
शिक्षा प्रणाली की अव्यवस्था और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर सोमवार (21 जुलाई, 2026 को) संसद चलो मार्च के बाद जंतर-मंतर को यूं तो पुलिस ने खाली करा दिया था, लेकिन रात होते-होते प्रदर्शनकारी फिर से वहां पहुंच गए। खासतौर से दूसरे शहरों से आए प्रदर्शनकारी धीरे-धीरे जंतर-मंतर लौटने लगे। इसके बाद 'कॉकरोच जनता पार्टी' के अभिजीत दिपके और सौरव दास भी वहां दिखे और मोबाइल फोन के टॉर्च की रोशनी में तोड़-फोड़ दिए गए ढांचे को फिर से खड़ा किया। पुलिस ने जंतर-मंतर के मुख्य धरना स्थल की बिजली काट रखी थी।
सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रंका ने कहा, "सिर्फ़ पुलिस ने ही लाठियां चलाईं। हमारे युवाओं को पीटा गया, उनके सिर फोड़ दिए गए और उन्हें सड़कों पर घसीटा गया। सोनम सर की पत्नी गीतांजलि मैम के बाल खींचकर उन्हें ट्रक से बाहर निकाला गया।" आशुतोष रंका ने सोमवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा से मुलाक़ात की थी। अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर वॉलंटियर्स, खासकर महिलाओं से माफ़ी मांगी कि वे पुलिस से उनकी सुरक्षा नहीं कर पाए।
इस दौरान पुलिस भी जंतर-मंतर पर तैनात रही। जंतर-मंतर के आस-पास की सड़कों पर बख्तरबंद गाड़ियां, बसें, बम निरोधक दस्ते और आंसू गैस वाली गाड़ियां खड़ी रहीं। इस बीच आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा, उत्तर प्रदेश आइसा के प्रमुख मनीष और आइसा की एक और सदस्य अमरीन को सोमवार सुबह अनशन खत्म करने के बाद हौज़ खास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया।
जानकारी के मुताबिक दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सोमवार को पुलिस की पिटाई के बाद लगभग 100 प्रदर्शनकारियों का इलाज किया गया। उनमें से कई के सिर में चोटें आईं और कम से कम चार लोगों को आईसीयू में भर्ती कराया गया, जिनमें से एक की हालत गंभीर बताई जा रही है। कई प्रदर्शनकारियों को गंभीर चोटें आई हैं, कई के हाथ और पैरों में फ्रैक्चर हुए हैं। दिल्ली पुलिस का दावा है कि ये चोटें प्रदर्शनकारियों के सड़क पर गिरने और भगदड़ मचने की वजह से आईं। हालाँकि, सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे सैकड़ों वीडियो क्लिप्स ने इस दावे को गलत साबित कर दिया, क्योंकि उनमें पुलिसकर्मी साफ़ तौर पर प्रदर्शनकारियों की पिटाई करते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह भी आरोप लगाया गया कि कई पुलिसकर्मियों की लाठियों में कीलें या नुकीली चीज़ें लगी हुई थीं। दिल्ली पुलिस द्वारा बड़ी संख्या में सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों को तैनात करने पर भी सवाल उठाए गए, जो प्रदर्शनकारियों के बीच घुल-मिल गए और उनकी पिटाई की।
प्रदर्शनकारियों को हटाने के बाद पुलिस ने जंतर-मंतर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेड लगा दिए थे, फिर भी कई प्रदर्शनकारी वहां से हटने को तैयार नहीं हुए। वे सोमवार देर शाम तक बैरिकेड के पास डटे रहे और सरकार के खिलाफ नारे लगाते हुए न सिर्फ़ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफ़े की भी मांग करते रहे। प्रदर्शनकारियों का एक और गुट केरल भवन के बाहर जमा रहा, जबकि राजीव चौक पर कुछ कमर्शियल दुकानों ने प्रदर्शनकारियों को पनाह और प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा दी।
जानकारी के मुताबिक पुलिस कई प्रदर्शनकारियों को छत्रसाल स्टेडियम ले गई। वकील और कांग्रेस की प्रवक्ता अवनी बंसल ने 16 मिनट का एक लंबा वीडियो शेयर किया, जिसमें दिखाया गया कि मुखर्जी नगर पुलिस स्टेशन में पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारियों के परिवार वालों और वकीलों को उनसे मिलने नहीं दे रहे थे। उन्होंने अपने नाम वाले बैज छिपा लिए थे और बस इतना कहा कि वे 'ऊपर से मिले आदेशों' का पालन कर रहे थे। बंसल ने तर्क दिया कि कानून के तहत पुलिस की पहली कार्रवाई यह होनी चाहिए थी कि वे परिवार को गिरफ्तारी या हिरासत के बारे में सूचित करते और उन्हें वकीलों से मिलने की इजाज़त देते।
इस बीच, एम्स नई दिल्ली के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र लिखा। राष्ट्रपति अभी विदेश यात्रा पर हैं। पत्र में इन घटनाओं की स्वतंत्र, निष्पक्ष और तय समय-सीमा के भीतर जांच करने, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर ज़रूरत से ज़्यादा बल प्रयोग के आरोपों की जांच करने और जहां भी गलत व्यवहार साबित हो, वहां जवाबदेही तय करने की मांग की गई है। पत्र में कहा गया है कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विरोध का सामना संयम, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ किया जाना चाहिए, न कि अनावश्यक बल प्रयोग से।