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युद्ध से भारत के कामगारों और निर्यात को झटका

वैश्विक युद्धों का भारत के कामगारों पर गंभीर असर पड़ा है। देश में 63 फीसद कंपनियों ने नई भर्तियां रोक दी हैं या कर्मचारियों की छंटनी की है। वहीं, 15 फीसद कंपनियां ठेके पर काम कराने लगी हैं। वहीं खाड़ी के देशों से लौटे मजदूरों के सामने संकट खड़ा हो गया है।

युद्ध से भारत के कामगारों और निर्यात को झटका
युद्ध से भारत के कामगारों और निर्यात को झटका फोटोः सोशल मीडिया

सरकार ने पश्चिम एशिया के युद्ध क्षेत्र से भारतीयों को निकालना शुरू कर दिया है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अब तक 2.60 लाख भारतीय लौट चुके हैं। इनमें ज्यादातर मजदूर हैं। इस युद्ध में अब तक कम-से-कम दो भारतीय कामगारों की मौत हो चुकी है। भारतीय रिक्रूटमेंट एजेंसियों के मुताबिक, इस संघर्ष के कारण तीन लाख से ज्यादा भारतीयों को नौकरी पाने में देरी हो सकती है।

भारतीय कामगारों को ले आया गया है, अच्छी बात है, लेकिन इन्हें यहां नौकरी मिलने से रही और उनकी वापसी का मतलब है कि अब वे पैसे घर नहीं भेज पाएंगे जिससे उनके परिवारों का गुजारा होता था। पश्चिम एशिया से हर साल 12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का रेमिटेंस प्रभावित होने का खतरा है; इसके अलावा इस संघर्ष का सबसे ज्यादा असर ज्वेलरी, कपड़ों और दवा निर्यात पर पड़ेगा।

वैश्विक युद्धों के कारण देश में 63 फीसद कंपनियों ने नई भर्तियां रोक दी हैं या कर्मचारियों की छंटनी की है। वहीं, 15 फीसद कंपनियां ठेके पर काम कराने लगी हैं जिससे मैन्युफैक्चरिंग, आईटी और सेवा क्षेत्रों में नौकरी की सुरक्षा और कर्मचारियों का मनोबल कमजोर हुआ है।अमेरिका-ईरान युद्ध ने हरियाणा के उद्योगों को, खास तौर पर कपड़ा और बासमती चावल के निर्यात को, प्रभावित किया है। इसकी मुख्य वजह एलपीजी की कमी, कच्चे माल की कीमतों में उछाल और सप्लाई चेन का टूटना है। पानीपत में एलपीजी की आपूर्ति में कटौती के कारण लगभग 400 डाइंग यूनिटें बंद हो गई हैं; 150 यूनिटों के लिए पीएनजी आपूर्ति 60 फीसद कम हो गई है जिससे कपड़ा और अन्य जुड़े क्षेत्रों में 60 फीसदी उत्पादन ठप है।

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एलपीजी की कमी के कारण रंगाई का काम बंद हो गया है, जो पानीपत के 60,000 करोड़ रुपये के हथकरघा/कपड़ा उद्योग (जिसमें 20,000 करोड़ रुपये का निर्यात शामिल है) की रीढ़ है; इसके चलते बरही और कुंडली में 125 से ज्यादा यूनिटें बंद करनी पड़ी हैं। अनुमान है कि हरियाणा में 300 कपड़ा फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। इन कस्बों में 35,000 से ज्यादा मजदूर बेरोजगार हो गए हैं और कई प्रवासी मजदूर अपने राज्य लौटने लगे हैं। खेतीहर मजदूर भी इस युद्ध और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुए हैं, जिसने देश के कई हिस्सों में फसलों को तबाह कर दिया है।

सरकार का रवैया बड़े निगमों, व्यापार और उद्योग के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रहा है। वह भूल गई है कि उसका पहला कर्तव्य देश के नागरिकों, खास तौर पर मजदूरों और किसानों की रक्षा करना है। वह इसकी शुरुआत देश के सामने रिपोर्ट रखते हुए कर सकती है कि नई तकनीकों और युद्ध का असर मजदूर वर्ग पर किस तरह पड़ा है, और भारतीय नागरिकों के सबसे कमजोर तबकों की सुरक्षा के लिए सरकार क्या कदम उठाएगी।

भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में औद्योगिक और कृषि कामगार दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लड़े जा रहे युद्धों से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। जहां एक ओर इन युद्धों ने भारतीय व्यापार और उद्योग को ऊर्जा और कमोडिटी की बढ़ती कीमतों, सप्लाई चेन में रुकावटों, व्यापार और रेमिटेंस में झटकों, वित्तीय बाजार में उतार-चढ़ाव और रक्षा/रणनीतिक अनिश्चितताओं के जरिये प्रभावित किया है, वहीं दूसरी ओर, भारतीय अर्थव्यवस्था पर अमेरिका-ईरान युद्ध के असर के शुरुआती संकेतों में से एक यह है कि मार्च 2026 में निजी क्षेत्र ने तीन साल से भी ज्यादा समय में अपनी सबसे धीमी बढ़त दर्ज की।

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पश्चिम एशिया के संघर्ष ने पहले भी कई बार कच्चे तेल और गैस की कीमतें बढ़ाई हैं, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ा है, थोक और खुदरा महंगाई बढ़ी है, और एयरलाइंस, शिपिंग, पेट्रोकेमिकल्स और भारी विनिर्माण जैसे ज्यादा ऊर्जा खपत वाले उद्योगों के मुनाफे पर दबाव पड़ा है। ईंधन की बढ़ती लागत से चालू खाता घाटा भी बढ़ता है और रुपये पर दबाव पड़ता है, जिससे बदले में उद्योग के लिए आयातित मशीनरी और इनपुट की लागत बढ़ जाती है। युद्धों ने अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई, नई भर्तियों पर रोक और कई क्षेत्रों में सुस्ती के जरिये भारत के रोजगार बाजार और कामगारों पर दबाव डाला है, जबकि सीधे तौर पर संघर्ष वाले क्षेत्रों में लाखों प्रवासी कामगारों के लिए खतरा पैदा किया है।

माइग्रेंट वर्कर्स सॉलिडेरिटी नेटवर्क ने हाल ही में भारत में हुए बड़े पैमाने के विरोध प्रदर्शनों और हड़तालों की सूची तैयार की है। 2026 के पहले तीन महीनों में ही ऐसे 28 मामले दर्ज किए गए। उनकी रिपोर्ट में दिया गया नक्शा देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के विस्तार को दिखाता है। इसलिए, 1 अप्रैल 2026 को केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों की देशव्यापी हड़ताल को, पूरे भारत में हाल ही में हुए उन विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिनमें नए श्रम कानूनों को रद्द करने की मांग की गई थी।

भारत और दुनिया भर के मजदूरों ने जो बुनियादी अधिकार हासिल किए, वे थे स्थायी नौकरी का अधिकार, जीवन-यापन के लिए पर्याप्त मजदूरी और ऐसे कानून जो मजदूरों को अत्यधिक शोषण से बचा सकें। दुनिया भर के मजदूरों द्वारा हासिल किए गए शुरुआती अधिकारों में से एक था- ‘आठ घंटे के काम का दिन’; हालांकि, नई तकनीकों-मुख्य रूप से रोबोटिक्स और एआई के विकास और वैश्विक बाजारों के आपसी जुड़ाव के कारण, कॉरपोरेट जगत ने सरकारों पर दबाव डाला है कि वे एक ऐसा श्रम बाजार बनाने में मदद करें, जहां वे मजदूरों को कानूनी तौर पर नौकरी पर रख सकें और जब चाहें, नौकरी से निकाल सकें।

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भारत में भी ऐसा ही हुआ है। पिछले कुछ सालों से, निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में स्थायी कर्मचारियों की संख्या कम होती जा रही है, जबकि अस्थायी कर्मचारी बढ़ रहे हैं। इसमें ठेके पर काम करने वाले, प्रवासी, अस्थायी और कैजुअल कर्मचारी शामिल होते हैं।

मुख्यतः बिजली और निर्माण क्षेत्रों में जनवरी से मार्च 2026 के बीच कम-से-कम 28 बड़े हड़ताल और विरोध प्रदर्शन दर्ज किए गए। 2026 में अब तक हुई 28 बड़ी हड़तालें ठेका मजदूरों ने की हैं। उनकी मुख्य मांगें आठ घंटे की शिफ्ट और महीनों से बकाया मजदूरी का भुगतान हैं। ये प्रदर्शन और हड़तालें सरकारी क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) और टाटा, अंबानी और अडानी जैसे बड़े घरानों की निजी कंपनियों, दोनों में हुई हैं।

इनके बारे में आम लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है, क्योंकि मुख्यधारा के मीडिया, क्षेत्रीय मीडिया और यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी इन्हें कवरेज नहीं मिला। 

क्या पूरे भारत में फैक्ट्रियों के बंद होने की बढ़ती संख्या के लिए मजदूर जिम्मेदार हैं? कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के संसदीय डेटा से पता चलता है कि 2020–21 और 2024–25 के बीच 2,04,000 से ज्यादा निजी कंपनियां बंद हो गईं। हालांकि, इस रुझान को सीधे तौर पर पुनर्गठन, दिवालियापन और बाजार दबाव से जोड़ा जा सकता है, न कि मजदूरों की अशांति से।

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स्थायी नौकरियों की कमी हरियाणा के गुड़गांव, मानेसर और खरखौंदा में स्थित मारुति-सुजुकी के प्लांट्स में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या से साफ तौर पर जाहिर होती है। मारुति सुजुकी अपने सभी प्लांट्स में लगभग 35,000-36,000 कर्मचारियों को रोजगार देती है, लेकिन इनमें से केवल 17-18 फीसद ही स्थायी कर्मचारी हैं- यानी लगभग 6,000-6,500 लोग, जिनकी औसत मासिक आय 1.3 लाख रुपये है और जो मुख्य रूप से सुपरवाइजरी भूमिका में काम करते हैं। बाकी (82-83 फीसद) कर्मचारियों में 40 फीसद ठेके पर, 21 फीसद अस्थायी कर्मचारी और 21 फीसद ट्रेनी/अपरेंटिस शामिल हैं, जिनकी कमाई 12 से 30 हजार रुपये के बीच है। 

माइग्रेंट वर्कर्स सॉलिडेरिटी नेटवर्क ने कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की हड़तालों और विरोध प्रदर्शनों को दर्ज किया है। ये ठेका कर्मचारी दशकों से पक्की नौकरी के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पहले, सरकार और अदालतों ने भी ठेका कर्मचारियों के इस अधिकार को सही ठहराया था कि अगर वे ऐसे कामों में लगे हैं जो हमेशा चलते रहते हैं, तो उनकी नौकरी पक्की की जानी चाहिए। लेकिन, नए लेबर कोड्स ने इस तरह की किसी भी कानूनी सुरक्षा को खत्म कर दिया है।

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