
एक पुराने मित्र की बात से बात शुरू करना चाहता हूं। ऐसे मित्र की, जिनसे अभी हाल तक मैं किसी भी बात पर सहमत नहीं हो पाता था। वे भी मुझसे सहमत नहीं ही होते थे।
आप पूछ सकते हैं कि तब हमारी मित्रता अब तक सही और सलामत कैसे है? तो वह क्या है कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' कह गये हैं-'मित्रता बड़ा अनमोल रतन' और सारी असहमति के बावजूद यह रतन खोना न मुझे गवारा है न मित्र को। हममें से कोई जमीन को आसमान और आसमान को जमीन कहने लगे तो भी। एक शायर ने शायद हम दोनों की मित्रता के मद्देनजर ही शे'र कहा है कि जरा-सी बात पै तू दोस्तों से क्यों झगड़ता है, जमीं को आसमां कहने से तेरा क्या बिगड़ता है।
लेकिन पिछले दिनों बिहार में एक के बाद एक चार निर्माणाधीन पुल गिर गये तो हमारी असहमतियों की स्थिति बदल गई। इतनी कि जब मित्र ने कहा कि देखते जाइए, इस देश में संवाद, सदाचार और सदाशयता के पुलों को ढहाने का सिलसिला इसी तरह चलता रहा तो एक दिन पुलों के गिरने की ऐसी घटनाएं सामान्य होकर रह जायेंगी, तो मैं उनसे असहमत नहीं हो पाया।
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साफ कहूं तो समझ ही नहीं पाया कि कैसे असहमत होऊं। खासकर जब खुद ऐसी घटनाओं को मान्यता मिलती देख रहा हूं। मान्यता मिले बिना भला यह कैसे हो सकता था कि मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकाल लोक कारीडोर के प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन के छः सात महीनों में ही उसमें लगी सप्त ऋषियों की कई मूर्तियां एक आंधी का वेग भी नहीं सह पातीं, भूलुंठित हो जातीं और उनकी इस गति की जिम्मेदार सरकार की पार्टी फिर चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाती। उसका बाल भी बांका नहीं होता।
इसीलिए गत सोमवार को अचानक खबर आई कि अयोध्या में जो 'दिव्य और भव्य' राम मन्दिर बन रहा है और प्रधानमंत्री द्वारा जिसके उद्घाटन के अभी छ: महीने भी पूरे नहीं हुए हैं, उसकी छत से पहली ही बरसात में पानी टपकने लगा है और उसमें विराजमान रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येन्द्र दास को इसे लेकर मन्दिर का निर्माण कराने वाले श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से 'गुहार' लगानी पड़ी है कि ज्यादा पानी बरसने पर रामलीला की पूजा-अर्चना व दर्शन वगैरह बाधित हो सकते हैं, तो मित्र की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में मैं बेकरार-सा हो उठा।
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यह सोचते हुए कि क्या पता, उनकी इस बाबत प्रतिक्रिया से मैं असहमत हो पाता हूं या नहीं। यह जानने की उत्सुकता से बेचैन होते हुए भी कि वे उक्त ट्रस्ट की निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्र की इस सफाई के साथ खड़े होते हैं कि गर्भगृह की छत नहीं टपक रही और मन्दिर में अन्यत्र कहीं ऐसा हो रहा है तो वह कोई बड़ी बात नहीं है या आचार्य सत्येन्द्र दास के इस कथन के साथ कि बारिश के बाद मन्दिर के दर्शन स्थल (जहां से वीआईपी दर्शन कराए जाते हैं) में पानी भर गया था, जिसे निकालने में काफी मशक्कत करनी पड़ी।
मित्र की प्रतिक्रिया से अवगत होने को लेकर मैं इसलिए भी व्यग्र था कि यह खबर अकेली नहीं आयी थी। अपने साथ कई और खबरें भी ले आई थी।
एक तो यही कि उस मन्दिर तक जाने वाला तेरह किलोमीटर लम्बा रामपथ भी पहली बारिश नहीं झेल पाया । वह सहादतगंज से अयोध्या तक इक्कीस जगह धंस गया और ऊपर से गोल दिखाई देने वाले उसके गड्ढों के अन्दर देखने पर लगने लगा कि वे किसी नदी के ढहे हुए कगार हैं। इसके चलते उस पथ पर जगह-जगह बैरियर लगाकर पुलिस की तैनाती करनी पड़ी और यातायात को सुचारु बनाने के लिए पैबन्द लगाने पड़े।
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इतना ही नहीं, राम मन्दिर के आसपास के रिहायशी क्षेत्रों में पानी भर जाने से उसके निवासियों को अपने घरों की छतों पर शरण लेनी पड़ पड़ी।
एक और खबर यह थी कि जिस नवनिर्मित अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन को विश्व स्तर का बताया जा रहा था और प्राण-प्रतिष्ठा से पहले जिसका भारी तामझाम से उद्घाटन किया गया था, उसकी नवनिर्मित बाउंड्री वॉल पहली ही बरसात में बीस मीटर से ज्यादा ढह गई और स्टेशन के बड़े हिस्से में पानी भर गया।
बेकरारी में मैं अनुमान लगाने लगा कि अगली बार मित्र जैसे ही मिलेंगे, इन खबरों को लेकर व्यंग्यपूर्वक पूछेंगे - 'देख लिया न त्रेता की वापसी का असर?' और मैं कुछ बोल नहीं पाऊंगा।
तभी अचानक मित्र का फोन आया और वे मेरे 'हेलो' कहने का इंतजार करना तक गवारा किये बगैर कहने लगे, 'अब तो उन्हें पता चल ही गया होगा?'
मुझे कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा कि वे क्या कहना चाहते हैं? और किन्हें और क्या पता चल गया होगा? फिर भला क्या जवाब देता?
लेकिन यह मजबूरी उन्हें बताई तो वे बिफरते हुए से बोले, 'सबते भले हैं मूढ़, जिन्हें न व्यापै जगत गति! अरे, श्रीमान मूढ़! मैं पूछ रहा हूं कि जो महानुभाव अब तक अयोध्यावासियों को इस बात को लेकर न सिर्फ खरी-खोटी सुनाने और आर्थिक वहिष्कार का मजा चखाने पर आमादा थे, बल्कि कृतघ्न भी करार दे रहे थे कि उन्होंने भगवान राम का 'अपने घर' का पांच सौ साल पुराना इंतजार खत्म कराकर अयोध्या में त्रेता की वापसी कराने के लिए जमीन आसमान एक करने वालों को चुनाव हरा दिया, अब उन्हें यह मालूम हो गया होगा या नहीं कि वास्तव में कृतघ्न कौन है?'
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मैंने जानबूझकर उन्हें फिर भी कोई जवाब नहीं दिया। सच कहूं तो उनकी हालत का मजा लेने के लिए। लेकिन तभी अचानक उनके सब्र का बांध टूट गया और वे झुंझलाकर बोल उठे, 'अरे बेईमानों! (उनका आशय था मेरे जैसे 'बेईमान' पत्रकारों) तुम अपने आपको समझते क्या हो? तुम नहीं बताओगे तो किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा? तुम लोगों ने नहीं बताया तो बारिश ने ही बता दिया कि अयोध्यावासियों ने जिन्हें हराया, वे उनके प्रति ही नहीं, भगवान राम तक के प्रति कृतघ्न हैं।'
वे बोलते रहे और मैं सुनता रहा, 'भगवान राम इस मन्दिर से ज्यादा ठाठ से तो टाट में ही थे। टाट टपकता या पुराना पड़ जाता था तो बदल दिया जाता था। लेकिन अब? इतना 'भव्य' और 'दिव्य' मन्दिर तो बदल नहीं सकते। भले ही उसकी छत से पानी टपकता हो और उसके गर्भगृह से पानी की निकासी भी नहीं हो पाती हो। गर्भगृह में उनको स्नान कराया जाता हो तो भी पानी थाल में एकत्र करके बाहर ले जाना पड़ता हो।'
मैं फिर भी कुछ नहीं बोला तो उन्होंने किंचित आजिज़ी से पूछा, 'तुम सुन भी रहे हो कि नहीं?' और मेरे 'सुन रहा हूं' कहते ही फिर शुरू हो गये, 'तो क्या अयोध्या के लोग उनके प्रति अपनी कृतज्ञता साबित करने के लिए उन्हें सिर्फ इसलिए चुनाव दर चुनाव वोट देते रहते कि उन्होंने उनका वोट पाने के लिए कई राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों के वार्षिक बजट से कई गुनी धनराशि देश भर को 'सब्जबाग' दिखाने के लिए अयोध्या में झोंक दी और अपने अमले को उसे अनाप-शनाप खर्च करने के लिए आजाद कर दिया?'
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मैंने फिर भी मुंह नहीं खोला तो उन्होंने कहा, 'तुमसे भले तो वे लोग ही हैं, जिन्हें श्रद्धालुओं के दिए चन्दे से निर्मित हो रहे राम मंदिर में एक के बाद एक दुश्वारियां पैदा होने के बाद एक पुरानी फिल्म के गीत की यह पंक्ति बारंबार याद आने लगी है - देते हैं भगवान को धोखा इंसां को क्या छोड़ेंगे।'
अब मुझसे भी चुप नहीं रहा गया। अपनी बात कहने के लिए मैंने भी एक फिल्मी गीत का ही चुनाव किया: 'कौन वफादार है, कौन बेवफा है, हमको भी पता है तुमको भी पता है।'
'हां , ये हुई न बात।' उन्होंने कहा तो मुझे लगा कि मेरी सहमति ने उन्हें आह्लादित कर डाला है और वे 'विजय भाव' से भर उठे हैं।
लेकिन यह आह्लाद भी उन्हें कटूक्ति करने से नहीं रोक सका। वे कहने लगे, 'अच्छी बात है कि आखिरकार तुम्हें भी सद्बुद्धि आ गई और प्रधानमंत्री को भी। तुम मुझसे सहमत होने लगे और प्रधानमंत्री को देश को चलाने के लिए सहमति बहुत जरूरी लगने लगी।'
इस कटूक्ति का जवाब देना जरूरी लगा, इसलिए मैंने बिना देर किए पूछा,' लेकिन क्या पता कि प्रधानमंत्री को कृतज्ञता के पक्ष में सहमति जरूरी लग रही है या कृतघ्नता के? और लोकसभाध्यक्ष के चुनाव में जरूरी क्यों नहीं लगी?'
अफसोस कि मित्र ने कोई जवाब दिये बिना फोन काट दिया।
आप बताइए, आपको क्या लगता है?
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