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PUCL समेत सौ से ज्यादा संगठनों की मांग, दमनकारी UAPA कानून वापस लिया जाए

विचार गोष्ठि में सामने आया कि यूएपीए का इस्तेमाल गरीबों, वंचितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, दलितों, वैचारिक और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हो रहा है। टाडा और पोटा का इस्तेमाल हिंसक घटना के आरोपितों के खिलाफ होता था, लेकिन यूएपीए के फंदे में कोई भी आ सकता है।

फाइल फोटोः सोशल मीडिया
फाइल फोटोः सोशल मीडिया 

पीयूसीएल समेत 100 से अधिक नागरिक अधिकार संगठनों द्वारा गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) के विरुद्ध आयोजित ऑनलाइन बैठक में विवादित कानून को खत्म करने की जोरदार मांग की गई। यूएपीए के विरुद्ध 20 से 22 जनवरी तक तीन दिवसीय विचार गोष्ठि के दूसरे दिन 21 जनवरी को असम, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा और केरल जैसे राज्यों के लोगों ने इस कानून के खिलाफ प्रस्तुती दीI पहले दिन 20 जनवरी को 3 राज्य- दिल्ली, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की प्रस्तुति हुई थी, जिसमें देश भर से अनेकों नामचीन वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, पत्रकार, महिला अधिकार कार्यकर्ता और छात्र आदि शामिल हुए।

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पीयूसीएल की कविता श्रीवास्तव ने बताया कि इन सभी प्रस्तुतियों में निरुकंश राज्य का भयावह चित्र उभरकर सामने आया हैI विचार गोष्ठि में सामने आया कि एक कागज का टुकड़ा, यूट्यूब पर सार्वजनिक तौर पर मौजूद वीडियो की सीडी या पेन ड्राइव, एक कथित ईमेल, कोई भी किताब, कोई बैनर, कोई नारा, किसी संगठन का सदस्य होने का आरोप, शांतिपूर्ण आंदोलन में शामिल होना… जैसी कोई भी बात किसी को भी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) का अभियुक्त बना सकती है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) इनकी जांच कर सकती है।

कविता श्रीवास्तव ने कहा कि यही नहीं, विचार गोष्ठि में सामने आया कि यूएपीए का इस्तेमाल गरीबों, वंचितों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, वैचारिक और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ खुलेआम हो रहा है। टाडा और पोटा का इस्तेमाल कोई हिंसक घटना के आरोपितों के खिलाफ होता था। लेकिन यूएपीए के फंदे में कोई भी आ सकता है। और तो और्, अदालतों में जज जैसे ही आरोप के साथ यूएपीए लगा देखते है, तो जमानत ही नहीं देते। लोग सालों से जेल में बंद पड़े हैं। गोष्ठि में सभी का मानना था कि इस कानून को वापस लेने के अलावा और कोई रास्ता नहीं हैI

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कर्नाटक में नाबालिग भी यूएपीए के तहत बंद हैं

कर्नाटक पीयूसीएल के राजेन्द्रन ने बताया कि राज्य में यूएपीए के तहत केस का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। हालांकि, पिछले साल अगस्त में डीजे हरहल्ली में पैगम्बर के कथित आपत्तिजनक कार्टून की प्रतिक्रिया में हुई हिंसा के मामले में 180 लोग यूएपीए के तहत बंदी हैं। उन्होंने बताया कि नागरिकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का एक दल दस दिनों की जांच के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि यह हिंसा सोशल मीडिया पोस्ट की प्रतिक्रिया और पुलिस की कार्रवाई में देरी की वजह से हुई। इस हिंसा में पुलिस की फायरिंग से चार लोग मारे भी गए थे। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था की समस्या या दंगे की घटना को आतंकवादी गतिविधि में बदल दिया गया। यूएपीए का इस्तेमाल ज्यादातर अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ किया जा रहा है। इससे स्थानीय लोगों का विश्वास पूरी तरह हिल गया है।

दूसरी ओर, वकील उस्मान ने कहा कि जिसने व्हाट्सएप या फेसबुक पोस्ट डाली उसे तो जमानत मिल गई, लेकिन हिंसा के आरोप में गिरफ्तार किसी को जमानत नहीं मिली। वकील बसवा कुनाले ने बताया कि डीजे हरहल्ली केस में 12 से 18 साल की उम्र के कई नाबालिग बच्चों को भी पकड़ा गया है। यही नहीं, जिनकी उम्र 19 बताई जा रही, उनकी उम्र का भी कोई सुबूत नहीं है। उनके मुताबिक इनमें कई नाबालिग हैं। ये गिरफ्तार बच्चे केवल तमाशबीन थे, या ट्यूशन पढ़कर आ रहे थे या वहां से गुजर रहे थे। मैत्रेयी कृष्णन ने जोड़ा कि यूएपीए का मनमाना इस्तेमाल हो रहा है।

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शांतिपूर्ण आंदोलनकारी अखिल गोगोई और उनके साथियों का दमन

असम में कृषक मुक्ति संग्राम समिति के अखिल गोगोई पिछले एक साल से जेल में है। उन पर यूएपीए के तहत कार्रवाई हुई है और एनआईए जांच कर रही है। वहां के वकील राहुल सेंसुआ ने बताया कि अखिल काफी समय से असम के लोगों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नागरिकता संशोधन कानून बनने के पहले से ही वे इसके खिलाफ आवाज उठा रहे थे। कानून बनने के बाद जब इसके विरोध में अभियान शुरू हुआ तो अखिल अलग-अलग जिलों में आयोजित सभाओं में हिस्सा ले रहे थे। इसी दौरान अखिल को गिरफ्तार किया गया। उनका मामला एनआईए को दे दिया गया।

उन्होंने बताया कि असम में अखिल गोगोई से पहले लोकतांत्रिक रूप से आंदोलन कर रहे किसी के खिलाफ यूएपीए नहीं लगा था। दिसम्बर 2019 से वह जेल में है। एनआईए की अदालत और हाईकोर्ट से उनकी जमानत रद्द हो गई है। जमानत के मामले में सुप्रीम कोर्ट का साफ निर्देश है, इसके बावजूद यूएपीए के तहत गिरफ्तार लोगों को जमानत नहीं मिल रही है। कृषक मुक्ति संग्राम समिति के छात्र मुक्ति संघर्ष से जुड़े बेदब्रता ने कहा कि हमारे संगठन को हर सरकार में दमन झेलना पड़ रहा है। हमारे सदस्य को हर जिले में आज भी प्रताड़ित किया जा रहा है।

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अदालतें जमानत नहीं दे रही हैं

महाराष्ट्र में यूएपीए की चर्चा शुरू करते हुए मशहूर वकील मिहिर देसाई ने कहा कि आज हम भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार लोगों की बात नहीं करेंगे। हम आज दिल्ली यूनिवर्सिटी के शिक्षक और यूएपीए के तहत गिरफ्तार साईंबाबा की बात करेंगे जो 90 फीसदी विकलांग हैं। हाईकोर्ट से भी उन्हें चिकत्सीय जमानत नहीं मिली है। वे सालों से जेल में हैं।

वकील वहाब खान ने एक कश्मीरी फारूक नाइकू के केस की जानकारी दी और बताया कि इस युवक को एक सीडी, पेन ड्राइव, ईमेल और नकली नोट चलाने के आरोप में पकड़ा गया। जिस सीडी के बिना पर उसे यूएपीए में गिरफ़्तार किया गया, उस सीडी में मौजूद सब कुछ यूट्यूब पर मौजूद है। मीडिया के लोग वही क्लिप इस्तेमाल कर रहे हैं। मगर उस पर यूएपीए का केस हो गया है। उस पर आरोप लगा कि हिज्बुल मुजाहिदीन से उसका जुड़ाव था। कई साल बाद उसे जमानत मिली।

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