
मुझे इस सच्चाई से कोई दिक्कत नहीं है कि एक देश के तौर पर हम अकसर या हमेशा वो नहीं पा सकते जो हम चाहते हैं। कोई भी देश इस मायने में या कहें कि सही मायने में संप्रभु (सॉवरेन) नहीं है कि वह खुद को और अपनी मर्ज़ी को पूरी तरह से दुनिया पर थोप सके। यह बात इतिहास के सबसे ताकतवर देशों के बारे में भी सच है। अगर यह सच नहीं होता, तो अमेरिका वियतनाम, अफ़गानिस्तान और इराक में मैदान छोड़कर नहीं भागता, और अब ईरान में हार का सामना नहीं करता। अमेरिका हिंसा के ज़रिए ईरान को काबू में करना चाहता है और ऐसा नहीं होने वाला है।
हम कोई ताकतवर देश नहीं हैं, इसलिए हमारा रवैया भी उसी हिसाब से होना चाहिए। यह बस सच को वैसे ही मान लेना है जैसा वो है और आईने में यह देखने में कोई शर्म नहीं है कि क्या दिख रहा है। जो तस्वीर सामने आती है, वह एक गरीब आबादी की है, जिसका ज़्यादातर हिस्सा मुफ़्त अनाज के लिए हर महीने लाइन में लगने को मजबूर है। हम भारतीय संख्या में बहुत ज़्यादा हैं, हाँ, लेकिन इस बड़ी संख्या की ताकत का एहसास कहीं नहीं होता। भविष्य की संभावनाओं में इसका असर हो सकता है, आज की सच्चाई में नहीं।
और इसलिए, नहीं, मुझे यह मानने में कोई दिक्कत नहीं है कि हम मज़बूत नहीं हैं और इसलिए हममें काबिलियत की कमी है, और हम मज़बूत देशों की तुलना में कम संप्रभु (सॉवरेन) हैं।
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लेकिन मुझे एक दिक्कत है, मान लीजिए कि यह एक छोटी सी समस्या है, कि हमारे पास जो सीमित संप्रभुता (लिमिटेड सॉवरेनिटी) है, उसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है। हम जो कठोक राष्ट्रवाद का दिखावा करते हैं, वह कमज़ोर देशों और आमतौर पर हमारे पड़ोसियों के लिए होता है। बड़ी ताकतें, मेरा मतलब है सच में बड़ी ताकतें, न कि इलाके के गुंडे, आईपीएम टीमों को बांग्लादेश से खिलाड़ी चुनने से रोकने में हमारी तरह ऊर्जा खर्च नहीं करतीं। वे खेल के मैदान पर विपक्षी टीम से हाथ मिलाने से मना नहीं करते और नाराज़ नहीं होते। भारत यही सब करता है, क्योंकि हम यही कर सकते हैं।
जहां असली राष्ट्रहित का सवाल आता है, जहां विरोध करना मुश्किल होता है और मानना आसान होता है, हम अक्सर और शायद आमतौर पर झुक जाते हैं। रूस से तेल मत खरीदो। जी सर। रूस से तेल खरीद लो। ठीक है सर। ईरानी तेल नहीं। जी सर। अमेरिका को अब हमें यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि क्या कहना है और क्या नहीं। हम दिल से जानते हैं कि इस मूर्खतापूर्ण ईरान युद्ध पर सच बोलने से ट्रंप नाराज़ हो जाएंगे और इसलिए हम मुंह मोड़ लेते हैं क्योंकि अगर हम उनकी आंखों में आंखें डालकर देखेंगे तो वह गुंडा हमें सीधा कर देगा।
सीधे तौर पर यह कहना बुरा लग सकता है, लेकिन हमें खुद को आईने में देखने की कोशिश करनी होगी, भले ही कभी-कभी ही सही। 30 दिन की छूट एक फर्लो की तरह है, जिस पर हमारे दोषी बाबा हमेशा रहते हैं। हम अप्रैल में फिर से समर्पण कर देंगे और हमें यह मानना होगा।
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क्या किसी को लगता है कि चीन, जो भारत की तरह ही बाहरी उर्जा स्त्रोतों पर निर्भर है, उससे इस तरह बात की जा सकती है? बिल्कुल नहीं। ट्रंप तो सख्त और कभी न हंसने वाले, गले न लगने वाले शी से यह कहने के ख्याल से ही कांप उठेंगे।
हमने तो तय किया है कि हम एक देश के मुखिया, एक धर्मगुरु, जिसे लाखों भारतीय अपना धार्मिक नेता मानते थे, उसकी हत्या पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे, हत्या की निंदा या आलोचना करना तो बहुत दूर की बात है। हम मासूम स्कूली लड़कियों की इतनी बड़ी तादाद में हत्या पर दुख नहीं मनाएंगे-जताएंगे। हमने तय किया है कि जब बिना हथियार वाले नाविक, जो कुछ घंटे पहले हमारे खास मेहमान थे, बिना जंग का ऐलान किए अंधेरे में उड़ा दिए जाएंगे, तो किसी और तरफ देखते रहेंगे।
एक बार फिर, मेरे हिसाब से यह सब एक छोटी सी समस्याएं हैं, भले ही मैं किसी भी काम से सहमत न होऊं, क्योंकि मुझे यह समझ में आता है कि हमने एक कमज़ोर देश के तौर पर नरम रहना चुना है।
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लेकिन, हमारे शेखी बघारने और बड़बोलेपन से मुझे वाकई सख्त दिक्कत है। यह बकवास भले ही घरेलू राजनीति में खपती हो हो, लेकिन दुनिया इसे समझती है। जब हम खुद से कहते हैं कि हम विश्वगुरु हैं और जी20 के मुखिया हैं और दूसरी कपोल कल्पनाएं करते हैं, तो उम्मीद है कि हम ऐसा सिर्फ़ इस यकीन में कर रहे हैं कि भारतीय लोग सीधे-सादे और अनजान लोग हैं और ऐसी बकवास पर यकीन करते हैं। अगर हम ऐसा करते हैं तो यह बहुत खतरनाक बात होगी क्योंकि सरकार असल में ऐसा मानती है, लेकिन खुशी की बात है कि हम यह बात जानते हैं कि सरकार और यह प्रधानमंत्री ऐसा नहीं मानते। हम यह इसलिए जानते हैं क्योंकि बड़ी ताकतों से निपटने में हमारी कायरता दिखती है। दूसरों के साथ हमारे काम, खुद से कही गई बातों से ज़्यादा असरदार होते हैं।
मैं उन भारतीयों में से हूँ जो इश्तिहारों, होर्डिंग्स और टेलीविज़न पर हमारी महानता के बारे में छपे झूठ पर यकीन नहीं करते, इसलिए मुझे यह बात परेशान करती है कि हम ऐसा करते हैं। लेकिन मुझे यह दिक्कत वाली बात भी लगती है और इसीलिए मेरी राय में यह एक बड़ी समस्या है। लोकतांत्रिक सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने मतदाताओं के साथ ईमानदार रहें, न सिर्फ़ मूल्यों और नैतिकता के साफ़ कारणों से, बल्कि इसलिए भी क्योंकि इससे सरकार का काम आसान हो जाता है।
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भारतीय जनता पार्टी को यह समझाने के लिए खुद को उलझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि हमारा समर्पण असल में समर्पण क्यों नहीं है और 30 दिन की छूट मिलना असल में एक कूटनीतिक जीत क्यों है, बशर्ते वह यह बताती कि हमें क्या-क्या झेलना पड़ा।
दुनिया भर में हमारे जो भी दोस्त बचे हैं, ईरान सहित, वे समझ जाएंगे कि हमने उनका साथ इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि हम उनके साथ हो रही घटनाओं से सहमत हैं—क्योंकि हम उससे बिल्कुल सहमत नहीं हैं। असली वजह यह है कि हममें साहस की कमी है। इससे शायद हम करोड़ों लोगों को उस कड़वी सच्चाई का सामना करने से बचा सकेंगे कि अमेरिका के एक ही हमले से हमारी ‘दुनिया की बड़ी ताकत’ या विश्वगुरु वाली छवि टूट सकती है।
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