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मणिपुर के राहत कैम्पों का हाल: भोजन, दवा और पानी के लिए तरसते पहाड़ी इलाकों के कुकी-ज़ोमी-हमार आदिवासी

मणिपुर हिंसा को जारी हुए तीन माह के करीब हो चुके हैं, हजारों लोग विस्थापित हो चुके हैं, 100 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है, लेकिन विस्थापितों के लिए वादे के मुताबिक अभी तक न तो अस्थाई आवास बनाए गए हैं और न ही रिलीफ कैम्पों में पर्याप्त व्यवस्थाएं हैं।

मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में बने राहत कैम्पों का दृश्य (फोटो - रूरल वीमेन अपलिफ्टमेंट सोसायटी
मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में बने राहत कैम्पों का दृश्य (फोटो - रूरल वीमेन अपलिफ्टमेंट सोसायटी 

मणिपुर हिंसा को जारी हुए तीन माह के करीब हो चुके हैं, हजारों लोग विस्थापित हो चुके हैं, 100 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है, लेकिन विस्थापितों के लिए वादे के मुताबिक अभी तक न तो अस्थाई आवास बनाए गए हैं और न ही रिलीफ कैम्पों में पर्याप्त व्यवस्थाएं हैं। मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने जून मध्य में ऐलान किया था कि अगस्त आते-आते 300-400 आवास बनकर तैयार हो जाएंगे। लेकिन इस वादे की तारीख में एक पखवाड़े भर का वक्त रह गया है लेकिन किसी को नहीं पता है कि यह आवास कब और कहां बनेंगे। चुराचांदपुर में तो कम से कम ऐसा कोई निर्माण होता नजर नहीं आ रहा है।

संघर्ष और हिंसा के बीच राज्य के अलग-अलग इलाकों में 300 से ज्यादा राहत कैम्प (रिलीफ कैम्प) बनाए गए  और अकेले चुराचांदपुर जिले में ही 105 रिलीफ कैम्प बनाए जाने की बात है। लेकिन चूंकि सरकारी तौर पर कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, इसलिए इन कैम्पों और इनमें रहने वालों की सही संख्या का अनुमान लगाना मुश्किल है।

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विस्थापितों में से अधिकांश इन प्रस्तावित कैम्पों के स्थान को लेकर भी संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि उनके मुताबिक जहां इन्हें बनाने की बात है वे जगहें सुरक्षित नहीं हैं। इसके अलावा कुकी-ज़ोमी-हमार शरणार्थियों ने राज्य सरकार की किसी भी मदद को लेने से भी इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि उन्हें राज्य सरकार पर बिल्कुल भरोसा नहीं है, हालांकि वे केंद्र से मिलने वाली मदद से इनकार नहीं करते।

मई के आखिरी दिनों में जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मणिपुर दौरे पर गए थे तो उन्होंने केंद्र की तरफ से 102 करोड़ रुपए के राहत पैकेज का ऐलान किया था। लेकिन करीब दो महीने गुजरने के बाद इस बात का अनुमान लगाना मुश्किल है कि कितनी राहत और किस तरह की राहत पहुंची है और उसे कहां खर्च किया गया है।।

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इस दौरान मणिपुर के पहाड़ी इलाकों से विस्थापित हुए मैतेई समुदाय के लिए राज्य सरकार द्वारा कई रिलीफ कैम्प चलाए जा रहे हैं। वहीं कांगपोकपी, तेंग्नुपाल और चुराचांदपुर जिलों राहत कैम्पों को चर्च संगठन और सेवा करने वाले संगठन चला रहे हैं। इन कैम्पों में बहुतायत (करीब 80 फीसदी) कुकी-ज़ोमी-हमार समुदाय के लोग हैं।

पहाड़ी इलाकों के सामुदायिक भवनों और स्कूलों में चल रहे अस्थाई राहत कैम्पों में बुनियादी सुविधाओं और व्यवस्थाओं की बेहद कमी है। रूरल वीमेन अपलिफ्टमेंट सोसायटी के साथ काम करने वाली मेरीबेथ सनाते बताती हैं कि, “यहां सिर्फ राशन और कपड़ों की ही कमी नहीं है, बल्कि पीने के पानी, स्वच्छता और शौचालय के साथ ही दवाओं और चिकित्सा की भी कमी है।” उन्होंने बताया कि कैम्प में रहने वाली करीब 100 लोगों के लिए सिर्फ दो ही शौचालय हैं। वे बताती हैं कि पीने के पानी के लिए सेना और असम राइफल्स के कैम्पों में जाना पड़ता है।

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कुकी खांगलाइ लोम्पी (केकेएल) नाम की संस्था 63 रिलीफ कैम्प का संचालन कर रही है। संस्था का कहना है कि उसके कैम्पों में भी दवाओँ के साथ ही खाना बनाने के लिए लकड़ी या अन्य ईंधन की भारी कमी है। इस संस्था से जुड़े केनेडी हाओकिप बताते हैं कि कैम्प में कैंसर, डायबिटीज मरीजों के साथ ही गर्भवती महिलाएं भी हैं। साथ ही नवजात शिशु और छोटे बच्चे भी हैं। ऐसे में बच्चों और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए पर्याप्त पोषण की व्यवस्था करना बेहद कठिन हो रहा है। उनका कहना है कि जिला कमिश्नर के दफ्तर से कभी-कभी बेबी फूड आ जाता है लेकिन वह काफी नहीं है क्योंकि उसकी आपूर्ति नियमित नहीं है।

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कैम्पों मे रहने वाले बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए ज्यादा दिक्कते हैं। कई ऐसे मरीज हैं जिन्हें डायलसिस की जरूरत है, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। इसी तरह ऐसे मरीज भी हैं जिनका अंग प्रत्यारोपण होना था, लेकिन उनके दस्तावेज और क्लीयरेंस की अवधि समाप्त हो चुकी है। सनाते ने बताया कि उनके एक साथी की मां का देहांत इसी कारण हो गया क्योंकि इम्फाल के जिला अस्पताल से डॉक्टर समय से नहीं पहुंच पाया।

हाओकिप बताते हैं कि, “अब वेंडर ने भी सप्लाई देने से इनकार कर दिया है क्योंकि उनका पिछला भुगतान नहीं हो सका है। यहां तक कि जिला कमिश्नर के दफ्तर की भी बात वे नहीं सुन रहे हैं।” वे कहते हैं कि सरकारी मदद के बिना पहाड़ी इलाकों में कैम्प चलाना बेहद मुश्किल हो गया है।

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इस संकट से यह फिर से साबित हुआ है कि मणिपुर सरकार पहाड़ी जिलों की अनदेखी करती रही है, जहां अस्पतालों और स्पेशल केयर की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। इन इलाकों के लोग गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दीमापुर, कोहिमा और एजॉल जाते रहे हैं, जबकि जो लोग खर्च उठा सकते हैं वे इलाज के लिए गुवाहाटी या दिल्ली आदि जगहों पर जाते हैं।

मणिपुर के ज्यादातर अच्छे अस्पताल राजधानी इम्फाल में हैं, लेकिन आदिवासियों के लिए इनके दरवाजे बंद हैं। वैसे भी मैतेई समुदाय के लोगों ने पहाड़ी इलाकों की आपूर्ति बाधित कर रखी है, जिससे इन इलाकों की हालत और गंभीर होती जा रही है।

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सनाते बताते हैं कि उनकी मदद के लिए ज्यादा एनजीओ भी सामने नहीं आ पा रहे हैं। वे कहते हैं, “वे सभी इम्फाल तक आ जाते हैं लेकिन ब्लॉकेड (अवरोधों) की वजह से हम तक नहीं पहुंच पाते। हमारे पास जो भी राहत सामग्री आ रही है वह एजॉल होकर ही पहुंच पा रही है, जोकि चुराचांदपुर से 350 किलोमीटर दूर है और सप्लाई को यहां तक पहुंचने में कम से कम 13 घंटे लगते हैं।”

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