कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि जीएसटी परिषद की बैठक केवल सुर्खियांं बटोरने के लिए नहीं होनी चाहिए, बल्कि सहकारी संघवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विपक्ष शासित राज्यों ने जीएसटी दरों की संख्या और आम उपभोग की वस्तुओं की दरों में कटौती का समर्थन किया है, साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए एक तंत्र की मांग की है कि इसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचे।
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जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, विपक्ष-शासित आठ राज्यों (कर्नाटक, केरल, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, झारखंड) ने बड़े पैमाने पर उपभोग की वस्तुओं के लिए जीएसटी दरों में कटौती और जीएसटी स्लैब की संख्या कम करने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। हालांकि, उन्होंने इसके साथ कुछ महत्वपूर्ण मांगें भी रखी हैंः
1. एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जो सुनिश्चित करे कि दरों में कटौती का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंच सके।
2. पांच वर्षों तक सभी राज्यों को मुआवजा दिया जाए, जिसमें 2024/25 को आधार वर्ष माना जाए, क्योंकि दरों में कटौती से राज्यों की राजस्व आय पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है।
3. ‘सिन गुड्स’ और लग्ज़री वस्तुओं पर प्रस्तावित 40% से ऊपर अतिरिक्त शुल्क लगाए जाएं और उससे होने वाली पूरी आय राज्यों को हस्तांतरित की जाए। वर्तमान में केंद्र सरकार अपनी कुल आय का लगभग 17-18% विभिन्न उपकरों (सेस) से प्राप्त करती है, जिन्हें राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाता।
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कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि इन मांगों को पूर्णतया उचित माना जा रहा है, और इन्हें हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्रालय के राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (NIPFP) द्वारा प्रकाशित शोध-पत्रों का भी समर्थन प्राप्त है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लंबे समय से जीएसटी 2.0 की मांग कर रही है जो न केवल कर स्लैब को कम करे और दरों में कटौती करे, बल्कि प्रक्रियाओं और अनिवार्य औपचारिकताओं को भी सरल बनाए, खासकर एमएसएमई के लिए।
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रमेश ने कहा कि कांग्रेस पार्टी सभी राज्यों के हितों की पूरी तरह से रक्षा सुनिश्चित करने की अनिवार्यता पर भी ज़ोर दे रही है। उम्मीद है कि अगले सप्ताह होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक केवल सुर्खियां बटोरने का एक अभ्यास नहीं होगी- जैसा कि मोदी सरकार के साथ अक्सर होता रहा है, बल्कि यह सच्चे सहकारी संघवाद की भावना को भी अक्षरशः आगे बढ़ाएगी।
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