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जंतर-मंतर की किलेबंदी और असहमति की आवाज़ों-अभिव्यक्ति पर पहरे लगाती सत्ता

सत्ता और सत्ता से सुरताल मिलाने वाली व्यवस्था को जंतर-मंतर से उठने वाली आवाज़े अखरती हैं। इसीलिए जंतर-मंतर की किलेबंदी और वहां तक पहुंचने के रास्तों पर बिठा दिए गए हैं पहरे।

Getty Images
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अगर आप दिल्ली-एनसीआर से बाहर के निवासी हैं और कभी जंतर मंतर नहीं गए हैं, फिर भी धरनास्थल जाकर प्रोटेस्ट में शामिल होना चाहते हैं, तो आपके लिए प्रदर्शन स्थल तक पहुंचना अब मुश्किल हो सकता है। 25 सितंबर 2026 को जंतर मंतर पर सीपीआई-एमएल के नेता दीपांकर भट्टाचार्य, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की अगुवाई में जब लोगों का हुजूम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करने पहुंचा तो पाया कि जंतर मंतर को बैरिकेडिंग करके 'लॉक' कर दिया गया है।  

जंतर मंतर जाने वाले हर रास्ते पर बैरिकेडिंग थी, पुलिस का पहरा था। कॉकरोच जनता पार्टी की अगुवाई में हुए छात्र-युवा आंदोलन के बाद बैरिकेडिंग बढ़ा दी गई है। ऐसा लगता है जैसे पूरे इलाके की किलेबंदी कर दी गई हो। सीपीआई-एमएल के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य कहते हैं कि ‘जंतर मंतर अब प्रोटेस्ट साइट नहीं रहा, वह दिल्ली पुलिस का कैंटोनमेंट बन गया है। यह सिर्फ नागरिक आंदोलन के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए भी चिंता का सबब है।’  

जंतर-मंतर जाने वाली सड़क पर खड़े अवरोध (फोटो - Getty Images)

सत्ता को और सत्ता से सुरताल मिलाने वाली व्यवस्था को जंतर-मंतर की आवाज़े अखरने लगी हैं। शायद इसीलिए अगस्त 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रदर्शनस्थल के तौर पर जंतर मंतर के इस्तेमाल पर सवाल उठाया था। जस्टिस अमित महाजन ने कहा था कि ‘दिल्ली को अनावश्यक तौर पर बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए।’ जस्टिस महाजन ने यह टिप्पणी ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमिटी की याचिका पर सुनवाई करते हुए की थी। हाईकोर्ट का यह ऑब्जर्वेशन तब आया था, जब 8 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह जंतर मंतर के बजाय रामलीला मैदान को मुख्य धरनास्थल के तौर पर मान्यता दे।

जंतर मंतर, दिल्ली के केंद्रीय इलाके में है। यहां से संसद थोड़ी ही दूर है और पिछले 3 दशक से यह सड़क लोकतांत्रिक असहमतियों और अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का केंद्रीय स्थल है। धरनास्थल दरअसल, एक सड़क है, जो 18वीं सदी की खगोलीय वेधशाला जंतर मंतर के विपरीत मौजूद है, इसी वेधशाला के नाम पर सड़क का नाम जंतर मंतर रोड है। इससे पहले दिल्ली में बोट क्लब पर धरना प्रदर्शन होते थे।

ऐसे स्थान पर प्रदर्शनस्थल का होना, इसे महत्वपूर्ण बनाता है, जहां उठने वाली हर गूंज संसद तक सुनाई देती है। ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक ‘जंतर मंतर का आधिकारिक तौर पर प्रदर्शनस्थल होने का कोई नोटिफिकेशन नहीं है, लेकिन समय के साथ प्रशासनिक प्रक्रिया ने इसे यह दर्जा दिया है।’ 2003 में दिल्ली पुलिस ने एक स्टैडिंग ऑर्डर जारी किया था, जिसमें जंतर मंतर और रामलीला मैदान को विरोध प्रदर्शन, रैली और जुलूस के लिए आधिकारिक स्थल के तौर पर चिन्हित किया गया था।

25 सितंबर को संसद मार्ग थाने के सामने के घुमावदार गलियार से जंतर-मंतर जाने वाले रास्ते पर बैरिकेंडिंग लगाता पुलिस

मुख्य धरनास्थल तक पहुंचने के रास्ते

मान लीजिए आप दिल्ली मेट्रो से जंतर मंतर पहुंचना चाहते हैं, इसके लिए सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन जनपथ है। यहां गेट नंबर 2 से निकलकर आप जंतर मंतर जा सकते हैं, लेकिन अब यहां बैरिकेडिंग है, पुलिस मौजूद रहती हैं। साथ में रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) भी रहती है। प्रोटेस्ट के दिन तलाशी और पूछताछ तेज हो जाती है। हर आने जाने वाले से सुरक्षाकर्मी पूछताछ करते हैं।

अगर आप इस रास्ते से निकलकर आगे बढ़ने में कामयाब रहे, तब भी आगे चलकर आपको घुमावदार जंतर मंतर लेन पर मुख्य धरना स्थल से ठीक पहले दो लेवल की बैरिकेडिंग मिलेगी। सीजेपी के प्रोटेस्ट के दौरान यहां बड़ी संख्या में पुलिस तैनात थी। यहां सामान की चेकिंग के लिए मशीनें होती थीं। यहां चेकिंग के बाद वह आगे जाने देते थे, लेकिन 25 सितंबर को यह रास्ता पूरी तरह बंद था।   

दूसरे विकल्प की तलाश में आप संसद मार्ग पर आकर आगे बढ़ें तो टॉलस्टॉय मार्ग और संसद मार्ग के टी-प्वाइंट पर बैरिकेडिंग के साथ पुलिस खड़ी मिलती है। जंतर मंतर जाने का यह मुख्य रास्ता है, लेकिन अब यह बंद रहता है। ऐसे में आपको संसद मार्ग पुलिस थाने के सामने से जो घुमावदार गलियारा केरला भवन की ओर जाता है, उससे जाने का विकल्प है। 25 सितंबर को इस रास्ते पर दो जगह बैरिकेडिंग थी, यानी आप किसी भी तरह इस रास्ते से जंतर मंतर के मुख्य धरना स्थल तक नहीं पहुंच सकते।

जनपथ मेट्रो स्टेशन से जंतर-मंतर की तरफ जाने वाले रास्ते पर भी तैनात रहते हैं सुरक्षा कर्मी

सीजेपी के आंदोलन के दौरान इस रास्ते से मंच तक पहुंचना आसान था, ज्यादातर नेता और सामाजिक कार्यकर्ता इसी रास्ते मंच तक पहुंचते थे। सामान्य दिनों में पुलिस इस गलियारे में बैरिकेडिंग नहीं करती है, क्योंकि इस रास्ते के जरिए लोग अपने दफ्तर भी जाते हैं। 

अगर आप इस रास्ते को चुनते हैं तो आप केरला भवन के पास पहुंच सकते हैं। यहां टी-प्वाइंट पर जनता दल यूनाइटेड का कार्यालय आपको दिखेगा। बाएं ओर खाने पीने की दो तीन दुकानें दिखेगी। इसमें से एक दुकान अपने डोसा के लिए मशहूर है।  

पुलिस ने अब इन दुकानों की भी बैरिकेडिंग कर दी है। दुकानों के ठीक सामने से घेरा बनाते हुए पुलिस ने दो लेवल पर बैरिकेड खड़े कर दिए हैं। यहां खड़े बैरिकेड्स को आपस में वेल्डिंग करके जोड़ा गया है, ताकि एक दीवार की तरह हमेशा मौजूद रहें, लेकिन यहां पहुंचने के लिए आपको बैरिकेड की पहली पंक्ति पार करनी होगी, जो संभव नहीं है। 

25 सितंबर को पुलिस ने इसी बैरिकेड के सामने एक बस भी खड़ी कर दी थी। यानी किसी भी स्थिति में लोगों की भीड़ मुख्य धरनास्थल तक पहुंच नहीं सकती। सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान इन्हीं बैरिकेड के बीच से पुलिस ने जनता के लिए चेक प्वाइंट के जरिए रास्ते बनाए थे, जिनके जरिए लोगों को एंट्री दी जाती थी, लेकिन अब उसे भी बंद कर दिया गया है। 

जंतर मंतर पहुंचने का एक तीसरा रास्ता केरला भवन के सामने से आना है। सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान केरला भवन के ठीक सामने पुलिस ने बैरिकेडिंग कर रखी थी, लेकिन आज की तारीख में इसे हटा लिया गया है। इस रास्ते से अगर आप दाखिल होते हैं तो आप जेडीयू कार्यालय के पास पहुंच सकते हैं, यहां से आपके लिए आगे बढ़ना मुश्किल होगा। 

आइसा की नेशनल प्रेसिडेंट नेहा बोरा कहती हैं कि ‘सीएए आंदोलन के समय जंतर मंतर पर केरला भवन और यूपी भवन तक विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, और तमाम संगठनों के लोग इन प्रोटेस्ट में शामिल हो रहे थे। मगर कोविड में लॉकडाउन के समय से ही जंतर मंतर को बैरिकेडिंग लगाकर सील कर दिया गया। फिर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश आया कि आपको प्रोटेस्ट करना है तो जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट करिए या रामलीला मैदान चले जाइए। धीरे-धीरे जंतर मंतर को लेकर एक विस्तृत प्रक्रिया आने लगी, जिसमें विरोध प्रदर्शन के लिए 10 दिन पहले लिखित अनुमति लेने की बात कही जाती है। पुलिस वॉलंटियर्स और वीआईपी की लिस्ट मांगती है। साथ ही उनके साथ सिक्योरिटी में कौन होगा, उनका नाम भी मांगती है। इस तरह जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट करने को जटिल बना दिया जाता है। 

जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘जंतर मंतर या बोट क्लब पर धरना प्रदर्शन को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।’ कोर्ट ने संबंधित विभागों को यह निर्देश दिया था कि वह प्रदर्शनकारियों और स्थानीय निवासियों के अधिकारों के बीच सामंजस्य बनाते हुए गाइडलाइन तैयार करें। 2018 में ही दिल्ली पुलिस ने स्टैंडिंग ऑर्डर 10 के जरिए 1000 लोगों के धरना प्रदर्शन के लिए जंतर मंतर को निर्धारित किया। इससे ज्यादा कि भीड़ को केवल रामलीला मैदान में प्रदर्शन की अनुमति दी जाती है।

ध्यान दें कि किसान आंदोलन के समय भी देश भर के किसान प्रदर्शन के लिए जंतर मंतर या रामलीला मैदान जाने की अनुमति मांग रहे थे, लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें दिल्ली में घुसने भी नहीं दिया, और किसानों ने दिल्ली-हरियाणा और दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर कम से कम 12 महीने तक डेरा डाले रखा, मगर उन्हें दिल्ली में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। 

 नेहा कहती हैं कि ‘जब जनता के मूल अधिकारों का हनन होता है तो विरोध प्रदर्शन करना जनता का संवैधानिक अधिकार है। इस अधिकार को ना छीनते हुए भी कैसे छीन सकते हैं, उस चीज को व्यवस्था का रूप दे दिया गया है। यह सब दिल्ली और देश भर में देखने को मिल रहा है।’

भीड़ को तितर बितर करने के पुलिसिया तरीके 

25 सितंबर को पुलिस ने जिस तरह प्रदर्शन को दबाने के लिए जोर जबरदस्ती की, उसे किसी भी तरह जायज नहीं कहा जा सकता। पुलिस ने जैसे ही देखा कि प्रदर्शन के लिए जुटे लोग मीडिया से बात करने में लगे हैं। चार-पांच के गुट में पुलिस वालों ने एक-एक व्यक्ति को घसीटकर बस में भरना शुरू कर दिया। जैसे ही एक बस भरती, दूसरी बस खड़ी हो जाती, फिर पुलिस वाले लोगों को उठा-उठा कर भरने लगते। किसी भी प्रोटेस्ट को खत्म कराने का यह दिल्ली पुलिस का अब चिर-परिचित अंदाज हो गया है।   

यही नहीं, जंतर मंतर पर होने वाले ज्यादातर प्रोटेस्ट शांतिपू्र्ण ही होते हैं, लेकिन अगर कोई उत्साही कार्यकर्ता मीडिया से बात करते हुए जोर-जोर से नारे लगाने लगे, चिल्लाने लगे, तो पुलिस वाले भीड़ में घुस जाते हैं और उक्त उत्साही पकड़कर पुलिस की बस में बिठा देते हैं। 

दिल्ली में अब कहीं पर भी प्रदर्शन के लिए पुलिस की अनुमति अनिवार्य है। यूथ कांग्रेस से जुड़े रज़ा अहमद कहते हैं कि ‘अगर हमें अपने कार्यालय के अंदर भी प्रदर्शन करना है तो पुलिस की परमिशन अनिवार्य है।’ 24 सितंबर को यूथ कांग्रेस, केंद्रीय निर्वाचन आयोग के कार्यालय तक मार्च निकालने की तैयारी में थी, लेकिन पुलिस ने कार्यालय के मेन एंट्री गेट पर ही बैरिकेडिंग कर दी। 

पिछले वर्षों में एक रिपोर्टर के तौर पर मैंने दर्जनों बार पुलिस का यह रवैया देखा है, जबकि दिल्ली पुलिस ने ही प्रदर्शन की अनुमति दी होती है, और जब कांग्रेस के लोग अपने मुख्यालय के गेट पर प्रदर्शन करते हैं तो पुलिस यह घोषणा करती है कि ‘इस स्थान पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 लागू है, और आपको प्रोटेस्ट की अनुमति नहीं है। अपना प्रोटेस्ट बंद करिए। जब प्रोटेस्ट बंद नहीं होता है, पुलिस कार्यकर्ताओं को पकड़कर बस में बिठाती है और फिर कहीं और ले जाकर छोड़ देती है ।’  

सिर्फ प्रदर्शनकारियों के साथ ही नहीं, मीडिया से भी डील करने का दिल्ली पुलिस का रवैया बदला है। किसी भी प्रोटेस्ट को कवर करने के लिए मीडिया की मौजूदगी होती है, जाहिर है सोशल मीडिया के जमाने में अब पत्रकारों की संख्या बढ़ गई है। 25 सितंबर को जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं को बस में भरकर रवाना कर दिया तो मीडिया को हटाने के लिए उसने जोर-शोर से सीटी बजाना शुरू कर दिया।

पुलिस का यह रवैया पिछले कुछ महीनों से लगातार देखने को मिला है। वैसे तो पुलिस पत्रकारों पर एक्शन लेने में हिचकती नहीं है, लेकिन उनके काम को बाधित करने के लिए अब वह सीटी बजाने लगती है। ताकि ना कोई सवाल सुन पाए और ना जवाब दे पाए। मौजूदा सत्ता के रवैये को परिभाषित करने के लिए इससे बेहतर मुहावरा क्या ही होगा।

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