
कांग्रेस ने सोमवार को कहा कि नरेन्द्र मोदी सरकार को जाति गणना की प्रक्रिया के विवरण को अंतिम रूप देने से पहले राजनीतिक दलों, राज्य सरकारों और नागरिक संगठनों के साथ संवाद करना चाहिए।
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पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह दावा भी किया कि मोदी सरकार ने जिस तरह से प्रश्नावली तैयार की है उससे उसकी वास्तविक मंशा और एक व्यापक, निष्पक्ष तथा देशव्यापी जाति जनगणना के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
रमेश ने एक बयान में कहा, ‘‘जनगणना-2027 का पहला चरण अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान होने वाला है। दूसरा चरण यानी जनसंख्या गणना, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर के बर्फ़ से ढके इलाकों में सितंबर 2026 में निर्धारित है, जबकि देश के बाकी हिस्सों में यह फरवरी 2027 में होगी।’’
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उनका कहना है, ‘‘30 अप्रैल 2025 को मोदी सरकार ने पूरी तरह यू-टर्न लेते हुए अचानक घोषणा की कि जाति गणना को जनगणना 2027 में शामिल किया जाएगा। इसके बाद 12 दिसंबर 2025 को यह घोषित किया गया कि जाति गणना, जनगणना के दूसरे चरण में होगी। यह याद दिलाना ज़रूरी है कि इससे पहले तक मोदी सरकार लगातार जाति जनगणना के विचार को ख़ारिज करती रही थी।’’
रमेश के अनुसार, अंततः प्रधानमंत्री मोदी को झुकना पड़ा और जाति जनगणना की व्यापक मांग को स्वीकार करना पड़ा जिसे कांग्रेस ने मुखर रूप से उठाया था।
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उन्होंने कहा, ‘‘मोदी सरकार ने अभी-अभी ‘हाउस-लिस्टिंग’ और ‘हाउसिंग जनगणना शेड्यूल’ में शामिल किए जाने वाले विषयों की सूची अधिसूचित की है। प्रश्न 12 में यह पूछा गया है कि क्या परिवार का मुखिया अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या ‘अन्य’ श्रेणी से संबंधित है, जबकि ओबीसी और सामान्य श्रेणी के बारे में स्पष्ट रूप से नहीं पूछा गया है।’’
कांग्रेस नेता ने दावा किया कि जाति गणना को जनगणना 2027 का हिस्सा बनाया जाना है। ऐसे में जिस तरह से प्रश्न 12 को तैयार किया गया है, वह मोदी सरकार की वास्तविक मंशा और एक व्यापक, निष्पक्ष तथा देशव्यापी जाति जनगणना के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस मोदी सरकार से मांग करती है कि जाति गणना की प्रक्रिया के विवरण को अंतिम रूप देने से पहले राजनीतिक दलों, राज्य सरकारों और नागरिक संगठनों के साथ तुरंत संवाद शुरू किया जाए।’’
रमेश ने यह भी कहा, ‘‘कांग्रेस का मानना है कि 2025 में तेलंगाना सरकार द्वारा किया गया सर्वे शिक्षा, रोज़गार, आय और राजनीतिक सहभागिता से जुड़ी जाति-वार महत्वपूर्ण जानकारी जुटाने का सबसे व्यापक और सही तरीका है, जो बृहद तौर पर आर्थिक और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए बेहद आवश्यक है।’’
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