
अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी में बनने वाले डोनाल्ड ट्रम्प आर्क (मेहराब) का काम इस मीहने शुरु हो रहा है। इसे पेरिस के 'आर्क डी ट्रायम्फ' की तर्ज पर बनाया जा रहा है, जिसकी ऊंचाई 250 फुट होगी। वैसे तो इस मेहराब को अमेरिका की इंग्लैंड से आज़ादी के 250 साल पूरे होने की याद में बनाया जा रहा है, लेकिन असल में यह ट्रंप का स्मारक होगा।
ट्रम्प खुद को अमेरिकी इतिहास का सबसे महान राष्ट्रपति मानते हैं और इसके दो कारण हैं। पहला कारण राजनीतिक है। ट्रम्प एक बाहरी व्यक्ति थे जिन्होंने 10 साल पहले रिपब्लिकन पार्टी पर कब्ज़ा किया और उस पर अपनी पकड़ बनाए रखी है। अमेरिका की दोनों पार्टियां 'प्राइमरी' कहे जाने वाले आंतरिक चुनावों के आधार पर अपने उम्मीदवार चुनती हैं। जिन लोगों को ट्र्म्प सार्वजनिक रूप से समर्थन देते हैं, उनके रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वियों को हराने की संभावना 9 से फीसद से ज्यादा होती है। रिपब्लिकन वोटरों के लिए ऐसे लोगों की नीतियों या पृष्ठभूमि से ज़्यादा ट्रंप के प्रति उनकी सार्वजनिक वफ़ादारी मायने रखती है। इसी वजह से पार्टी पर ट्रम्प का नियंत्रण बना हुआ है।
इसे एक बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है क्योंकि रिपब्लिकन खुद को वैचारिक और कंज़र्वेटिव मानते हैं, जबकि ट्रम्प इनमें से कुछ भी नहीं हैं। कोई यह तर्क दे सकता है कि इस वैचारिक दिखावे के पीछे वे हमेशा से कट्टरपंथी थे और ट्रम्प ने बस उस दिखावे को हटा दिया है। यह बात शायद सच है, लेकिन हमें उन्हें इस उपलब्धि का श्रेय तो देना ही चाहिए क्योंकि यह सच है। आज रिपब्लिकन पार्टी, ट्रम्प की पार्टी है।
पार्टी और संगठन पर पकड़ के बूते ट्रम्प ने तीन चुनाव लड़े और दो में जीत हासिल की। 2024 की दूसरी जीत वाकई हैरान करने वाली थी, खासकर इसलिए क्योंकि अपने पहले कार्यकाल के आखिर में हिंसा भड़काने के बाद उन्हें बुरी तरह और सही वजहों से उनकी तीखी आलोचना हुई थी। इसलिए उनकी यह पहली उपलब्धि थी।
वे इसे ज़रूरी नहीं कि अपनी महानता की वजह के तौर पर पेश करते हों, लेकिन ट्रम्प पर जानलेवा हमले की एक कोशिश और दो अन्य नाकाम हमले हो चुके हैं। मुमकिन है कि इससे उन्हें खुद के इतिहास का हिस्सा होने का एहसास भी होता हो।
अपनी दूसरी उपलब्धि वह अपनी गवर्नेंस यानी शासन-व्यवस्था बताते हैं। वे इमिग्रेशन (आप्रवासी मामले) और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर अपनी सफलता का ज़िक्र करते हैं। भारतीय लोग इमिग्रेशन से जुड़े उनके कदमों से वाकिफ़ हैं: जैसे बिना कागज़ात वाले लोगों को जेल में डालना, बेड़ियों में जकड़ना और देश से बाहर निकालना; अमेरिकी शहरों में आईसीई जैसी एजेंसी को खुली छूट देना और एच1बी वीज़ा सिस्टम पर हमला करना।
आर्थिक मोर्चे पर सफलता को लेकर उनका दावा रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचे शेयर बाज़ार, टैरिफ़ नीति, एआई में बड़ी कंपनियों के लगातार निवेश और बेरोज़गारी दर में गिरावट आदि पर आधारित है। वैसे तो इन मोर्चो पर हकीकत या सही स्थिति अभी पूरी तरह साफ़ नहीं है, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट हो जाएगी। उनके कार्यकाल में अभी भी दो साल बाकी हैं।
अगर हम उनकी उपलब्धियों को इन्हीं दो मामलों तक सीमित रखें, तो हो सकता है कि वे अमेरिकी राजनीति के सबसे सफल नेताओं में से एक के तौर पर सामने आएं। वे एक ऐसी अलग सोच वाले नेता हैं जिन्होंने किसी भी दूसरे नेता के मुकाबले एक बड़ी पार्टी पर सबसे ज़्यादा दबदबा बनाए रखा और जो तकनीक की सबसे असाधारण क्रांति के समय सत्ता में थे। इस लिहाज़ से, वॉशिंगटन, जेफ़रसन और लिंकन की तरह राजधानी में ट्रम्प का भी कोई स्मारक होना कोई अजीब बात नहीं होगी।
पर, दुर्भाग्य से, उनकी पहचान इन चीज़ों से नहीं होगी और उन्हें यह पहले से पता है। ट्रम्प का नाम हमेशा अयातुल्ला खामेनेई की हत्या और उसके बाद फैली वैश्विक अफ़रा-तफ़री से जुड़ा रहेगा। ईरान में युद्ध एक ऐसी रणनीतिक नाकामी है, जैसी न तो अफ़ग़ानिस्तान में हुई थी और न ही वियतनाम में। उन दोनों हार के बाद जब अमेरिकी सेनाएं लौटीं, तो वे एक ऐसे देश में वापस आईं जिसकी ताक़त और प्रभाव में कोई कमी नहीं आई थी।
ईरान के साथ युद्ध का मामला अलग है। मैं इस बेवकूफी भरे युद्ध से दुनिया की अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की बात नहीं कर रहा हूं, वह एक अलग बात है। ऊर्जा की कीमतें शायद आखिरकार कम हो जाएंगी, कम से कम इसलिए तो ज़रूर कि रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) भी अब फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) की तरह ही सुविधाजनक होती जा रही है। और यह बात तो साफ है कि चीन और उसके इनोवेशन इस दशक और अगले दशक में दुनिया को पेट्रोलियम उत्पादों से दूर जाने के लिए मजबूर कर देंगे।
ट्रम्प ने अनजाने में ही सही, लेकिन अमेरिका की विशाल रणनीति को नुकसान तो पहुंचाया है। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की मौजूदगी पर भी इसका बुरा असर पड़ा है। अमेरिकी मीडिया में ईरानी मिसाइलों और ड्रोन्स से तबाह हुए अमेरिकी ठिकानों की जो तस्वीरें सामने आईं, उनसे दुनिया को वह बात पता चल गई जो खाड़ी देश पहले से ही जानते थे। भविष्य में सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, कतर और यूएई ऐसी सैन्य ताकत पर निर्भर नहीं रहेंगे जो ईरान से खुद की रक्षा न कर सके। जॉर्डन भी इस समय बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अड्डों के नेटवर्क की वजह से अमेरिका अपनी नौसेना को आसानी से ज़रूरी सामान और ईंधन पहुंचा पाता था, जो फिलहाल और अब मुमकिन नहीं है। ईरान की घेराबंदी करने वाले जहाज़ों में ईंधन भरने के लिए उसे हज़ारों किलोमीटर दूर स्थित एक द्वीप पर निर्भर रहना पड़ता है।
प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगियों ने खाड़ी क्षेत्र में भी उसकी नाकामी को देखा है। ताइवान, जापान, फिलीपींस और कोरिया की सुरक्षा के लिए तैनात अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर (जंगी जहाज) को चीन के इलाके से दूर दूसरी जगहों पर तैनात किया गया है।
यूरोप से सेना हटाने की ट्रम्प की धमकियां अभी तक हकीकत में नहीं बदली हैं। लेकिन सिर्फ़ इस इरादे के ज़ाहिर होने से ही रिश्ते हमेशा के लिए बदल गए हैं।
पूरी दुनिया और उसके देशों के लिए, अब अमेरिका की बात का उतना वज़न नहीं रहा। खुद उसके राष्ट्रपति के हस्ताक्षर वाली शांति संधि का लगभग तुरंत ही उल्लंघन कर दिया गया। वह हार स्वीकार नहीं कर सकता और उसे जीतना नहीं आता। उसके सामने केवल बेहद बुरे और बदतर विकल्प हैं।
ट्रम्प की भाषा में इनमें से कुछ भी दिखाई नहीं देता, जैसा कि किसी ढोंगी से उम्मीद की जा सकती है। 10 मार्च को उन्होंने कहा, "युद्ध लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है।" असल में यह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि यह वही चीज़ बन गया है जिसके खिलाफ़ ट्रम्प ने अपने तीनों राष्ट्रपति चुनावों में प्रचार किया था, और वह है: एक कभी न खत्म होने वाला युद्ध।
वियतनाम के आखिर तक इस मामले में लिंडन जॉनसन इतने अलोकप्रिय हो गए थे कि — नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में अपनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद — उन्होंने दोबारा चुनाव न लड़ने का फ़ैसला किया था। ज़ाहिर है, ट्रंप के पास यह विकल्प नहीं है क्योंकि उनके कार्यकाल की सीमा तय है। उन्हें रिटायर होना ही है, लेकिन उनके राष्ट्रपति-काल की स्थायी पहचान यह मेहराब या ट्रम्प आर्क नहीं, बल्कि ईरान के मामले में उनके कदम में उनकी नाकामी का स्मारक होगी।
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