
केंद्र सरकार ने बुधवार को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में बड़ा बदलाव किया है। केंद्र ने ईपीएफओ के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने की मंजूरी दे दी है। सरकार का दावा है कि इस फैसले से 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारियों को कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ), कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) और कर्मचारी जमा-संबद्ध बीमा योजना (ईडीएलआई) का लाभ मिलने की उम्मीद है।
अभी तक यदि कोई नया कर्मचारी 15,000 रुपए से अधिक मासिक वेतन पर नौकरी शुरू करता था, तो वह स्वतः ईपीएफ ढांचे के अंतर्गत नहीं आता था। इसके कारण बड़ी संख्या में कर्मचारी भविष्य निधि, पेंशन और बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं से वंचित रह जाते थे। नई व्यवस्था लागू होने के बाद 15,000 रुपए से 25,000 रुपए मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों का बड़ा वर्ग भी अनिवार्य रूप से ईपीएफओ के दायरे में आ जाएगा। इससे लाखों कर्मचारियों को संगठित सामाजिक सुरक्षा प्रणाली का लाभ मिलेगा।
वेतन सीमा बढ़ने के साथ कर्मचारियों को तीन प्रमुख लाभ मिलेंगे। पहला, उन्हें कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) के तहत नियमित बचत का लाभ मिलेगा। दूसरा, कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) के जरिए रिटायरमेंट के बाद पेंशन सुरक्षा मिलेगी। तीसरा, कर्मचारी जमा-संबद्ध बीमा योजना (ईडीएलआई) के तहत बीमा सुरक्षा भी उपलब्ध होगी। इसके अलावा, पेंशन योग्य वेतन और वैधानिक अंशदान व्यवस्था भी वर्तमान वेतन स्तरों के अधिक अनुरूप हो जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल है कि इस नए बदलाव से वर्तमान कर्मचारियों को क्या लाभा या नुकसान होगा। जिन कर्मचारियों की बेसिक और डीए मिलाकर सैलरी 15,000 रुपये या उससे कम है, उनके लिए इस बदलाव से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि ऐसे कर्मचारी पहले से ही ईपीएफ और ईपीएस के अनिवार्य दायरे में थे। सिर्फ वेज सीलिंग को 25,000 रुपये करने से 15,000 रुपए वेतन वालों के लिए कवरेज में कोई नया बदलाव नहीं होगा। वर्तमान में कर्मचारी और नियोक्ता की ओर से ईपीएफओ में 12-12% योगदान किया जाता है। इसलिए सिर्फ वेतन सीमा बढ़ने की वजह से 15,000 रुपये वेतन वालों की पीएफ कटौती नहीं बढ़ेगी।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर उन कर्मचारियों पर पड़ेगा, जिनकी बेसिक और डीए मिलाकर सैलरी 15,000 रुपये से ज्यादा और 25,000 रुपये तक है। पहले ऐसे कर्मचारी अनिवार्य ईपीएफ कवरेज की पुरानी सीमा से बाहर थे, लेकिन अब नई वेतन सीमा लागू होने के बाद ऐसे कर्मचारी ईपीएफ और ईपीएस के दायरे में आएंगे। इससे कर्मचारियों को रिटायरमेंट फंड का लाभ मिलेगा।
जिन कर्मचारियों पर पहली बार यह अनिवार्य ईपीएस कवरेज लागू होगा, उनकी सैलरी स्ट्रक्चर के हिसाब से पीएफ से जुड़ी कटौती का असर इन-हैंड वेतन पर पड़ेगा। क्योंकि ईपीएफ में कर्मचारी का अपना योगदान भी होता है। इसलिए कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी पर असर निश्चित ही पड़ेगा।
सरकार का कहना है कि ईपीएफओ की वेतन सीमा वर्ष 2004 से 2014 तक 10 वर्षों तक अपरिवर्तित रही थी। इसके बाद सितंबर 2014 में इसे बढ़ाकर 15,000 रुपए किया गया था। अब लगभग 12 वर्षों बाद सरकार ने इसे बढ़ाकर 25,000 रुपए करने का फैसला किया है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में देश में वेतन स्तर, आय और औपचारिक रोजगार में लगातार वृद्धि हुई है। कई राज्यों में न्यूनतम मजदूरी भी मौजूदा सीमा के करीब पहुंच चुकी है। ऐसे में ईपीएफओ ढांचे को मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाना आवश्यक हो गया था।
सरकार का कहना है कि इस फैसले से औपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। अधिक कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा ढांचे में शामिल होने से नौकरी की स्थिरता बढ़ेगी और कर्मचारी लंबे समय तक एक ही संगठन के साथ जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित होंगे। यह फैसला केवल कर्मचारियों के लिए ही नहीं, बल्कि नियोक्ताओं के लिए भी लाभकारी माना जा रहा है। व्यापक सामाजिक सुरक्षा कवरेज से कर्मचारियों का मनोबल बढ़ेगा, प्रतिभाशाली कर्मचारियों को बनाए रखने में मदद मिलेगी और कार्यबल अधिक स्थिर तथा भविष्य के लिए तैयार बनेगा।
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