर 'केरलम' करना है। उन्होंने बताया कि भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद से ही यह मांग उठती रही है कि राज्य का आधिकारिक नाम उसकी स्थानीय भाषा के अनुरूप होना चाहिए। मलयालम भाषा में राज्य को 'केरलम' कहा जाता है, इसलिए लंबे समय से यह मांग की जा रही थी कि आधिकारिक रूप से भी राज्य का नाम 'केरलम' किया जाए।
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उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल केंद्र का एकतरफा निर्णय नहीं है, बल्कि इसके लिए एक निर्धारित संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किया जाएगा। इस प्रक्रिया में राज्य सरकार और राज्य विधानसभा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राज्य विधानसभा की मंजूरी के बाद केंद्र सरकार आवश्यक विधायी प्रक्रिया पूरी करेगी और इसके बाद संसद में प्रस्ताव लाया जाएगा। उन्होंने बताया कि राज्य के नाम में बदलाव से संबंधित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इसे आधिकारिक रूप से लागू किया जाएगा।
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देश के कई राज्यों के नाम स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप बदले जा चुके हैं। इसी क्रम में अब केरल को 'केरलम' नाम देने की दिशा में प्रक्रिया बढ़ाई जा रही है। संसदीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद आने वाले समय में राज्य का आधिकारिक नाम 'केरलम' हो जाएगा। केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद, भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु केरल (नाम में बदलाव) बिल, 2026 नाम का एक बिल, भारत के संविधान के आर्टिकल 3 के प्रोविजो के तहत अपनी राय बताने के लिए केरल राज्य विधानसभा को भेजेंगे। केरल राज्य विधानसभा की राय मिलने के बाद, भारत सरकार आगे की कार्रवाई करेगी और केरल राज्य का नाम बदलकर केरलम करने के लिए केरल (नाम में बदलाव) बिल, 2026 को संसद में पेश करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश ली जाएगी।
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संविधान के आर्टिकल 3 में मौजूदा राज्यों के नाम बदलने का प्रावधान है। आर्टिकल 3 के अनुसार, संसद कानून बनाकर किसी भी राज्य का नाम बदल सकती है। आर्टिकल 3 के आगे के प्रोविजो में कहा गया है कि इस मकसद के लिए कोई भी बिल संसद के किसी भी सदन में प्रेसिडेंट की सिफारिश के बिना पेश नहीं किया जाएगा और जब तक कि बिल में शामिल प्रस्ताव किसी भी राज्य के इलाके, सीमाओं या नाम पर असर न डाले, प्रेसिडेंट ने बिल को उस राज्य की लेजिस्लेचर को रेफरेंस में बताई गई अवधि के अंदर या प्रेसिडेंट द्वारा दी गई अतिरिक्त अवधि के अंदर अपने विचार बताने के लिए भेजा हो और बताई गई या दी गई अवधि खत्म हो गई हो।
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