
कांग्रेस की युवा इकाई यूथ कांग्रेस ने 20 जुलाई को छात्रों के संसद मार्च से पहले प्रदर्शन स्थल और फिर यूथ कांग्रेस के ऑपिस के पास पत्थरों से भरा ट्रक खड़ा किए जाने को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। यूथ कांग्रेस ने कहा कि यह प्रदर्शन को हिंसक दिखाने की एक पूर्व नियोजित साजिश थी।
यूथ कांग्रेस अध्यक्ष उदय भानु चिब ने कहा कि 20 जुलाई को एक डंपर, जिसमें पत्थर भरे हुए थे, वो पहले जंतर-मंतर पर खड़ा देखा गया। फिर वो यूथ कांग्रेस के दफ्तर के सामने खड़ा कर दिया गया था, जो 25 जुलाई तक वहीं खड़ा था। सवाल है- संसद मार्च के दिन वो ट्रक वहां कैसे खड़ा किया गया और ये काम किसके कहने पर किया गया? हमारा सवाल है कि पत्थर से भरे हुए ट्रक को यूथ कांग्रेस के दफ्तर के सामने किस मंशा के साथ खड़ा किया गया था, क्योंकि ये एक बड़ी सुरक्षा चूक भी है। क्या सरकार यह चाहती थी कि प्रदर्शन के दौरान उस पत्थर को इस्तेमाल किया जाए और फिर सरकार एक बड़ा क्रैकडाउन करे? यह महज संयोग नहीं था, यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसक दिखाने की एक पूर्व नियोजित साजिश थी।
उदय भानु चिब ने कहा कि हैरानी की बात ये है कि हाईकोर्ट में गवर्नमेंट काउंसिल ने कहा कि ये ट्रक प्रदर्शनकारियों से जुड़ा हुआ है। उसके बाद 28 जुलाई को दिल्ली पुलिस का ट्वीट आया कि वो ट्रक एक हादसे के बाद सीज किया गया था। ये अपने आप में ही एक बड़ा विरोधाभास है। एक तरफ नरेंद्र मोदी वीडियो बना रहे हैं और दूसरी तरफ अमित शाह छात्रों को लाठियों से पिटवा रहे हैं, आंसू गैस के गोले फिंकवा रहे हैं। सरकार का ये खेल एक्सपोज हो चुका है।
यूथ कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि हमारी मांग है: इस पूरे मामले में स्वतंत्र और न्यायिक जांच हो। ट्रक की मूवमेंट वाले सीसीटीवी फुटेज संरक्षित किए जाएं। इस मामले में जवाबदेही तय हो और ये सब किसके इशारे पर हुआ- वो बताया जाए। प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ केस हो रहे हैं, उनपर दबाव डाला जा रहा है, लेकिन हम सभी छात्रों के साथ मजबूती से खड़े हैं।
यूथ कांग्रेस नेता गुरमेहर कौर ने कहा, "यह ट्रक 20 जुलाई को अचानक जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर आ गया था। इस ट्रक की कहानी 16 जुलाई से शुरू होती है। फिरोज शाह रोड और कस्तूरबा गांधी मार्ग क्रॉसिंग पर इस ट्रक का सुबह 4.00 बजे एक मारुति ईको से एक्सीडेंट हो गया। तुरंत एफआईआर दर्ज की गई और इस ट्रक को पुलिस कस्टडी में ले लिया गया। 16 जुलाई से 20 जुलाई तक, यही ट्रक उस मारुति ईको के साथ पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में पुलिस कस्टडी में था। फिर अचानक यह पत्थरों से भरा, प्रोजेक्टाइल से भरा संसद मार्ग और जंतर-मंतर पर और आखिर में यूथ कांग्रेस ऑफिस के बाहर फिर से आ गया। कुछ युवा यूथ कांग्रेस लीडर थे जिन्होंने तब इस ट्रक का वीडियो बनाया था जब यह यूथ कांग्रेस ऑफिस के बाहर में दिखा।
गुरमेहर कौर ने पूछा कि यूथ कांग्रेस ऑफिस के बाहर पत्थरों से भरा ट्रक कैसे खड़ा था? अगर इतनी ज़बरदस्त पुलिस चेकिंग और इतने सारे बैरिकेड्स थे, तो यह ट्रक संसद मार्ग तक कैसे पहुँचा? ट्रक कौन चला रहा था, और किसके सीधे ऑर्डर पर पुलिस कस्टडी में एक ट्रक कई दिनों तक सड़कों पर रखा गया था? पार्लियामेंट से सिर्फ 100 मीटर दूर इतना बड़ा सिक्योरिटी रिस्क कैसे हो सकता था? पत्थरों और प्रोजेक्टाइल से भरे इस ट्रक को लावारिस छोड़ने के लिए कौन ज़िम्मेदार था? क्या होता अगर बदमाशों ने इन प्रोजेक्टाइल का इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए किया होता?
यूथ कांग्रेस नेता शांतनु सिंह ने कहा कि मैंने 20 जुलाई को 3:45 बजे पत्थरों से भरा ट्रक यूथ कांग्रेस के दफ्तर के सामने खड़ा देखा था, तब वहां करीब 500 छात्र प्रदर्शन में मौजूद थे। उसी दिन जब 12 बजे के करीब संसद मार्च शुरू हुआ तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें छात्र और युवा तितर-बितर हो गए। लाठीचार्ज के बाद भी छात्र बिलकुल शांत थे, लेकिन मैंने देखा कि उस प्रदर्शन में कई ऐसे लोग थे, जिन्हें पुलिस ने नहीं रोका और वे ट्रक में चढ़े हुए थे। जबकि इस ट्रक का एक वीडियो सुबह ही वायरल हो चुका था और दिल्ली पुलिस ने यह कहा कि उन्होंने इस ट्रक को भलस्वा में खाली कर दिया था। इस घटना के बाद, सरकार ने कोर्ट में उस ट्रक को छात्रों से जोड़ा। ये दिखाता है कि दिल्ली पुलिस किसके इशारे पर इन आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दे रही थी।
शांतनु सिंह ने कहा कि सीधा सवाल है- अगर दिल्ली पुलिस ने पत्थरों भरा ट्रक विपक्ष के यूथ ऑर्गेनाइजेशन के दफ्तर के बाहर खड़ा किया, तो वे क्या चाहते थे? इसमें दो ही बातें हो सकती हैं। पहला, प्रदर्शन के दौरान पत्थरबाजी-हिंसा होती और और ये प्रोटेस्ट खत्म हो जाता। दूसरा, दिल्ली पुलिस और RAF के लोग ये पत्थर छात्रों पर चलाने वाले थे ऐसे में दिल्ली पुलिस को पूरा 'चेन ऑफ कमांड' समझाना चाहिए।
उदय भानु चिब ने सवाल उठाया कि राजधानी जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसा कैसे संभव है कि दिल्ली पुलिस को इस ट्रक की जानकारी न हो। दिल्ली पुलिस इतनी अक्षम नहीं हो सकती कि उसे इस तरह की गतिविधि की भनक तक न लगे। उन्होंने आरोप लगाया कि इस ट्रक को यूथ कांग्रेस कार्यालय के बाहर खड़ा करने का उद्देश्य प्रदर्शनकारियों को उकसाना था, ताकि वे पत्थरों का इस्तेमाल करें और उसके बाद सरकार द्वारा की गई सख्त कार्रवाई को उचित ठहराया जा सके। यदि प्रदर्शनकारी पत्थर उठाते, तो सरकार और प्रशासन शांतिपूर्ण आंदोलन को हिंसक बताकर अपने दमनात्मक कदमों को सही साबित करने की कोशिश करते।
प्रदर्शन में शामिल युवाओं की सराहना करते हुए उदय भानु ने कहा कि तमाम उकसावे के बावजूद उन्होंने पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया, आंसू गैस के गोले छोड़े गए और पैलेट गन का भी इस्तेमाल हुआ, लेकिन इसके बावजूद किसी प्रदर्शनकारी ने पत्थर नहीं उठाया। उन्हें अपने कार्यकर्ताओं और युवाओं पर गर्व जताते हुए कहा कि उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध जारी रखा।
उन्होंने कहा कि सरकार जानबूझकर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की छवि खराब करना चाहती है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध हर नागरिक का अधिकार है और ऐसे आंदोलनों को बदनाम करने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और कुछ नहीं हो सकती कि सरकार स्वयं शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसा से जोड़ने का प्रयास करे।
प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों के घायल होने के दावों पर भी उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि किसी पुलिसकर्मी को चोट लगी भी है, तो इसकी जांच होनी चाहिए कि चोट पहुंचाने वाले वास्तव में प्रदर्शनकारी थे या फिर ऐसे लोग जिन्हें किसी अन्य उद्देश्य से वहां भेजा गया था। उपलब्ध वीडियो में महिलाओं और अन्य प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज साफ दिखाई देता है, जबकि आंदोलन शांतिपूर्ण था।
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