
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के एसआईआर के बाद शनिवार को प्रकाशित होने वाली मतदाता सूची में सात करोड़ से अधिक मतदाताओं की अद्यतन जानकारी होगी। महीनों के राजनीतिक टकराव, अदालती लड़ाइयों, सड़कों पर प्रदर्शनों और चिंता के माहौल के बीच संशोधित मतदाता सूची का प्रकाशन होगा। इन बातों ने विधानसभा चुनाव से पहले के परिदृश्य को नया रूप दिया है। इस चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों का काफी कुछ दांव पर है।
राज्य में 7.08 करोड़ मतदाताओं को ‘अनुमोदित’, ‘हटाए गए’ या ‘विचाराधीन’ के रूप में वर्गीकृत करने वाली यह सूची 28 फरवरी को प्रकाशित होगी। यह ऐसी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ है जो नौकरशाही में सुधार से कहीं आगे बढ़कर चुनाव से पहले विवाद का मुद्दा बन गई है।
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निवार्चन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को एक बड़े चुनाव से पहले वैधानिक शुद्धिकरण के रूप में परिकल्पित किया था। एसआईआर पहली बार 2002 में किया गया था। मसौदा मतदाता सूची 16 दिसंबर को प्रकाशित हुई थी जिसमें मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई। उस सूची में मृत्यु, प्रवासन, दोहराव आदि के कारण 58 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए थे।
इसके बाद दूसरे चरण में 1.67 करोड़ मतदाताओं की सुनवाई हुई- जिनमें से 1.36 करोड़ मतदाताओं के संदर्भ में ‘तार्किक विसंगतियां’ पाई गईं जबकि 31 लाख मतदाताओं को ‘मैपिंग’ से बाहर बताया गया। लगभग 60 लाख मतदाताओं के मामले अब भी विचाराधीन हैं। निर्वाचन आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया ‘सटीकता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक और नियमित’ है।
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सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने एसआईआर का कड़ा विरोध करते हुए उसे ‘पिछले दरवाज से किया गया एनआरसी’ करार दिया है। एक अभूतपूर्व कदम में, मुख्यमंत्री और तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने उच्चतम न्यायालय में ‘एक आम नागरिक’ के रूप में पेश होकर मांग की थी कि 2025 की मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर विधानसभा चुनाव कराया जाए। बनर्जी ने आरोप लगाया कि लाखों वास्तविक मतदाताओं पर मतदान प्रक्रिया से बाहर होने का खतरा है। यह संशोधन नहीं, बल्कि जानबूझकर नाम हटाने की कवायद है। उन्होंने यह भी कहा कि विसंगतियों का बहाना बनाकर वास्तविक नामों को ‘चोरी-छिपे हटा दिया गया।
बीजेपी ने मतदाता सूची में पुनरीक्षण का समर्थन किया है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘‘स्वच्छ और पारदर्शी मतदाता सूची लोकतंत्र की नींव है। घुसपैठिए और फर्जी मतदाता बंगाल के चुनाव का फैसला नहीं कर सकते।’’ उन्होंने तर्क दिया कि संदिग्ध प्रविष्टियों ने पिछले चुनावों के नतीजों को प्रभावित किया था।
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) और कांग्रेस ने इस प्रक्रिया के समय और तरीके का विरोध किया है। सीपीएम नेता सुजान चक्रवर्ती ने कहा,‘‘पारदर्शिता का स्वागत है, लेकिन भय पैदा करने वाली प्रक्रियाएं विश्वास को कम करती हैं।’’
एसआईआर की इस कवायद का सबसे चिंताजनक पहलू मताधिकार से वंचित होने के डर से जुड़ी कथित मौतें हैं। तृणमूल कांग्रेस ने चार नवंबर को एसआईआर शुरू होने के बाद से कम से कम 120 लोगों की मौत होने का दावा किया है, जिनमें मतदाताओं और बूथ अधिकारियों की कथित आत्महत्याएं भी शामिल हैं। बीजेपी ने इन मौतों को विशेष गहन पुनरीक्षण से जोड़ने के प्रयासों को खारिज करते हुए सत्तारूढ़ दल पर ‘राजनीतिक लाभ के लिए भय फैलाने’ का आरोप लगाया है।
हालांकि हाशिए पर पड़े समूहों के बीच भ्रम स्पष्ट नजर आ रहा है। सबसे अधिक प्रभावित लोगों में मतुआ समुदाय के कुछ वर्ग, दशकों पहले बांग्लादेश से आए कई प्रवासी और सीमावर्ती जिलों में रहने वाले बांग्ला भाषी मुसलमान शामिल हैं। प्रविष्टियों को 2002 के पुराने आंकड़ों से जोड़ने पर जोर देने से उन लोगों में अनिश्चितता पैदा हो गई है जिनके पास पुराने दस्तावेज नहीं हैं।
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