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नेपाल त्रासदी अपडेट: भारी बारिश के चलते त्रिशूली में रुका रेस्क्यू ऑपरेशन, अब तक 587 मौतें, करीब 2500 लापता

नेपाल बाढ़ में अब तक 587 लोगों की मौत हो चुकी है और 2500 लोग लापता हैं। त्रिशूली में भारी बारिश से रेस्क्यू ऑपरेशन रोक दिया गया है।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद राहत-बचाव अभियान के बीच एक बार फिर हालात बिगड़ने की आशंका बढ़ गई है। त्रिशूली इलाके में भारी बारिश के कारण मौसम खराब हो गया है, जिससे हेलिकॉप्टर उड़ान नहीं भर पा रहा और रेस्क्यू ऑपरेशन को फिलहाल अस्थायी तौर पर रोकना पड़ा है। नदी का जलस्तर भी लगातार बढ़ रहा है, जिसके चलते आसपास के इलाकों से एहतियातन लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। इस बीच नेपाल में आपदा से मरने वालों की संख्या 587 हो चुकी है, जबकि करीब 2,500 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

587 मौतें, हजारों लोग लापता

नेपाल रेड क्रॉस के मुताबिक, इस आपदा से 90 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। पहाड़ी इलाकों में सड़कें और पुल बह जाने के कारण राहत-बचाव टीमों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लापता लोगों तक पहुंचना है। बाढ़ में 36 से ज्यादा पुल बह चुके हैं, जिससे कई गांवों का संपर्क टूट गया है और जरूरतमंद लोगों तक राशन, दवाइयां और दूसरी जरूरी चीजें पहुंचाना मुश्किल हो गया है। राहत अभियान में सेना के 2,391 जवानों समेत कुल 7,451 सुरक्षाकर्मी जुटे हैं और टीमें लगातार मलबे में लोगों की तलाश कर रही हैं।

इस त्रासदी का असर भारत से जुड़े लोगों पर भी पड़ा है। भारत के विदेश मंत्रालय के ताजा अपडेट के मुताबिक, 320 भारतीयों और भारतीय मूल के 100 लोगों से अब तक संपर्क नहीं हो सका है। इनमें करीब 100 लोग त्रिशूली जलविद्युत परियोजना में फंसे हुए हैं। दूसरी तरफ तिब्बत में मौजूद करीब 400 भारतीयों से संपर्क हो चुका है और वे सुरक्षित हैं। सीमा के पास फंसे 96 भारतीय नेपाल पहुंच चुके हैं। भारत ने नेपाल की मदद के लिए राहत सामग्री की दो खेप भी भेजी हैं।

बाढ़ का असर नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं पर भी पड़ा है। 13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से जुड़े 933 कर्मचारी लापता बताए गए हैं, जिनमें से 254 लोगों को बचा लिया गया है। कई अन्य कर्मचारियों के सुरंगों में फंसे होने की आशंका है। अकेले अपर त्रिशूली-1 परियोजना से जुड़े 576 कर्मचारियों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। रास्तों को फिर से जोड़ने के लिए नेपाल ने भारत और चीन से 42 बेली ब्रिज बनाने में मदद मांगी है।

ग्लेशियर टूटने से तबाही, अब अस्थायी झील बनी नया खतरा

इस प्राकृतिक आपदा की शुरुआत पहाड़ी इलाके में ग्लेशियर टूटने के बाद हुई। शुरुआती जांच के मुताबिक, बर्फ, चट्टान और मलबे का भारी हिस्सा नीचे आया और लेंडे नदी में गिर गया। इससे नदी का रास्ता कुछ समय के लिए रुक गया। जब यह प्राकृतिक रुकावट टूटी तो पानी के साथ मिट्टी, पत्थर और मलबे का तेज बहाव नीचे की ओर आया। इसकी चपेट में भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के आसपास के इलाके आ गए। कई बस्तियां, सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएं इसकी वजह से तबाह हो गईं।

अब सबसे बड़ी चिंता नदी के ऊपरी हिस्से में बनी उस अस्थायी झील को लेकर है, जो मलबे के कारण नदी का रास्ता रुकने से बनी है। सैटेलाइट तस्वीरों से इसकी लगातार निगरानी की जा रही है। चीनी अधिकारियों के मुताबिक, झील में करीब 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी जमा हो चुका है और अगले तीन दिनों में करीब 30 लाख क्यूबिक मीटर पानी और आने का अनुमान है। अगर पानी का दबाव बढ़ा और झील की प्राकृतिक रुकावट टूटी तो नीचे के इलाकों में अचानक बाढ़ आ सकती है।

भोटेकोशी-त्रिशूली पर नजर, तिब्बत में भी भारी तबाही

शनिवार सुबह 6:30 बजे तक रसुवा की भोटेकोशी और नुवाकोट से होकर बहने वाली त्रिशूली नदी में पानी का बहाव सामान्य बताया गया था। बाढ़ पूर्वानुमान महाशाखा के मुताबिक, दोनों नदियों के जलस्तर में उस समय कोई बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं देखा गया था। जल वैज्ञानिक प्रभाकर यादव ने भी बताया था कि पानी तेजी से बढ़ता हुआ नहीं दिख रहा है। हालांकि, ताजा हालात में त्रिशूली क्षेत्र में भारी बारिश से मौसम बिगड़ गया है और हेलिकॉप्टर उड़ान नहीं भर पा रहा है। नदी का स्तर बढ़ने के कारण आसपास के लोगों को एहतियातन निकाला गया है। तिब्बत में उस जगह की मौजूदा स्थिति को लेकर, जहां से पिछली बाढ़ का संकट शुरू हुआ था, अभी कोई अतिरिक्त जानकारी नहीं मिली है।

इस आपदा की मार सीमा पार चीन के तिब्बत इलाके तक भी पहुंची है। ग्यिरोंग काउंटी में आई बाढ़ में 5 लोगों की मौत हुई है, जबकि करीब 558 लोग लापता हैं। इनमें 260 विदेशी नागरिक बताए गए हैं। तेज पानी ने गांवों, बिजलीघरों, सड़कों, पुलों और संचार व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है और काठमांडू-ल्हासा के बीच आने-जाने वाला रास्ता भी प्रभावित हुआ है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक, अस्थायी झील के कारण खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसलिए भोटेकोशी और त्रिशूली के आसपास रहने वाले लोगों, यात्रियों और बचाव दलों को सतर्क रहने को कहा गया है। फिलहाल नदियों का बहाव सामान्य बताया गया था, लेकिन ऊपर जमा पानी और मलबे की स्थिति पर लगातार नजर रखना जरूरी है।

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