हालात

खुद की जिंदगी में अंधेरा, पर मिट्टी को आकर देकर जहां की दिवाली रोशन करने में जुटे हैं दीये बनाने वाले केशव और ऋषिपाल

रोशनी के त्योहार दिवाली पर मिट्टी के दीये जलाने की बात ही कुछ और है। कच्ची मिट्टी को आकार देने के बाद तपाकर इन दीयों से जहां रोशन करते हैं केशव, सुखीबीरा और ऋषिपाल। लेकिन इनकी अपनी जिंदगी में कितना अंधेरा है, इसका अनुमान इनके करीब जाने पर ही लग सकता है।

फोटो : आस मोहम्मद कैफ
फोटो : आस मोहम्मद कैफ 

दिवाली पर यूं तो मिट्टी के दीयों से खूब जगमग होती है। लेकिन कभी सोचा है इन्हें बनाने वालों की जिंदगी में कितना अंधेरा है। आइए आपको मिलाते हैं केशव और ऋषिपाल से, जो मिट्टी को आकार देकर रोशन करते हैं दिवाली

सुखबीरी का बस नाम ही सुखबीरी है। सुख उसकी जिंदगी से रूठा हुआ है। उसकी आंखों ने देखना बंद कर दिया है। दो बेटे हैं जो सिलाई का काम करते हैं। एक दिल्ली और दूसरा पानीपत रहता है। दिल्ली से 110 किमी दूर मुकल्लमपुरा में 71 साल की सुखबीरी अपने सर पर उपलों (गोबर ईंधन) की टोकरी रखकर अनुमान के सहारे अपने बिटौड़े (उपलों का स्टॉक रूम) से घर तक का सफर बेहद धीमे तय करती है। घर के अंदर कदम रखकर सुखबीरी अपने पति केशवराम को कहती है कि भट्टी लगा लीजिये।

73 साल के केशवराम सुबह 4 बजे से दीये बना रहे हैं। भट्टी की आंच अब उनके बनाये हुए दिये को पक्का बनाने की अगली प्रकिया है। इन दीयों को इस भट्टी में उपलों के बीच रखा जाएगा और लगभग दो दिन बाद निकाला जाएगा। केशवराम बैचेन से दिखते है और सुखबीरी के कहने के बाद तेजी से सक्रियता दिखाते है। यूं तो केशवराम प्रजापति को यह याद नहीं है कि वो कब से इस कच्ची मिट्टी को आकार देकर आग में तपाकर पक्का कर रहे हैं, मगर वो ये जरूर कहते हैं कि यह उनका पुशतैनी काम है।

केशव कहते हैं 40 - 50 साल हो गए हैं या फिर उससे भी ज्यादा ! बच्चे अब इस काम को नहीं करना चाहते। वो दोनों सिलाई का काम करते हैं। वो कामयाब है और हम मिट्टी में सने हुए हैं। मैं उनके फैसले से खुश हूं। केशवराम हमें मिट्टी की गुल्लक और एक घड़ा दिखाते हैं और बताते हैं कि वो 15 ₹ की गुल्लक और 60 रुपये का घड़ा बेचते हैं। जिसका हमेशा पूरे दिन में एकाध भी ग्राहक नहीं आता।

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केशवराम के लिए दिवाली जरूर जगमग माहौल बनाती है। वो कहते हैं कि मिट्टी के उनके दीये बिक रहे हैं। केशव मिट्टी के सौ दीये 70 ₹ के बेचते हैं, हालांकि कुछ इससे सस्ते भी दे रहे हैं, मगर केशवराम इससे कम नहीं देना चाहते हैं। बताते हैं कि वो और उनकी पत्नी सुखबीरी दोनों मिलकर 300 से 400 दीये हर दिन बना लेते हैं। दीवाली के इस महीने में वो 5 से 7 हजार रुपये कमा लेंगे।

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फोटो : आस मोहम्मद कैफ

केशवराम के घर की हालत बेहद खराब है। एक कमरे में मिट्टी भरी हुई है। कमरे के बाहर वाले छप्पर के नीचे दीये रखे हुए हैं। तीन चारपाई है जिनके ऊपर मिट्टी के बर्तन रखे हुए हैं। केशवराम की पत्नी सुखबीरी उदास मन से कहती है,आप बात कर लीजिये मगर हम आपको बैठने की जगह नहीं दे सकते। केशव का चाक बंद है और आज वो सुबह बनाए हुए अपने दीये पक्का करने की जुस्तुज में जुटे हैं। हल्का सा खराब मौसम और बारिश की चार बूंदे केशव का सब कुछ बर्बाद कर सकती है,मगर केशव का दिल न दुख जाए इसलिए यह बात हम उनसे कह नहीं सकते।

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मुकल्लमपुरा नाम वाले इस गांव में 1500 लोगों में सबसे बड़ी तादाद में कुम्हार बिरादरी के लोग रहते हैं। प्रजापति कहलाये जाने वाले इस समाज के अधिकतर लोगों ने अब मिट्टी के बर्तन बनाने का काम छोड़ दिया है, हालांकि दीवाली के नज़दीक कुछ परिवार पुनः अपने चाक पर करतब दिखाने लगते हैं।

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फोटो : आस मोहम्मद कैफ

गांव के बाहर सड़क के किनारे चाक चला रहे ऋषिपाल कहते हैं कि "कुम्हार 11 महीने में काम करके इतना नही कमा सकते हैं जितना एक महीने दीवाली का अच्छा जाता है।" ऋषिपाल बताते हैं कि वो इस महीने 6-7 हजार रुपये कमा लेते हैं। इसके अलावा शेष 11 महीनों में इक्का-दुक्का ग्राहक ही आता है। ऋषिपाल के भी दोनों लड़के इस काम को छोड़ चुके हैं। ऋषिपाल कहते हैं यह एक कला है जो अब खत्म हो रही है। इसमें पैसा कम है और मेहनत ज्यादा है। नई पीढ़ी इस काम को बिल्कुल करना नही चाहती है। इतनी कम कमाई में कोई कैसे कर सकता है ! मिट्टी मिलना बहुत कठिन है। सरकार कहती है कि तालाब की मिट्टी उठा लो ! मगर तालाब का तो अब पानी ही नहीं सूखता है। इसके लिए बहुत अधिक जगह चाहिए ! बारिश सारी मेहनत पर एक साथ पानी फेर देती है। सरकार अब बिजली से चलने वाले चाक दे रही है। पहले उसे चलाने की ट्रेनिंग होती है। बिजली बहुत मंहगी है। बिल तो खुद ही देना है। बिजली भी माफ हो तो कुछ बात बने।

मीरापुर कस्बे के चौक बाजार में एक दुकान से सटकर 40 साल का देवेन्द्र कुमार अपने थैले में सैकड़ों मिट्टी के दीये लेकर बैठा है। देवेन्द्र के थैले में वही दीये है जिन्हें केशवराम और ऋषिपाल ने तैयार किए हैं। धनतेरस के दिन देवेंद्र ने दोपहर तक सिर्फ 70 ₹ के दीये बेचे है। देवेंद्र भी मुकल्लमपुरा का ही रहने वाला है। वो बताता है कि पिछले कुछ समय से चाइनीज झालरों का रुझान बढ़ गया था मगर कुछ ऐसी भी बात होने लगी कि मिट्टी के दीये जलाएं जाएं ,इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि बाजार अच्छा जाएगा ! मगर इसलिए तेल इतना महंगा है कि लोग दीये खरीदने का साहस नही जुटा पा रहे। अब वो दीये खरीद भी लें तो रोशनी करेंगे कैसे !!! यही कारण है कि चाइनीज़ बल्ब भले ही जहां रोशन कर दें मगर हमारे घर में अंधेरा रहेगा।

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