
आज के भारत में एक जाना-पहचाना पैटर्न देखने को मिलता है। पहले किसी मामले में कोई असहमति सामने आती है। फिर उसकी जांच शुरू होती है। अक्सर इसके बाद सिर्फ़ सवाल-जवाब या मुक़दमा ही नहीं होता, बल्कि असहमति जताने वाले व्यक्ति के आर्थिक मामलों की भी बारीकी से जांच-पड़ताल की जाती है।
इसका ताज़ा उदाहरण सूरत से सामने आया, जहां एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके के पिता—जो महाराष्ट्र सरकार के रिटायर्ड कर्मचारी हैं—की आर्थिक स्थिति की जांच की मांग की। इसकी अजीब वजह यह बताई गई कि उनका बेटा अमेरिका में पढ़ा था। कुछ दिनों बाद, एक और रिपोर्ट से पता चला कि दिल्ली पुलिस उन बैंक अकाउंट्स की जानकारी इकट्ठा कर रही थी जिनका इस्तेमाल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों के खाने-पीने का खर्च उठाने के लिए किया गया था।
ये कोई अलग मामले नहीं हैं। ये इस बात की याद दिलाती हैं कि जिसे सरकार गर्व से "नया भारत" कहती है, वहां आलोचकों, निगरानी रखने वालों, ट्रेड यूनियन के सदस्यों, कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विरोधियों को अब शक की नज़र से देखा जाता है।
इसी साल कुछ सप्ताह पहले नोएडा में मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने वाले मजदूर कार्यकर्ता सत्यम वर्मा के बैंक खातों की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस ने चुपचाप की। जल्द ही कुछ वित्तीय जानकारियां मीडिया के कुछ हिस्सों तक पहुंच गईं, जिससे गोपनीयता और राजनीतिक तौर पर निशाना बनाए जाने को लेकर असहज करने वाले सवाल उठे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले साल लद्दाख में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान केंद्रीय एजेंसियों ने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और उनसे जुड़े संस्थानों के वित्तीय मामलों की जांच भी की थी।
नागरिकों के बैंकिंग रिकॉर्ड तक ऐसी पहुंच के लिए अब तक कम से कम न्यायिक निगरानी की ज़रूरत होती थी। वह सुरक्षा अब खत्म होने की कगार पर है।
इस हफ़्ते लोकसभा में बिना किसी बहस के, ध्वनि मत से पास हुआ 'बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल, 2026' सिर्फ़ 135 साल पुराने औपनिवेशिक कानून को डिजिटल युग के हिसाब से अपडेट करना नहीं बल्कि उससे कहीं ज़्यादा है। तकनीकी आधुनिकीकरण की भाषा के पीछे नागरिक और राज्य के बीच संतुलन में एक गहरा बदलाव छिपा है।
सरसरी तौर पर तो यह बिल पूरी तरह से सही लगता है। आजकल बैंकिंग रिकॉर्ड धूल भरे बही-खातों में नहीं, बल्कि क्लाउड सर्वर, डिजिटल डेटाबेस और डिज़ास्टर-रिकवरी सेंटरों में मौजूद होते हैं। इनके सबूत के तौर पर इस्तेमाल होने से जुड़े कानूनों को अपडेट करने की साफ़ ज़रूरत थी।
लेकिन समस्या कहीं और है।
बदले हुए कानून की धारा 11 चुपचाप किसी व्यक्ति के बैंकिंग रिकॉर्ड पेश करने के लिए मजबूर करने का अधिकार एक स्वतंत्र अदालत से हटाकर, पुलिस अधीक्षक (एसपी) या सरकार द्वारा अधिसूचित किसी अन्य अधिकारी (जो एसपी से कम रैंक का न हो) को सौंपती है। यानी जिस काम के लिए पहले न्यायिक मंज़ूरी की ज़रूरत होती थी, उसे अब वही एजेंसी मंज़ूरी दे सकती है जो जांच कर रही है।
यह एक बदलाव हर नागरिक के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
बैंक स्टेटमेंट सिर्फ़ पैसे जमा करने और निकालने का हिसाब-किताब नहीं होता। यह एक तरह की निजी जीवन-कहानी होती है। इससे पता चलता है कि हम किन अस्पतालों में जाते हैं, कौन-सी किताबें खरीदते हैं, किन संगठनों का समर्थन करते हैं, किन यूनियनों से जुड़ते हैं, किन चैरिटी संस्थाओं को दान देते हैं और किन राजनीतिक कामों में हमारा पैसा लगता है। इससे किसी पत्रकार के गुप्त सूत्रों का पता चल सकता है, किसी एक्टिविस्ट के नेटवर्क का खाका तैयार हो सकता है या किसी विरोध-प्रदर्शन की आर्थिक रीढ़ की पहचान हो सकती है।
यही कारण है कि ऐसी जानकारी तक पहुंच परंपरागत रूप से न्यायिक जांच के अधीन रही है। एक न्यायाधीश यह निर्धारित करने के लिए जांच करने वाली एजेंसी या अधिकारी और नागरिक के बीच खड़ा होता है ताकि सुनिश्चित हो सके कि क्या ऐसी घुसपैठ आवश्यक, आनुपातिक और वैध है।
लेकिन नया विधेयक उस संवैधानिक सुरक्षा को हटा देता है।
उतनी ही चिंता की बात यह भी है कि इस कानून में क्या शामिल नहीं है। खाता धारक को यह बताने की कोई ज़रूरत नहीं है कि उनके फाइनेंशियल रिकॉर्ड मांगे गए हैं। ज़रूरत या अनुपात के आधार पर इसकी कोई न्यायिक जांच नहीं होती है। जानकारी के खुलासे को सिर्फ़ संबंधित अकाउंट या समय-सीमा तक सीमित रखने के लिए कोई सुरक्षा उपाय नहीं हैं। ऐसी कोई रोक नहीं है जो असंबंधित ट्रांज़ैक्शन की जानकारी को उजागर होने से रोके। जानकारी मिलने के बाद उसके दोबारा इस्तेमाल पर कोई रोक नहीं है, जांच पूरी होने के बाद रिकॉर्ड नष्ट करने की कोई बाध्यता नहीं है, और अगर ज़रूरत से ज़्यादा या गलत फाइनेंशियल जानकारी तक पहुंच बनाई जाती है या वह लीक हो जाती है, तो इसके लिए लगभग कोई उपाय या समाधान नहीं है।
सरकार कहती है कि ईमानदार नागरिकों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन इतिहास कुछ और ही बताता है।
देश में बार-बार देखा गया है कि वित्तीय जांच का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के तौर पर किया जाता रहा है। रेगुलेटरी कार्रवाई के ज़रिए एनजीओ को ठप कर दिया गया है। पत्रकारों को टैक्स से जुड़ी जांच का सामना करना पड़ा है। विपक्षी नेताओं को कई एजेंसियों की एक साथ जांच का सामना करना पड़ा है। मजदूर संगठनों की निजी आर्थिक स्थिति की भी जांच की गई है। हर जांच सही थी या नहीं, यह अलग बात है। लेकिन इसका कुल मिलाकर जो असर हुआ है, वह साफ़ है: डर।
नागरिकों की निगरानी की शक्तियां बढ़ाने वाले कानूनों का लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने के लिए हर मामले में गलत इस्तेमाल होना ज़रूरी नहीं है। इनका होना ही लोगों को खुद पर पाबंदियां लगाने (सेल्फ-सेंसरशिप) के लिए बढ़ावा देता है। नागरिक किसी नागरिक अधिकार संगठन को दान देने, विरोध-प्रदर्शन के लिए फंड में योगदान करने, किसी ट्रेड यूनियन का समर्थन करने या सत्ता को चुनौती देने वाले किसी आंदोलन की आर्थिक मदद करने से पहले दो बार सोचने लगते हैं। अक्सर, असल गलत इस्तेमाल से पहले ही लोगों में डर का माहौल बन जाता है।
इनमें से कुछ भी होना ज़रूरी नहीं था।
यह कानून आसानी से बैंकिंग सबूतों को आधुनिक बना सकता था और साथ ही न्यायिक अधिकार भी बनाए रख सकता था। इसमें कुछ खास मामलों में छूट का प्रावधान हो सकता था, जिनकी अदालतें फौरी समीक्षा कर सकें। यह जांच खत्म होने के बाद खाताधारक को बताना ज़रूरी कर सकता था, फाइनेंशियल रिकॉर्ड के दूसरे इस्तेमाल पर रोक लगा सकता था, सिर्फ काम भर की जानकारी देने की ज़रूरत बता सकता था, और ज़रूरी निजता के उपाय शामिल कर सकता था।
इसके बजाय, संसद ने जांच के बजाय जल्दीबाज़ी को चुना।
लोकसभा ने बिना किसी बहस, चर्चा या क्लॉज़-बाय-क्लॉज़ जांच के, रुकावटों के बीच कानून पास कर दिया।
राज्यसभा के पास अभी भी इसमें सुधार करने का मौका है।
लोकतंत्र को इस बात से नहीं मापा जाता कि सरकार अपने नागरिकों के बारे में कितनी जानकारी इकट्ठा कर सकती है, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि वह कितनी सावधानी से उन जानकारियों को इकट्ठा करने से खुद को रोकती है जिनकी उसे ज़रूरत नहीं है। ऐसे दौर में जब बैंक खाते हमारी ज़िंदगी की डिजिटल डायरी बन गए हैं, न्यायिक निगरानी को कमज़ोर करना कोई प्रशासनिक सुधार नहीं है—यह सरकारी निगरानी का विस्तार है।
और एक बार जब ऐसी शक्तियां कानून का हिस्सा बन जाती हैं, तो इतिहास गवाह है कि वे शायद ही कभी बिना इस्तेमाल के रहती हैं।
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