
आईपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस एक्ट की जगह लेने वाले तीन नए आपराधिक कानूनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई है। शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर प्रकाशित सूची के अनुसार, इस याचिका पर जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस पंकज मिथल की वेकेशन बेंच 20 मई को सुनवाई करेगी।
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इस याचिका में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में कई विसंगतियां हैं। वकील विशाल तिवारी द्वारा दायर याचिका में कहा गया है, "तीनों आपराधिक कानून बिना किसी संसदीय बहस के पारित किए गए। साथ ही संसद में उस वक्त अधिकांश सदस्य निलंबित थे।" इसके अलावा, याचिकाकर्ता का कहना है कि तीन कानूनों का टाइटल कानून की व्याख्या के हिसाब से ठीक नहीं है और कानून और उसके मकसद के बारे में नहीं बताता है।
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हाल के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विधायिका से भारतीय न्याय संहिता 2023 के प्रावधानों में जरूरी बदलाव करने पर विचार करने को कहा था, जिसमें विवाहित महिला पर किसी भी तरह की क्रूरता करने पर पति और उसके परिवार को सजा देने का प्रावधान है। नई दंड संहिता 1 जुलाई से लागू होनी है। कहा गया है कि नए कानून की धारा 85 और 86 आईपीसी की धारा 498ए की पूरी कॉपी के अलावा और कुछ नहीं है। इस पर विधायिका द्वारा फिर से विचार करने की जरूरत है।
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लोकसभा ने पिछले साल 21 दिसंबर को तीन प्रमुख कानूनों- भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता और भारतीय साक्ष्य (द्वितीय) विधेयक को पारित किया था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 25 दिसंबर को इन विधेयकों पर अपनी मुहर लगा दी थी। ये नये कानून क्रमश: भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लेंगे।
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