
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका पर फैसला गुरुवार को सुरक्षित रख लिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने वर्मा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा और संसद के दोनों सदनों का प्रतिनिधित्व करने वाले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
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सुनवाई के दौरान, रोहतगी और लूथरा ने संसदीय समिति के गठन में अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाया और कहा कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 के तहत, केवल लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ही किसी न्यायाधीश को पद से हटाने के प्रस्ताव को स्वीकार करने के हकदार हैं। मेहता ने संसदीय समिति के गठन का बचाव करते हुए कहा कि यदि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार कर लिया गया है, तो जांच समिति का संयुक्त रूप से गठन लोकसभा अध्यक्ष और सभापति द्वारा किया जाएगा।
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बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि न्यायाधीश जांच अधिनियम के तहत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए जांच समिति गठित करने में कोई रोक नहीं है। वहीं इस तरह के एक प्रस्ताव लाने के संबंध में दिये गए नोटिस को राज्यसभा ने खारिज कर दिया था।
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न्यायमूर्ति वर्मा को 14 मार्च को नयी दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास पर नोटों की अधजली गड्डियां मिलने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया था। उच्चतम न्यायालय ने 16 दिसंबर को न्यायमूर्ति वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई थी जिसमें जांच समिति के गठन को चुनौती दी गई थी और लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय और संसद के दोनों सदनों के महासचिवों को नोटिस जारी किए थे।
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