विचार

आकार पटेल/ लोकतंत्र की मजबूती दिखाने वाले हर मोर्चे पर गिरावट, फिर कितने स्वतंत्र हम!

दुनिया जिन संकेतकों से किसी भी देश में स्वतंत्रता की स्थिति को आंकती है, उसमें हम मोर्चे पर लगातार नीचे जा रहे हैं। आकार पटेल पेश कर रहे हैं बीते 10 सालों में इन सूचकांकों में लगातार होती गिरावट के आंकड़े।

20 जुलाई 2026 को दिल्ली में छात्रों -युवाओं पर पुलिस की बर्बरता (Getty Images)
20 जुलाई 2026 को दिल्ली में छात्रों -युवाओं पर पुलिस की बर्बरता (Getty Images) Hindustan Times

स्वाधीनता का सीधा संबंध स्वतंत्रता से है और इसके बिना यह शब्द बेमानी है। कुछ साल पहले मैंने भारत में स्वतंत्रता की स्थिति का जायज़ा लिया था, कि आखिर दुनिया हमारी स्वतंत्रता को कैसे देखती है। मैंने अपनी एक किताब के लिए यह काम किया था। लेकिन समय-समय पर मैं इन सूचकांकों की सूची को फिर से देखता हूं ताकि यह पता चल सके कि क्या बदलाव आए हैं।

आज़ादी के दिन मुझे यह करना सही लगा। यहां जिन संगठनों का ज़िक्र किया गया है, हो सकता है कि पाठक उनसे परिचित न हों, लेकिन वे प्रतिष्ठित हैं और उनके निष्कर्षों का सम्मान किया जाता है। आखिर में हम देखेंगे कि सरकार उनके बारे में क्या कहती है। आइए, शुरू करते हैं।

प्यू रिसर्च सेंटर एक अमेरिकी संस्था है जो किसी देश में लंबे समय से चल रहे (दीर्घावधि) रुझानों पर नज़र रखती है। यह दुनिया भर में सरकारी पाबंदियों और सामाजिक टकरावों की समीक्षा करती है। इसकी ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कहीं अधिक सरकारी पाबंदियां हैं और सामाजिक टकराव का स्तर 'बहुत ज़्यादा' है। 2019 तक, भारत नीचे दिए गए सभी मामलों में टॉप 10 देशों में शामिल था।

श्रेणियां:

• धार्मिक रीति-रिवाजों से जुड़ी सामाजिक शत्रुता वाले देश

• अंतर-धार्मिक तनाव और हिंसा के ऊंचे स्तर वाले देश

• संगठित समूहों द्वारा धार्मिक हिंसा के ऊंचे स्तर वाले देश

• व्यक्तिगत और सामाजिक समूहों के उत्पीड़न के ऊंचे स्तर वाले देश

सिविकस (CIVICUS) नागरिक समाज संगठनों का एक वैश्विक गठबंधन है। यह संगठन बनाने, शांतिपूर्ण सभा करने और अपनी बात कहने की आज़ादी पर नज़र रखता है।

इस रेटिंग में भारत के नागरिक स्थान (civic space) का दर्जा 'बाधित' (Obstructed) से गिरकर 'दमित' (Repressed) हो गया है। इसमें कहा गया है कि "भारत के नागरिक स्थानों की स्थिति का बिगड़ना चिंताजनक है—खासकर कई तरह के प्रतिबंधात्मक कानूनों के ज़रिए अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले और मानवाधिकार समूहों के काम में बाधा डालने की कोशिशें।" इसी वजह से, "भारत को उन देशों की वॉचलिस्ट में शामिल किया गया है, जहां नागरिक आज़ादी में तेज़ी से गिरावट आई है।"

'इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट', यूके की 'इकोनॉमिस्ट' मैगज़ीन का ही एक हिस्सा है। यह 'डेमोक्रेसी इंडेक्स' (लोकतंत्र सूचकांक) जारी करती है, जिसमें भारत को "खामियों वाला लोकतंत्र" (flawed democracy) बताया गया है। इसके अनुसार, यह "नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोकतंत्र के कमज़ोर पड़ने का नतीजा" है और "मोदी के दौर में धर्म का बढ़ता असर—जिसकी नीतियों ने मुसलमानों के प्रति नफ़रत और धार्मिक टकराव को बढ़ावा दिया है—उसने देश के राजनीतिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाया है।"

1941 में स्थापित 'फ्रीडम हाउस' का कहना है कि यह "दुनिया भर में लोकतंत्र के समर्थन और बचाव के लिए समर्पित सबसे पुरानी अमेरिकी संस्था है।" अपनी 'फ्रीडम इन द वर्ल्ड' रिपोर्ट में, भारत की स्थिति 2014 में "आज़ाद" से गिरकर "आंशिक रूप से आज़ाद" हो गई है। कश्मीर, जिसे अलग से आंका गया है, "आज़ाद नहीं" की श्रेणी में है।

इसमें कहा गया है कि "बीजेपी के शासनकाल में भेदभावपूर्ण नीतियां अपनाई गईं और मुसलमानों के उत्पीड़न में बढ़ोतरी हुई है।"

वॉशिंगटन स्थित 'वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट' का कहना है कि यह एक "स्वतंत्र और कई क्षेत्रों में काम करने वाला संगठन है, जो दुनिया भर में कानून के शासन (rule of law) को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है।" इसका 'रूल ऑफ़ लॉ इंडेक्स' जवाबदेही, निष्पक्ष कानून, खुली सरकार और सुलभ व निष्पक्ष न्याय पर नज़र रखता है। भारत की रैंकिंग दुनिया में 66वें स्थान से गिरकर 2022 में 77वें और अब 86वें स्थान पर आ गई है।

'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' का मुख्यालय पेरिस में है और यह हर साल 'वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स' जारी करता है। इस इंडेक्स में भारत 157वें स्थान पर है। इसके कारणों में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा में बढ़ोतरी, मीडिया के मालिकाना हक का कुछ ही हाथों में सिमटा होना और मीडिया आउटलेट्स का खुलकर किसी राजनीतिक विचारधारा के साथ जुड़ना शामिल है।

1977 में वॉशिंगटन में स्थापित 'केटो इंस्टीट्यूट' का कहना है कि उसका विज़न "एक ऐसा आज़ाद और खुला समाज है, जिसमें आज़ादी हर व्यक्ति को शांति के साथ खुशहाली और सार्थक जीवन जीने का मौका देती है।" इसके 'ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स' में भारत दुनिया में 87वें स्थान से गिरकर 110वें स्थान पर आ गया है; इसकी वजह व्यक्तिगत और आर्थिक आज़ादी के मामले में कम स्कोर मिलना है।

बर्लिन स्थित मौजूद 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' का कहना है कि वह "भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले सिस्टम और नेटवर्क का पर्दाफ़ाश करके ताकतवर और भ्रष्ट लोगों को जवाबदेह ठहराती है।" इसके 'करप्शन परसेप्शन इंडेक्स' (भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक) में भारत की रैंकिंग 85वें से गिरकर 91वें स्थान पर आ गई है। इसके सर्वे के मुताबिक, पिछले 12 महीनों में 39% भारतीयों को रिश्वत देनी पड़ी।

वॉशिंगटन स्थित 'इंटरनेशनल फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट' 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स' (वैश्विक भुखमरी सूचकांक) जारी करता है। भारत को 102वां स्थान मिला है और भुखमरी के मामले में इसकी स्थिति "गंभीर" है।

गोथेनबर्ग यूनिवर्सिटी 'वैराइटीज़ ऑफ़ डेमोक्रेसी' (V-Dem) इंडेक्स तैयार करती है, जो संस्थागत लोकतंत्र और ऑटोक्रेटाइज़ेशन (तानाशाही की ओर झुकाव) की जांच करता है। इसके अनुसार, 2014 के बाद से पिछले 10 सालों में दुनिया के सभी देशों के मुकाबले भारत में "सबसे बड़े बदलावों में से एक" नोट किए गए हैं। भारत ने लोकतंत्र का अपना दर्जा खो दिया और उसे 'इलेक्टोरल ऑटोक्रसी' (चुनावी तानाशाही) की श्रेणी में रखा गया, जिससे वह हंगरी और तुर्की जैसे देशों की कतार में शामिल हो गया। अभिव्यक्ति की आज़ादी, मीडिया और नागरिक समाज के मामले में भारत "पाकिस्तान जितना ही तानाशाही वाला और बांग्लादेश व नेपाल, दोनों से भी बदतर" स्थिति  है। भारत ने अपने नागरिकता कानूनों के ज़रिए "धर्म के आधार पर भेदभाव" शुरू किया है।

2020 में, निष्कर्षों से चिंतित होकर, सरकार ने आदेश दिया कि 32 वैश्विक सूचकांकों के लिए एक 'एकल, सूचनात्मक डैशबोर्ड' तैयार किया जाए। यह निगरानी अभ्यास "केवल रैंकिंग में सुधार करने के लिए नहीं बल्कि निवेश को आकर्षित करने और विश्व स्तर पर भारत की धारणा को आकार देने के लिए सिस्टम में बदलाव और सुधार लाने के लिए था।"

बाद में सरकार ने कहा कि वह "एक व्यापक प्रचार अभियान" शुरू करेगी जो विज्ञापन और "मंत्रालयों की सूक्ष्म साइटों" के माध्यम से "भारत की धारणा को आकार देगा" और यह "वैश्विक सूचकांकों की समस्याओं, मापदंडों और डेटा स्रोतों को भी प्रचारित करेगा।"

इससे लोकतांत्रिक सूचकांकों में भारत की गिरावट नहीं रुक सकी; क्योंकि यह गिरावट परफ़ॉर्मेंस से जुड़ी थी, न कि लोगों की सोच से, और इसे मीडिया या प्रचार के ज़रिए ठीक नहीं किया जा सकता था।

जैसे-जैसे गिरावट जारी रही, सरकार ने पहले तौर-तरीकों को और फिर इरादों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया। आज़ादी के इस दिन पर, जब हम एक-दूसरे को और खुद को बधाई दे रहे हैं, हम अभी भी उसी स्थिति में हैं।

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