
नीट पेपर लीक को लेकर देश भर के छात्रों और युवाओं के आंदोलन पर यूं तो विराम लग गया है, लेकिन इस आंदोलन में हजारों-लाखों की तादाद में शामिल जेन-ज़ी ने जिस तरह से सरकार से जवाबदेही की मांग उठाई, सत्ता से सवाल पूछे, खुद का मजाक बनाते हुए भी पुलिस बलों की बरबरता सही, उसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है। विडंबना यह रही कि इस दौरान सत्ता ने समाज के इस बड़े वर्ग से संवाद की कोशिश ही नहीं की। और की भी तो, एकतरफा, और उसमें भी इन युवाओं को ही कठघरे में खड़ा कर दिया।
सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे बीजेपी नेतृत्व ने जिन युवाओं की अनदेखी की, उसी जेन-ज़ी की तरफ बीजेपी के अभिभावक आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संवाद की पहल की। मुंबई में हुए संवाद सम्मेलन में करीब 2 हजार युवाओं ने हिस्सा लिया, जिसके बाद मोहन भागवत का बयान सामने आया कि जेन-ज़ी और जेन-अल्फा पुरानी पीढ़ी से भी ज्यादा देशभक्त और ईमानदार है। उन्होंने कहा कि, “हमें उनकी बात सुननी चाहिए। उनसे बातचीत में कमी थी, इसीलिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन हुआ।“
लेकिन ऐसा कहते वक्त मोहन भागवत शायद भूल गए कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले 36 दिनों के आंदोलन के दौरान और उसके बाद भी उनकी छत्रछाया में पले-बढ़े और ट्रेन किए गए नेता क्या कुछ बोल रहे थे या अब भी बोल रहे हैं।
सबसे पहले बात तो उन्हीं धर्मेंद्र प्रधान की करते हैं जिनके शिक्षा मंत्री के तौर पर इस्तीफे की मांग के लिए जेन-ज़ी आंदोलन कर रहे थे। धर्मेंद्र प्रधान ने कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में आंदोलन कर रहे छात्रों को कथित तौर पर आंतकवादियों की बी टीम कहा था। उनके इस बयान की चौतरफा आलोचना हुई थी। प्रधान के इस बयान पर मोहन भागवत चुप रहे थे।
संघ और भागवत की पोषित बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने इन आंदोलनकारियों के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया, वह संघ को क्यों नहीं सुनाई दिए। भागवत जी, नितिन नबीन तो इन्हें देशद्रोही और वायरस कह रहे थे।
केरल में संघ विचारक टी जी मोहनदास के बयान ने तो सारी हदें पार कर दी थीं। उनका एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वे कथित तौर पर कहते हुए नजर आए कि अगर उन्हें विरोध प्रदर्शन को संभालने का काम सौंपा जाता, तो वह जंतर-मंतर इलाके में कर्फ्यू लगा देते। उन्होंने आगे कहा था, "भीड़ को तितर-बितर होने के लिए कहा जाएगा। पब्लिक एड्रेस सिस्टम के ज़रिए तीन बार घोषणा की जाएगी। फिर, फायरिंग होगी। लोग अफरातफरी में और हड़बड़ी में भागेंगे। कुछ लोग मारे जाएंगे, कुछ घायल हो जाएंगे। चार घंटे के भीतर स्थिति नियंत्रण में आ जाएगी। शवों को अस्पताल ले जाया जाएगा।"
इतना ही नहीं एक और वीडियो में वे कहते हुए दिखे कि, "पुलिस को इलाके से हटा लेना चाहिए और इसे प्रदर्शनकारियों पर छोड़ देना चाहिए। बलात्कार और हत्याएं होंगी। बलात्कार की शिकायतें नहीं होंगी, क्योंकि उन्हें बलात्कार पसंद है।"
खुलेआम हिंसा करने और युवा महिलाओं के साथ बलात्कार की बात कहते हुए उनके बारे में अपमानजनक टिप्प्णी पर भी मोहन भागवत चुप रहे। तब उन्होंने कहीं नहीं कहा कि ‘ये तो हमसे ज्यादा देशभक्त हैं और इनके बारे में ऐसा न बोला जाए।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें पीछे नहीं रहे। हालांकि उन्होंने कोई अपशब्द तो नहीं कहे, लेकिन उन्होंने उस पीढ़ी को भटका हुआ घोषित कर दिया जिसे देश-दुनिया के बारे में, अच्छे-बुरे के बारे में कहीं ज्यादा बेहतर समझ है। आंदोलन के दौरान देर रात जारी उनके ‘फ्रांड्स’ वीडियो सामने आए और उन्होंने युवाओं को भटका हुआ बताकर दोष लगाया कि उन्हें और उनकी मां को गालियां दी जा रही हैं। किसी सकारात्मक पहल की बात करने के बजाए उन्होंने अपनी ही तरफ से कह दिया कि, ‘मैं उन्हें माफ करना चाहता हूं।’ लेकिन पीएम मोदी और मोहन भागवत दोनों को अच्छी तरह मालूम है कि माफ करना तो दूर, उन युवाओं को आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए किस तरह प्रताड़ित किया जा रहा है।
मोहन भागवत इस बात पर भी चुप हैं कि उनके संगठन की सरपरस्ती में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए बेशुमार समूह कैसे इन युवाओं की निजी जानकारियां सार्वजनिक कर उनके लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। मोहन भागवत ने इन समूहों को कोई नसीहत नहीं दी जिनकी नाल संघ से जुड़ी हुई है।
संघ की राजनीतिक शाखा बीजेपी के दक्षिण दिल्ली से सांसद रामबीर सिंह बिधूड़ी अपनी बदजुबानी के लिए कुख्यात हैं। भरी संसद में बीएसपी के पूर्व सांसद दानिश अली के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने वाला उनका वीडियो अभी भी लोकसभभा के वीडियो रिकॉर्ड में मौजूद है। उनकी इस भाषा पर उस समय न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न ही संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कोई शब्द कहा था। इन्हीं बिधूड़ी ने दिल्ली में आंदोलन करने वाले युवाओं को ‘पंचर बनाने वालों की औलाद’ की संज्ञा दी। सुनने में इसमें कोई अश्लीलता भले न लगे, लेकिन वे क्या कहना चाहते हैं यह सर्वविदित है।
तेलंगाना के विधायक टी राजा बीजेपी के पूर्व नेता हैं। वे हिंदुवादी और सांप्रदायिक भाषा के लिए कुख्यात हैं। चुनावों के दौरान उनका वह भाषण सुर्खियों में रहा जिसमें वे सार्वजनिक मंच से खुलेआम मां की गाली का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनके बारे में भी संघ को कोई विचलन नहीं हुआ।
प्रधानमंत्री ने अपनी इंस्टाग्राम रील में कहा था कि, ‘आंदोलन के दौरान ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया जो किसी भी सभ्य समाज को शोभा न दे...’ लेकिन उन्हें शायद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के यह शब्द सुनाई नहीं दिए जब उन्होंने आंदोलन करने वालो को ‘भाड़े के टट्टे’ कहकर संबोधित किया था। और फिर संघ का तो मुख्यालय ही महाराष्ट्र में है, और मोहन भागवत के कानों तक भी ये शब्द नहीं पहुंचे, और वे अब ज्ञान दे रहे हैं कि जेन-ज़ी उनसे कहीं ज्यादा देशभक्त और ईमानदार हैं।
मोहन भागवत को यह भी याद दिलाना जरूरी है कि उनके चहेते नरेंद्र मोदी सार्वजनिक मंचों से कैसी भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं। ’50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’, ‘कांग्रेस की विधवा’, ‘दीदी-ओ दी दी...’ क्या यह गालियां नहीं थीं, क्या इस तरह की भाषा सभ्य समाज में स्वीकार्य है?
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मोहन भागवत, आपने ठीक कहा कि, जेन-ज़ी आपकी पीढ़ी से ज्यादा ईमानदार है। क्योंकि, जेन-ज़ी के साथ संवाद में आपने संघ और भारत के इतिहास के बारे में जो कुछ भी बोला-कहा, वह अर्धसत्य है। पूरे ब्रह्माण्ड में भागवत जी आपके संघ से ज्यादा पाखंड और कोई कर ही नहीं सकता। आपने जेन-ज़ी को बताया कि कांग्रेस का 1933 का अधिवेशन महाराष्ट्र के जलगांव में हुआ था। यह झूठ है, यह अधिवेशन कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था।
आपने बताया कि तीन रंगों वाला झंडा पहली बार नागपुर में फहराया गया था। नहीं, यह भी झूठ है। तीन रंगों वाला झंडा कांग्रेस ने रांची में फहराया था और इसे स्वराज ध्वज का नाम दिया गया था, और इसी दौरान पूर्ण स्वाधीनता का ऐलान किया गया था। 1931 के कांग्रेस अधिवेशन में इसे कांग्रेस का अधिकारिक झंडा घोषित किया गया था।
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भागवत जी आपके इस कथित संवाद कार्यक्रम से यह भी स्पष्ट हो गया कि आपका ज्ञान भी ह्वाट्सऐप यूनिवर्सिटी से आ रहा है। लेकिन अब चूंकि आपके श्रीमुख से यह निकला है तो एक बार फिर व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के जरिए ही इसे इतिहास बनाया जाएगा।
लेकिन एक बात समझ लीजिए, आपसे संवाद कर जो जेन-ज़ी कार्यक्रम से बाहर आए, उन्हें भी सुन लीजिएगा। ज्यादातर छात्र आपसे असहमत नजर आए हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि यह सिर्फ कवर अप है, ख़ाली, खोखली बातें हैं।
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