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प्रियंका गांधी का मोदी सरकार पर हमला, कहा- महिलाओं का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं प्रधानमंत्री, सरकार धोखाधड़ी...

प्रियंका गांधी ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने जिस ‘राजनीति की बू’ का जिक्र किया, वह इस विधेयक में पूरी तरह घुली हुई है। प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार यह विधेयक लाई है क्योंकि वह अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भागीदारी नहीं देना चाहती है।

फोटो: IANS
फोटो: IANS 

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने लोकसभा में महिला आरक्षण बिल को लेकर गुरुवार को कहा कि यह विषय आधी आबादी से जुड़ा है। लेकिन, सरकार इन विधेयकों की आड़ में ओबीसी समाज के साथ धोखाधड़ी कर रही है। हम इसका विरोध करते हैं।

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उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने अपने भाषण में इस बिल को रोके जाने का जिक्र किया। इसकी शुरुआत नेहरू नाम के व्यक्ति ने की थी। हालांकि, यह वो नेहरू नहीं हैं, जिनसे आप इतना कतराते हैं। यह उनके पिता मोतीलाल नेहरू थे, जिन्होंने 1928 में एक रिपोर्ट तैयार की थी। इसे उन्होंने कांग्रेस पार्टी की समिति को दिया था। वे समिति के अध्यक्ष थे और उन्होंने 19 मूल अधिकारियों की समिति बनाई थी। 1931 में कराची में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था, जहां इसे पारित किया गया था और वहीं से महिलाओं के समान अधिकार की शुरुआत हुई। उसी समय ‘वन वोट, वन सिटीजन, वन वैल्यू’ का सिद्धांत भी हमारी राजनीति में स्थापित हुआ। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस सिद्धांत के कारण हमारे देश की महिलाओं को वोट देने का अधिकार आजादी के पहले दिन से मिला। अमेरिकी महिलाओं को इस अधिकार के लिए डेढ़ सौ साल इंतजार करना पड़ा।

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उन्होंने कहा कि हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करना भी दुनिया में एक अनोखा कदम था। पंचायतों और नगरपालिकाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान भी कांग्रेस ने राजीव गांधी की अध्यक्षता में सदन में पेश किया था, लेकिन यह पारित नहीं हो पाया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में इसका जिक्र तो किया, लेकिन आधी बात ही बोली। उन्होंने कहा कि विरोध हुआ, लेकिन किसने किया, यह नहीं बताया। विरोध करने वाले आप ही लोग थे। कुछ साल बाद पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस अधिनियम को पारित किया। आज अपने भाषण में जब पीएम मोदी ने पंचायत की आंदोलित महिलाओं का जिक्र किया, तो यह समझ लीजिए कि इस कदम के चलते ही 40 लाख पंचायत प्रतिनिधियों में से 15 लाख महिलाएं लोकतंत्र में भागीदारी कर रही हैं।

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उन्होंने कहा कि साल 2010 में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को आरक्षण देने की फिर से कोशिश की। राज्यसभा में इसे पारित भी कराया गया, लेकिन लोकसभा में आम सहमति नहीं बन पाई। 2018 में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को एक पत्र लिखा और उसमें कहा कि महिलाओं के लिए आरक्षण 2019 तक लागू होना चाहिए। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री सदन में राहुल गांधी का मजाक बना लेते हैं, लेकिन घर जाकर उनकी बातों पर गौर जरूर करते हैं, क्योंकि आज हम उसी पर चर्चा कर रहे हैं। आज पीएम मोदी की बातों से लगा कि भाजपा ही महिला आरक्षण की चैंपियन, प्रस्तावक, और सबसे बड़ी समर्थक रही है, जबकि वे कह रहे थे कि उन्हें श्रेय नहीं चाहिए। कोई भी महिला आपको बता देगी कि बार-बार बहकाने वाले पुरुषों को महिलाएं पहचान लेती हैं।

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कांग्रेस सांसद ने कहा कि साल 2023 में राहुल गांधी का पत्र पढ़ने के कुछ साल बाद पीएम मोदी की सरकार ने इस अधिनियम को सर्वसम्मति से पारित किया, तब कांग्रेस ने इसका पूरा समर्थन किया। आज भी इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस महिला आरक्षण के पक्ष में डटकर खड़ी है, लेकिन सच्चाई यह है कि आज की चर्चा महिला आरक्षण पर नहीं है। जो विधेयक सरकार ने पेश किया है, उसे हमने पढ़ा है और उससे पूरी चर्चा बदल गई है। इसमें लिखा है कि महिला आरक्षण 2029 तक लागू होना चाहिए। हम सहमत हैं। आगे कहा गया है कि इसे लागू करने के लिए लोकसभा में सदस्यों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ानी होगी। मतलब सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 तक हो जाएगी। इसके लिए परिसीमन आयोग बनाया जाएगा, जो 2011 की जनगणना को आधार बनाकर यह काम करेगा। इसमें कोई आपत्तिजनक बात नहीं लगती, लेकिन गहराई से समझने पर इसका असली मकसद सामने आता है। इसमें पूरी तरह से राजनीति घुली हुई है। इसी सरकार ने 2023 में महिला आरक्षण विधेयक सर्वसम्मति से पारित कराया था। उसमें दो बातें थीं, जो इस विधेयक में नहीं हैं। उसमें कहा गया था कि इसे लागू करने से पहले नई जनगणना और परिसीमन कराया जाएगा। अब अचानक क्या हो गया?

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उन्होंने सवाल उठाया कि अब सरकार पुराने आंकड़ों पर आगे क्यों बढ़ना चाहती है? यह सच्चाई है कि प्रतिनिधित्व का सवाल जनसंख्या से जुड़ा हुआ है। जब तक जातीय जनगणना नहीं होती, तब तक सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल सकेगा। यह अनिवार्य है। सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर आगे बढ़ना चाहती है, क्योंकि उसमें ओबीसी वर्ग की जनसंख्या का आंकड़ा नहीं है। आज प्रधानमंत्री ने कहा कि इस वर्ग और उस वर्ग के बारे में हम बाद में देखेंगे। यह कौन सा वर्ग है? क्या ओबीसी वर्ग की बात हो रही थी? इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसे तकनीकी मुद्दा बताकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। हम कह रहे हैं कि इन्हें भी अपना हक मिलना चाहिए। पीएम मोदी किस बात से घबरा रहे हैं? क्या इस बात से कि नई जनगणना में ओबीसी वर्ग के असली आंकड़े सामने आएंगे और पता चलेगा कि यह वर्ग कितना बड़ा और मजबूत है? फिर उसके हक को कोई नकार नहीं पाएगा।

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उन्होंने कहा कि सरकार ओबीसी वर्ग के साथ अन्याय कर रही है और कांग्रेस ऐसा कभी नहीं होने देगी। संविधान सबका है और देश हर नागरिक का है। किसी एक का हक छीनकर देश नहीं चलाया जा सकता। संसद के 50 प्रतिशत विस्तार का प्रस्ताव है, लेकिन इसके लिए कोई ठोस प्रक्रिया नहीं बताई गई है। 1971 में हर प्रदेश की भागीदारी तय की गई थी और इसमें बदलाव पर रोक लगाई गई थी, लेकिन इस विधेयक के जरिए सब बदलने जा रहा है। पीएम मोदी और अन्य मंत्रियों के आश्वासन के बावजूद यह तय है कि संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव किया जाएगा। इतने बड़े बदलाव के लिए पूरी प्रक्रिया होती है, लेकिन सरकार की योजना उसे नजरअंदाज करने की है। जिस तरह असम में मनचाही सीटों को तोड़ा गया और राजनीतिक फायदे के लिए नई सीमाएं बनाई गईं, उसी तरह यह पूरे देश में किया जाएगा।

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प्रियंका गांधी ने कहा कि परिसीमन आयोग में चुने गए सरकार के तीन लोग राज्यों के वजूद और लोकतंत्र में उनकी भागीदारी तय करेंगे। लोकतंत्र को खत्म करने की शुरुआत सरकार पहले ही कर चुकी है और अब इस पर खुला वार होने जा रहा है। अगर यह विधेयक पारित हो गया, तो समझ लीजिए लोकतंत्र खतरे में आ जाएगा। मौजूदा सरकार देश की जनता की आंखों में धूल झोंककर देश की अखंडता पर बड़ा हमला कर रही है। एक तरफ महिला आरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं और दूसरी तरफ गुप्त रूप से ओबीसी वर्ग के लोगों का हक छीना जा रहा है। कुछ प्रदेशों की ताकत कम करके लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है और अगले चुनाव के लिए राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश हो रही है।

उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि गृह मंत्री हंस रहे हैं और पूरी योजना बना रखी है। चाणक्य अगर आज जिंदा होते, तो वे भी आपकी राजनीतिक कुटिलता पर चौंक जाते।

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उन्होंने कहा कि सरकार ने पूरी योजना बनाई है। चुनाव के बीच अचानक सदन की बैठक बुलाओ, सर्वदलीय बैठक मत बुलाओ, विधेयक का प्रारूप एक दिन पहले सार्वजनिक करो ताकि विपक्ष को चर्चा का मौका न मिले, और पहले से ही मीडिया में माहौल बना दो कि बड़ा विधेयक लाया जा रहा है। प्रधानमंत्री कई समस्याओं से घिरे हुए हैं और उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव है। महिला आरक्षण जैसे ऐतिहासिक कदम को सत्ता बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। जाति जनगणना को नकारकर ऐसी संसद बनाने की कोशिश हो रही है, जिसमें न केवल अभिव्यक्ति और चर्चा की कमी होगी, बल्कि पिछड़े वर्गों और राज्यों की समानता भी प्रभावित होगी। मौजूदा 543 सीटों में ही 33 प्रतिशत महिला आरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता? सभी वर्गों के लिए आरक्षण लागू कर इसे आज ही पारित किया जा सकता है।

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उन्होंने कहा कि हम बड़े शहरों में रहें या छोटे कस्बों में, पढ़ी-लिखी हों या अवसरों से वंचित, महिलाएं ही समाज का बोझ अपने कंधों पर उठाती हैं। हम ही राष्ट्र को आगे बढ़ाती हैं। हमारे अंदर दर्द और तकलीफ सहने की असीम क्षमता है, लेकिन आज इस संसद में खड़े होकर मैं अपने पुरुष साथियों को याद दिलाना चाहती हूं कि इस देश की महिलाएं कठिन से कठिन परिस्थितियों में अपने हक के लिए लड़ना जानती हैं। प्रधानमंत्री अगर महिलाओं का सम्मान करते, तो उनका राजनीतिक इस्तेमाल न करते। हम इन तीनों विधेयकों का सख्त विरोध करते हैं। अभी भी आप ऐसा निर्णय ले सकते हैं, जो सर्वसम्मति से पास हो जाए। मैं प्रधानमंत्री से अपील करती हूं कि वे साहस के साथ सही निर्णय लें, हम सब उनके साथ खड़े रहेंगे।

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प्रियंका गांधी ने कहा कि एक तरफ महिला आरक्षण और दूसरी तरफ आपको काट-पीट करने की, पूरे ढांचे को बदलने की स्वतंत्रता, ओबीसी वर्ग को नकारने की स्वतंत्रता। अध्यक्ष महोदय, राजनीति में कुटिल होना अपनी जगह है, शायद हमें और थोड़ा होना भी चाहिए, इस तरफ वालों को। लेकिन सत्ता बनाए रखने की महत्वाकांक्षाओं को परे करके देश के हित के लिए सही निर्णय लेना अलग है। शायद हम आदरणीय प्रधानमंत्री महोदय जी से आज ये उम्मीद नहीं रख सकते, क्योंकि वह समस्याओं से घिरे हुए हैं, उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बहुत है। महिला आरक्षण जैसे ऐतिहासिक कदम को उन्होंने सत्ता को बनाए रखने का एक कमजोर बहाना बना दिया है। जातीय जनगणना को नकारते हुए एक ऐसी संसद बनाना चाहते हैं जिसमें सिर्फ अभिव्यक्ति और चर्चा का ही अभाव नहीं होगा, बल्कि पिछड़े वर्गों और प्रदेशों की समानता का भी अभाव होगा। हमारी मातृभूमि की अखंडता का आधार है - वन सिटीजन, वन वोट, वन वैल्यू। अलग-अलग राज्यों का दर्जा बगैर किसी संवैधानिक प्रक्रिया के तय करना, इस अखंडता पर वार है। इससे हम कैसे सहमत हो सकते हैं?

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