
सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज की NSA के तहत की गई प्रिवेंटिव डिटेंशन को रद्द कर दिया
गैर-कानूनी हिरासत का आदेश जारी करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन के आधार पर किसी व्यक्ति को प्रिवेंटिव डिटेंशन में नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA), 1980 के तहत की गई हिरासत को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को भी पलट दिया, जिसमें अफरोज के खिलाफ जारी डिटेंशन ऑर्डर को बरकरार रखा गया था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मंगलवार, 29 सितंबर को मामले पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखने के लिए सिर्फ एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन यानी अदालत के बाहर दिए गए कबूलनामे को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि हिरासत का फैसला लेते समय संबंधित अधिकारी को मामले से जुड़ी दूसरी परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों पर भी विचार करना जरूरी है। कोर्ट के मुताबिक, मुल्ला अफरोज के मामले में अधिकारियों ने ऐसा नहीं किया और हिरासत की शक्तियों का उचित तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश गैर-कानूनी पाए जाने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने माना कि हिरासत का आदेश जारी करते समय जरूरी पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था।
नेशनल सिक्योरिटी एक्ट यानी NSA के तहत केंद्र और राज्य सरकारें किसी व्यक्ति को प्रिवेंटिव डिटेंशन में रख सकती हैं, अगर उसकी गतिविधियों से देश की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा होने की आशंका हो। NSA के तहत हिरासत की अधिकतम अवधि 12 महीने तक हो सकती है, हालांकि परिस्थितियों के अनुसार इसे इससे पहले भी समाप्त किया जा सकता है। इस कानून के तहत स्थानीय प्रशासन को भी हिरासत का आदेश जारी करने का अधिकार है।
हिरासत के आदेश की समीक्षा के लिए एक एडवाइजरी बोर्ड की व्यवस्था है, जिसकी अध्यक्षता हाई कोर्ट के मौजूदा या पूर्व जज द्वारा की जाती है। प्रिवेंटिव डिटेंशन सामान्य आपराधिक गिरफ्तारी से अलग होती है, क्योंकि इसका उद्देश्य किसी संभावित गतिविधि को होने से पहले रोकना होता है।
मुल्ला अफरोज संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा के मामले में आरोपी हैं। यह हिंसा शाही जामा मस्जिद के कोर्ट के आदेश पर किए जा रहे सर्वे के दौरान हुई थी। इस घटना में चार लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। हिंसा के करीब 54 दिन बाद मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी पुलिस कस्टडी में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर की गई थी। हालांकि, बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी थी।
इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को मुल्ला अफरोज के खिलाफ NSA के तहत डिटेंशन ऑर्डर जारी किया गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद अफरोज ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि हिंसा के दौरान पुलिस की ओर से भी गोली चलाए जाने का आरोप है, लेकिन इस पहलू की निष्पक्ष जांच नहीं की गई। याचिकाकर्ता ने इस मामले में प्रोटेस्ट पिटीशन यानी विरोध याचिका दाखिल करने की अनुमति दिए जाने की भी मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद NSA के तहत जारी डिटेंशन ऑर्डर को रद्द कर दिया।
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