
प्रवासी मजदूर एक बार फिर बेरोजगार, बेघर हो गए हैं। उनके हाथ खाली हैं और हजारों अपने-अपने गृह राज्यों की ओर लौट रहे हैं। देश के प्रमुख टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग हब में से एक सूरत में एक झटके में एक लाख से ज्यादा मजदूरों को शहर छोड़ते देखा गया। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि गैस की कीमतें बढ़कर 500 रुपये प्रति किलो हो गई थीं, जिससे उनके लिए खाना बनाना नामुमकिन हो गया था। उधना रेलवे स्टेशन पर मर्द-औरतों की भारी भीड़ देखी गई। वे सब उत्तर प्रदेश, ओडिशा और बिहार वापस जाने के लिए ट्रेन में जगह पाने की कोशिश कर रहे थे।
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पावर लूम चलाने के लिए तीन लाख से ज्यादा मजदूरों की जरूरत होती है, लेकिन हालात ऐसे हो गए कि फैक्टरी मालिकों को काम के घंटे कम करने पड़े और उत्पादन एवं लागत को काबू में रखने के लिए हफ्ते में दो दिन यूनिटें बंद रखनी पड़ीं। धागे की बढ़ती कीमतों के बाद अब मांग में भी गिरावट आ गई है, क्योंकि निर्यात के लिए तैयार माल या तो बंदरगाहों पर पड़ा है या फिर रास्ते में अटका हुआ है।
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पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध की वजह से कमर्शियल और घरेलू, दोनों तरह की एलपीजी की भारी कमी हो गई है। इससे इंडस्ट्रीज, होटल और रेस्टोरेंट, फाउंड्री और दूसरे एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) का काम ठप हो गया है। सरकार लोगों के डर को कम करने के लिए कुछ नहीं कर रही। हालात काफी हद तक वैसे ही हैं, जैसे हमने कोविड के दौरान देखे थे। उत्तर प्रदेश से आकर दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के संगम विहार में घरेलू काम करने वाली 53 साल की राखी सक्सेना ने अपना सामान बांधकर घर लौटने का फैसला कर लिया है। वह कहती हैं, ‘19 किलो का सिलेंडर ब्लैक में 5,000 रुपये में बिक रहा है। इसे खरीदने की हिम्मत कौन करे? 7-8 महीनों के लिए लॉकडाउन लगने की भी अफवाहें उड़ रही हैं। ऐसे में घर लौट जाना ही बेहतर है, कम-से-कम वहां लकड़ी जलाकर खाना तो बना लेंगे।’
उत्तरी दिल्ली के आजाद मार्केट, चांदनी चौक, सदर बाजार और लाजपत नगर में मालिकों ने प्रवासी मजदूरों की संख्या में कमी देखी है। कई आरडब्ल्यूए घरेलू काम करने वालों और मजदूरों के पलायन की शिकायत कर रहे हैं।
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बेरी वाला बाग के आरडब्ल्यूए अध्यक्ष मोहम्मद सईद खान ने कहा, ‘मजदूर घर लौट रहे हैं और नए मजदूर आ नहीं रहे। सरकार के आश्वासन चाहे जो भी हों, ब्लैक मार्केट में घरेलू एलपीजी सिलेंडर 4,000 रुपये में बिकने के कारण, मजदूरों को बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।’ सरकार द्वारा घरों को प्राथमिकता दिए जाने के कारण कमर्शियल इस्तेमाल करने वालों को अपनी सामान्य एलपीजी सप्लाई का सिर्फ 20 फीसद ही मिल पा रहा है।
कोयंबटूर में फाउंड्री सेक्टर पर बंदी का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि यह कोर बेकिंग, लैडल प्रीहीटिंग और हीट ट्रीटमेंट प्रक्रियाओं के लिए एलपीजी पर निर्भर है। जब इस सेक्टर के किसी एक हिस्से पर असर पड़ता है, तो ऑटोमोटिव, पंप, कंप्रेसर, वाल्व और जनरल इंजीनियरिंग जैसे कई दूसरे उद्योगों पर भी इसका असर होता है। एक महीने में सप्लाई में रुकावट की वजह से कार्बाइड, इंडस्ट्रियल ऑयल, लुब्रिकेंट, पैकिंग मटीरियल और पेट्रोलियम-आधारित केमिकल जैसे बाइंडर, कोटिंग और रेजिन की कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे एमएसएमई के लिए प्रोडक्शन मुश्किल होता जा रहा है।
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इस संकट का असर निर्यात प्रतिबद्धताओं पर भी पड़ रहा है। उत्पादन में देरी से डिलीवरी शेड्यूल का पालन मुश्किल हो रहा है, जिससे कंपनियों को काफी ज्यादा खर्च पर एयर फ्रेट का सहारा लेना पड़ रहा है। हवाई किराये में बढ़ोतरी ने बिजनेस से जुड़े सफर को बहुत महंगा बना दिया है। इंडस्ट्री ने सरकार से गुजारिश की है कि वह इंडस्ट्रियल इस्तेमाल के लिए एलपीजी की बिना रुकावट सप्लाई सुनिश्चित करे, पेट्रोलियम-आधारित इनपुट की उपलब्धता को स्थिर करे, पीएनजी जैसे दूसरे ईंधनों की ओर बदलाव में मदद करे, और लेबर एवं सप्लाई चेन से जुड़ी चुनौतियों को हल करे।
एमएसएमई का जीडीपी में लगभग 30 फीसद का योगदान होने, निर्यात में 45 फीसद की हिस्सेदारी रखने और 24 करोड़ लोगों को रोजगार देने के बावजूद, उन्होंने ज्यादातर बिना सरकारी मदद के ही काम किया है।
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एमएसएमई मंत्री जीतन राम मांझी ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि 10 लाख रजिस्टर्ड एमएसएमई में से 49,342 बंद हो गए हैं, जिसके कारण पिछले एक दशक में 3,17,641 नौकरियां चली गईं। जो एमएसएमई अब भी चल रहे हैं, उन्हें भी पिछले चार हफ्तों में और ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही 96 लाख एमएसएमई हैं। इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिनेश गोयल ने इस बात पर जोर दिया है कि एल्युमीनियम, लौह और अलौह धातुओं की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को नियंत्रित करने की जरूरत है, क्योंकि इसका असर मशीनरी और भवन निर्माण सामग्री बनाने वाले उद्योगों पर पड़ता है। गोयल ने समुद्री बीमा की अनुपलब्धता के कारण अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स लागत में हुई भारी बढ़ोतरी पर भी अपनी बात रखी है। घरेलू खरीदारों द्वारा सप्लाई के ऑर्डर रद्द किए जाने और सप्लाई में देरी होने पर जुर्माना लगाए जाने से स्थिति और भी बदतर हो गई है।
एसोसिएशन ऑफ इंडियन एंटरप्रेन्योर्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष के.ई. रघुनाथन ने दूरदर्शिता की कमी पर जोर दिया है। वह कहते हैं, ‘यह देखते हुए कि हमारी 80 फीसद एलपीजी होर्मुज जलडमरूमध्य से आती है, सरकार के पास एमएसएमई की मदद की आपात योजना बनाने के लिए काफी समय था। लेकिन सहायता व्यवस्था कहां है? ज्यादातर एमएसएमई कितने कमजोर हैं, यह अच्छी तरह जानने के बावजूद, इस संकट से उबरने में उनकी मदद के लिए कुछ भी नहीं किया गया।’ अर्थशास्त्री अरुण कुमार बताते हैं कि ज्यादातर सूक्ष्म इकाइयां- जिनमें औसतन 1.7 लोग काम करते हैं। यानी इनमें वस्तुतः अकेला आदमी ही काम करता है- सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं ‘क्योंकि उनमें कीमतों में हुई बढ़ोतरी का बोझ सहने की क्षमता नहीं।’ प्रोफेसर कुमार आगाह करते हैं कि ऐसी ही स्थिति रही तो मंदी आ सकती है।
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घाटे को काबू में रखने के लिए सरकार द्वारा 100 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा के बावजूद, कई जरूरी चीजों की कमी बनी हुई है। चीनी बनाने में जरूरी सल्फ्यूरिक एसिड की कमी से इसकी कीमत 15 हजार रुपये प्रति टन से बढ़कर 60 हजार प्रति टन हो गई है। ऑटोमोटिव और रक्षा क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले पॉलिएस्टर, पॉलीमर और पॉलीप्रोपाइलीन की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं।
टेक्सास के ऊर्जा विशेषज्ञ अनस अलहाजी ने एक इंटरव्यू में कहा कि जहां चीन के पास 1.4 अरब बैरल कच्चा तेल रिजर्व में है, वहीं भारत के पास केवल 10 करोड़ बैरल है। अलहाजी ने कहा कि भारत को अपने रिजर्व को कम-से-कम 40 करोड़ बैरल तक बढ़ाना होगा, और वह भी तेजी से। भारत अभी उस तेल पर हर महीने 20 करोड़ डॉलर ज्यादा खर्च कर रहा है, जिसे उसे रूस से आयात करने की ‘इजाजत’ मिली हुई है। यह उस कीमत से तीन गुना ज्यादा है, जो उसे अमेरिका के आगे झुकने से पहले मिल रही थी।
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रघुनाथन का मानना है कि वैश्विक टैरिफ युद्ध, भू-राजनीतिक संघर्षों, कच्चे माल की आपूर्ति में रुकावट और घरेलू नीति से जुड़ी अनिश्चितताओं से लगने वाले झटकों से लाखों छोटे कारोबार बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। अब यह महज एक चक्रीय मंदी नहीं रही, यह एक गहरे ढांचागत संकट का संकेत है। वह कहते हैं, ‘फिर भी, हमारी नीतिगत प्रतिक्रिया असंगत है। अगर तुरंत और निर्णायक हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो परिणाम बहुत गंभीर होंगे- बड़े पैमाने पर कारोबार बंद होंगे, नौकरियां जाएंगी और भारत के उद्यमिता-तंत्र को लंबे समय का नुकसान पहुंचेगा।’
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रघुनाथन के सुझाव के अनुसार, टैरिफ, व्यापार और टैक्स से जुड़े मामलों पर पांच साल का एक रोडमैप तुरंत घोषित किया जाना चाहिए। ‘सरकार को एमएसएमई वॉर एंड टैरिफ मिटिगेशन फंड बनाना चाहिए, और साथ ही वैश्विक उथल-पुथल से प्रभावित इकाइयों को सीधे आर्थिक मदद देनी चाहिए।’ अन्य उपायों में आपातकालीन क्रेडिट सहायता शुरू करना, ड्यूटी को तर्कसंगत बनाना और जरूरी इनपुट की किफायती आपूर्ति के लिए तंत्र बनाना शामिल है। उन्होंने कहा, ‘एमएसएमई कोई बैसाखी नहीं मांग रहे हैं, वे तो बस अपना अस्तित्व बचाना चाहते हैं।’
प्रोफेसर अरुण कुमार का मानना है कि भले युद्ध रुक जाए, आर्थिक स्थिति सुधरने में 6-7 माह लगेंगे। समस्या यह है कि भारत ने अपनी आयात निर्भरता घटाने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। पांच दशक पहले, भारत की तेल आयात पर निर्भरता लगभग 30 फीसद थी; 2026 में यह बढ़कर रिकॉर्ड 88.6 फीसद तक पहुंच गई।
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