
उत्तर प्रदेश की सियासत में रविवार को बड़ा बदलाव देखने को मिला है। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की सरकारों में लंबे समय तक प्रभावशाली मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता दिलाई। इस मौके पर तीन बार विधायक रह चुके अनीस अहमद खान उर्फ फूल बाबू सहित कई पूर्व विधायकों ने भी एसपी जॉइन की।
अपना दल (एस) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार पाल का एसपी में शामिल होना भी इस राजनीतिक घटनाक्रम को और अहम बना गया है। इसे आगामी चुनावी रणनीति और सामाजिक समीकरणों के लिहाज से बड़ा संकेत माना जा रहा है।
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समाजवादी पार्टी में शामिल होने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि “पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की अवधारणा अखिलेश यादव ने शुरू की थी।”
उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव ने समाज के हर वर्ग को साथ लेने की कोशिश की है। उनके मुताबिक, आज ब्राह्मण समुदाय भी जाति आधारित उत्पीड़न का सामना कर रहा है और इस मुद्दे पर भी एसपी प्रमुख ने मुखर भूमिका निभाई है।
सिद्दीकी ने यह भी कहा कि केवल बुलडोजर चलाने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा, बल्कि लोगों का भरोसा जीतना और उनके जख्म भरना ही असली राजनीति है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने अपनी प्राथमिकता तय कर ली है। समाजवादी पार्टी, अखिलेश यादव और समाजवादी परिवार।
उन्होंने बताया कि वह अपने सहयोगियों, 8-10 पूर्व विधायकों और अन्य दलों के पदाधिकारियों के साथ एसपी में शामिल हुए हैं।
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नसीमुद्दीन सिद्दीकी उत्तर प्रदेश की राजनीति में कद्दावर नेता माने जाते हैं।
1991 में वे पहली बार बांदा विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और बीएसपी के पहले मुस्लिम विधायक बने।
1993 में वे इसी सीट से चुनाव हार गए।
1995 में जब मायावती बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं, तब सिद्दीकी को एमएलसी बनाकर कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
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साल 2007 से 2012 तक की बीएसपी सरकार में उनके पास 18 मंत्रालय थे। उस दौरान उन्हें ‘मिनी सीएम’ तक कहा जाता था। वे पार्टी में टिकट वितरण, संगठन और वित्तीय मामलों में अहम भूमिका निभाते थे।
वे लंबे समय तक विधान परिषद के सदस्य रहे और 2012 से 2017 तक विपक्ष के नेता भी रहे।
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2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीएसपी की हार के बाद 10 मई 2017 को मायावती ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया।
इसके बाद 22 फरवरी 2018 को वे कई पूर्व विधायकों और पूर्व सांसदों के साथ कांग्रेस में शामिल हुए। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर बिजनौर से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
साल 2020 में उन्होंने उत्तर प्रदेश विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया। 24 जनवरी 2026 को उन्होंने कांग्रेस से भी इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि आठ साल के दौरान उन्हें पार्टी में कोई जिम्मेदारी या काम नहीं मिला।
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नसीमुद्दीन सिद्दीकी का एसपी में आना महज एक दल-बदल नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों के लिहाज से एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है। बीएसपी में लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले नेता का एसपी में शामिल होना विपक्षी राजनीति को नया आयाम दे सकता है।
अनीस अहमद खान और अन्य पूर्व विधायकों की एंट्री से एसपी संगठनात्मक स्तर पर भी मजबूती की उम्मीद कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम उत्तर प्रदेश में पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समीकरण को फिर से सक्रिय करने की दिशा में बीएसपी की कोशिश का हिस्सा हो सकता है।
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