विचार

पुरस्कार, प्रतिष्ठा और साहित्य की नैतिकता

आज साहित्यिक संस्थाओं, पुरस्कारों की संख्या और राशि भी बढ़ी है। लेकिन क्या पारदर्शिता भी बढ़ी है? क्या पुरस्कारों के आर्थिक स्रोत सार्वजनिक होते हैं? क्या पुरस्कार को स्वीकार करने या न करने वाले लेखक के नैतिक निर्णय पर भी साहित्यिक समाज गंभीर बहस करता है?

दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान प्राप्त करते लेखक अशोक वाजपेयी (फोटो सौजन्य - एएनआई)
दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान प्राप्त करते लेखक अशोक वाजपेयी (फोटो सौजन्य - एएनआई) 

साहित्य में पुरस्कार केवल प्रशस्ति-पत्र, शॉल, स्मृति-चिह्न और धनराशि का नाम नहीं है। पुरस्कार के साथ एक सार्वजनिक प्रतिष्ठा जुड़ी होती है। वह किसी रचनाकार को सम्मानित करने के साथ-साथ उस संस्था, व्यक्ति और व्यवस्था की भी प्रतिष्ठा निर्मित करता है जो उसे प्रदान करती है। इसलिए किसी साहित्यिक पुरस्कार के बारे में केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि उसे किस लेखक को दिया गया है। यह पूछना भी उतना ही जरूरी है कि पुरस्कार देने वाली संस्था कौन है, उसकी आर्थिक और संस्थागत पृष्ठभूमि क्या है और उसके साथ जुड़े लोगों की सार्वजनिक विश्वसनीयता कैसी है।

इसी संदर्भ में इस वर्ष के श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान को लेकर साहित्यिक जगत में उठ रहे प्रश्नों को देखा जाना चाहिए। इस वर्ष यह सम्मान अशोक वाजपेयी को दिया जा रहा है और सम्मान राशि 21 लाख रुपये है। ट्रस्ट की सार्वजनिक जानकारी में अभिषेक वर्मा की आयोजन और संस्था संबंधी भूमिका भी सामने आती है।

अशोक वाजपेयी के साहित्यिक अवदान का मूल्यांकन एक अलग विषय है। हिंदी कविता, आलोचना और सांस्कृतिक विमर्श में उनका लंबा योगदान है। किसी साहित्यकार के साहित्यिक महत्व को केवल इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि उसे मिला पुरस्कार विवादों से घिरी किसी संस्था से आया है। लेकिन इसी के साथ यह प्रश्न भी टाला नहीं जा सकता कि क्या पुरस्कार की नैतिकता पुरस्कार पाने वाले की साहित्यिक प्रतिष्ठा से स्वतंत्र कोई प्रश्न नहीं है?

यह प्रश्न आज इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि अभिषेक वर्मा का नाम पिछले वर्षों में रक्षा सौदों, कथित भ्रष्टाचार, धनशोधन और अन्य गंभीर मामलों से जुड़ी जांचों और मुकदमों में सामने आया है। इन मामलों में आरोप लगे हैं और न्यायिक प्रक्रियाएं चली हैं; कुछ मामलों में उन्हें अदालत से राहत या आरोपमुक्ति भी मिली है। इसलिए उन्हें ‘भ्रष्टाचारी सिद्ध व्यक्ति’ कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन उनके सार्वजनिक जीवन को गंभीर विवादों से रहित बताना भी सही नहीं होगा।

यहीं कानून और नैतिकता के बीच का अंतर सामने आता है।

किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का अधिकार अदालत के पास है। किसी आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करना न्यायिक प्रक्रिया का स्थान लेना होगा। लेकिन साहित्यिक संस्था की नैतिक विश्वसनीयता का प्रश्न केवल आपराधिक दोषसिद्धि से तय नहीं होता। सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा, पारदर्शिता, संस्थागत स्वतंत्रता और सामाजिक विश्वास भी महत्वपूर्ण होते हैं।

किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप सिद्ध न हुए हों, तब भी यह पूछना अनुचित नहीं कि उसके द्वारा संचालित या उससे निकटता से जुड़ी संस्था साहित्य के नाम पर पुरस्कार दे रही है तो उसकी आर्थिक और संस्थागत संरचना कितनी पारदर्शी है।

यही इस पूरे प्रसंग का केंद्रीय प्रश्न है।

साहित्य को धन की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन साहित्य की नैतिक स्वायत्तता धन से बड़ी चीज है।

बड़ी धनराशि वाला पुरस्कार साहित्यकार को आर्थिक सम्मान देता है, लेकिन उसके साथ पुरस्कार देने वाली संस्था को भी साहित्यिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। इसलिए दोनों के बीच एक तरह का पारस्परिक वैधीकरण होता है। साहित्यकार संस्था को सांस्कृतिक प्रतिष्ठा देता है और संस्था साहित्यकार को आर्थिक तथा सार्वजनिक सम्मान देती है। ऐसे में यह जानना स्वाभाविक है कि इस संबंध की बुनियाद कितनी पारदर्शी है।

21 लाख रुपये की राशि वाला पुरस्कार सामान्य साहित्यिक सम्मान से अलग महत्व रखता है। इतनी बड़ी राशि के साथ यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि धन का स्रोत क्या है, चयन की प्रक्रिया क्या है, निर्णायक मंडल कौन है, उसके सदस्य कितने स्वतंत्र हैं और चयन के मानदंड सार्वजनिक हैं या नहीं।

इन प्रश्नों को उठाना किसी साहित्यकार के सम्मान को कम करना नहीं है। बल्कि इसके विपरीत, यदि पुरस्कार की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो ऐसे प्रश्न पुरस्कार की प्रतिष्ठा को ही मजबूत करेंगे।

दुर्भाग्य यह है कि हमारे साहित्यिक समाज में पुरस्कारों पर प्रश्न उठाना अक्सर व्यक्तिगत विरोध, ईर्ष्या या गुटबाजी के रूप में देखा जाता है। पुरस्कार पाने वाले लेखक के साहित्यिक अवदान पर प्रश्न और पुरस्कार की संस्थागत नैतिकता पर प्रश्न—दोनों को एक ही समझ लिया जाता है। यह स्वस्थ स्थिति नहीं है।

किसी लेखक की कविता महत्वपूर्ण हो सकती है और फिर भी उसके द्वारा स्वीकार किए गए किसी पुरस्कार की संस्था पर प्रश्न उठाया जा सकता है। इसी तरह किसी पुरस्कार की संस्था की पृष्ठभूमि विवादास्पद हो सकती है और फिर भी पुरस्कार पाने वाला लेखक साहित्यिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। दोनों तथ्यों को एक साथ स्वीकार करने में कोई तार्किक विरोधाभास नहीं है।

वास्तविक समस्या तब पैदा होती है जब साहित्यिक समाज व्यक्ति के अनुसार अपनी नैतिक कसौटी बदलने लगता है।

जो लेखक सत्ता के पुरस्कारों, सरकारी संस्थाओं, कॉरपोरेट धन और राजनीतिक संरक्षण से जुड़े सांस्कृतिक आयोजनों पर प्रश्न उठाते हैं, उनसे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे अपने लिए उपलब्ध सम्मान और पुरस्कारों की पृष्ठभूमि पर भी वही प्रश्न उठाएं। यदि किसी विरोधी वैचारिक खेमे से आए पुरस्कार को स्वीकार करने वाले साहित्यकार पर सवाल उठाए जाते हैं, तो अपने वैचारिक निकट व्यक्ति के मामले में भी समान कसौटी लागू होनी चाहिए।

यही नैतिकता की पहली शर्त है—कसौटी व्यक्ति देखकर न बदले।

इस प्रसंग को और गंभीर बनाता है स्वयं को प्रगतिशील, जनवादी या जनपक्षधर कहने वाले साहित्यिक समुदाय का व्यवहार। किसी पुरस्कार को स्वीकार करना लेखक का व्यक्तिगत निर्णय है। उसे बधाई देना भी किसी लेखक का निजी अधिकार है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में वैचारिक दावे करने वाले लेखकों के लिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उनके घोषित मूल्य उनके व्यवहार में किस हद तक दिखाई देते हैं।

प्रगतिशीलता केवल कविता की विषयवस्तु नहीं है। जनवाद केवल कुछ राजनीतिक शब्दों का इस्तेमाल नहीं है। जनपक्षधरता केवल व्यवस्था की आलोचना करने से पूरी नहीं होती। इन सबकी एक नैतिक कीमत भी होती है। यदि लेखक सत्ता और धन के गठजोड़ की आलोचना करता है, लेकिन साहित्यिक प्रतिष्ठा के अवसर पर धन के स्रोत और संस्था की नैतिक पृष्ठभूमि के प्रश्न को सुविधानुसार भूल जाता है, तो उसके सामने अपने ही शब्दों और आचरण के बीच संबंध पर विचार करने का प्रश्न पैदा होता है।

एक घटना के आधार पर किसी लेखक के पूरे वैचारिक जीवन का फैसला करना भी उचित नहीं है। लेकिन दोहरे मानदंड की संभावना पर सवाल उठाना पूरी तरह जायज है।

साहित्यिक समाज में यह प्रश्न बार-बार उठना चाहिए कि हम पुरस्कारों को किस तरह देखते हैं। क्या पुरस्कार केवल लेखक की साहित्यिक उपलब्धि का सम्मान है? या वह पुरस्कारदाता की प्रतिष्ठा का निर्माण भी करता है? यदि दूसरा पक्ष भी सही है तो पुरस्कार स्वीकार करना केवल निजी उपलब्धि नहीं रह जाता। उसके सामाजिक अर्थ भी होते हैं।

किसी साहित्यकार के लिए यह कहना संभव है कि उसने पुरस्कार अपने साहित्यिक योगदान के लिए स्वीकार किया है, न कि पुरस्कारदाता की समस्त गतिविधियों का समर्थन करने के लिए। यह तर्क अपनी जगह वैध है। हर संबंध को समर्थन मान लेना उचित नहीं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में प्रतीकों का अपना अर्थ होता है। एक बड़ा पुरस्कार, बड़ी राशि और सार्वजनिक समारोह मिलकर एक ऐसी छवि बनाते हैं जिसमें पुरस्कारदाता और पुरस्कार पाने वाला दोनों एक-दूसरे की प्रतिष्ठा में सहभागी दिखाई देते हैं।

इसलिए कम-से-कम इतना प्रश्न तो पूछा ही जा सकता है कि क्या साहित्यकार को पुरस्कार स्वीकार करने से पहले संस्था की नैतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि की सार्वजनिक जांच नहीं करनी चाहिए?

ये प्रश्न किसी एक पुरस्कार तक सीमित नहीं हैं। हिंदी साहित्य में पुरस्कारों की पूरी संस्कृति को इन सवालों से गुजरना होगा।

आज साहित्यिक संस्थाओं की संख्या बढ़ी है, पुरस्कारों की संख्या बढ़ी है और पुरस्कार राशि भी बढ़ी है। लेकिन क्या इनके साथ पारदर्शिता भी बढ़ी है? क्या निर्णायक मंडलों की स्वतंत्रता सुनिश्चित हुई है? क्या पुरस्कारों के आर्थिक स्रोत सार्वजनिक होते हैं? क्या चयन के मानदंड पहले से स्पष्ट होते हैं? क्या किसी पुरस्कार को स्वीकार करने या अस्वीकार करने वाले लेखक के नैतिक निर्णय पर भी साहित्यिक समाज गंभीर बहस करता है?

इन प्रश्नों से बचकर साहित्य अपनी विश्वसनीयता नहीं बचा सकता।

श्रीकांत वर्मा का साहित्य सत्ता, राजनीति, इतिहास, भय और मनुष्य की जटिल स्थितियों से मुठभेड़ करता है। उनके नाम पर दिया जाने वाला पुरस्कार इसलिए केवल एक निजी पारिवारिक स्मृति नहीं है। वह हिंदी साहित्य के सार्वजनिक क्षेत्र में श्रीकांत वर्मा की स्मृति का प्रतिनिधित्व करता है। इसीलिए इस पुरस्कार की संस्थागत विश्वसनीयता का प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

साहित्यकार का दायित्व पुरस्कार ठुकराना भर नहीं है। उससे भी पहले उसका दायित्व प्रश्न पूछना है। संस्था का दायित्व भी केवल पुरस्कार देना नहीं, बल्कि यह विश्वास पैदा करना है कि पुरस्कार किसी छिपे हुए हित, निजी प्रतिष्ठा या सांस्कृतिक वैधीकरण का माध्यम नहीं है। और साहित्यिक समाज का दायित्व है कि वह इन प्रश्नों को व्यक्ति-पूजा या गुटबाजी में न बदलने दे।

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