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जेएनयू में दलित-आदिवासी छात्रों के खिलाफ गुप्त जातिवाद उजागर करने वाली संसदीय समिति  की रिपोर्ट पर मोदी सरकार चुप

जेएनयू में गुप्त जातिवाद पहला काम तो ये करता है कि छात्रों को इंटरव्यू में पास नहीं होने देता और दूसरा अधिकारियों व कर्मचारियों को विदेश नहीं जाने देता है।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय

संसद की एक समिति ने दलितों व आदिवासियों के सामाजिक व आर्थिक विकास में विश्वविद्यालयों की भूमिका के एक अध्ययन रिपोर्ट में जातिवाद की वजह से जेएनयू में होने वाले कई तरह के भेदभाव को उजागर किया है। इस समिति के अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी के अहमदाबाद से सांसद किरिट पी सोलंकी हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में दलितों और आदिवासियों के खिलाफ गुप्त भेदभाव पर जो टिप्पणियां की हैं, सरकार और जेएनयू ने उस पर चुप्पी साध ली है।

संसद की अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की कल्याण संबंधी समिति ने सरकार को बताया है कि जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) जैसे अभिजात्य शैक्षणिक संस्थान में दलितों व आदिवासियों के खिलाफ गुप्त जातिगत भेदभाव होता है। सरकारी भाषा में अनुसूचित जाति को राजनीतिक भाषा में दलित और अनुसूचित जनजाति को आम बोलचाल में आदिवासी कहा जाता है।

संसद की समिति ने समाज के इन वंचित वर्गों के आर्थिक-सामाजिक विकास में विश्वविद्यालयों की भूमिका का अध्ययन करते हुए पाया कि जेएनयू में पिछले तीन वर्षों के दौरान संस्थान के किसी भी दलित और आदिवासी शिक्षक, कर्मचारी और अधिकारी को प्रशिक्षण के लिए विदेश दौरे पर नहीं भेजा गया है। मजेदार बात यह है कि शिक्षक और गैर शिक्षक कर्मचारियों को विदेश दौरे पर नहीं भेजे जाने के बारे में जब समिति ने सरकार को बताया तो उसने संसद की समिति को केवल गैर शिक्षण कर्मचारियों के बारें में ही जवाब दिया।

सरकार ने समिति की टिप्पणियों व सिफारिशों पर कार्रवाई की जानकारी देते हुए अपने जवाब में बताया कि जेएनयू में गैर शिक्षण कर्मचारियों के विदेश दौरे पर प्रशिक्षण के लिए जाने के अवसर नाममात्र होते हैं। लेकिन शिक्षकों को सेमिनार, कार्यशाला, गोष्ठी , प्रशिक्षण आदि जैसे कार्यक्रमों के लिए विदेश भेजे जाने के मामले पर चुप्पी साध ली।

जेएनयू के इस रवैये पर संसद की समिति ने सख्त नाराजगी जाहिर की है। समिति ने जेएनयू के विदेश दौरे संबंधी जवाब पर टिप्पणी करते हुए कहा कि समिति को उम्मीद नहीं थी कि जेएनयू जैसे विश्व स्तरीय संस्थान द्वारा ऐसा जवाब दिया जा सकता है। समिति ने कहा कि जेएनयू ने गैर शिक्षण कर्मचारियों व अधिकारियों के मामले में विदेश दौरे के अवसर कम होने को वजह बताया है, लेकिन शिक्षकों के मुद्दे पर उसने चुप्पी साध ली है। समिति ने जेएनयू को यह निर्देश दिया है कि वह संस्थान के शिक्षकों द्वारा पिछले पांच वर्षों के दौरान किए गए विदेश दौरों का विवरण प्रस्तुत करे। जेएनयू को यह भी निर्देश दिया गया है कि शिक्षकों के विदेश दौरे के विवरण में यह भी उल्लेख करे कि विदेश जाने वाले शिक्षकों की सूची में कितने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के शिक्षक शामिल हैं।

संसद की समिति ने यह सिफारिश की है कि भविष्य में विदेशों में होने वाले सेमिनार, गोष्ठी, कार्यशाला, प्रशिक्षण और अन्य कार्यक्रमों में वंचित वर्गों के शिक्षकों व छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास करें।

संसद की समिति ने दलितों व अदिवासी छात्र-छात्राओं के खिलाफ भेदभाव के स्तर का खुलासा करते हुए बताया है कि इन वर्गों के छात्र लिखित परीक्षा में तो अच्छे अंक प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन इसके बावजूद वे इंटरव्यू में फेल हो जाते हैं। यह विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारियों व शिक्षकों की तरफ से गुप्त जातिगत भेदभाव को दर्शाता है। समिति की रिपोर्ट में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रों के खिलाफ जातिगत भेदभाव का मुल्यांकन और उसके बारे में जो टिप्पणियां दर्ज की गई हैं, उन पर भी सरकार ने चुप रहने का ही विकल्प चुना है।

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