विचार

बीजेपी ने राजनीतिक फायदे के लिए पूरे देश में बनाया नफरत का माहौल, अब युवाओं पर बड़ा दायित्व

आजादी को सीमित करने के अभियान में आजकल कानून-विधान से लेकर समाज, सबको औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। नजर घुमाकर देखें, कहीं कोई कानून आजादी पर कैंची चलाता नजर आएगा तो कहीं समाज का कोई राजनीति-प्रेरित हिस्सा मुश्कें चढ़ाता मिल जाएगा।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया 

देश में लोकतंत्र के सामने आज जैसी गंभीर चुनौतियां हैं, वैसी आजादी के बाद कभी नहीं रही। आजादी हमने बहुत भारी कीमत चुकाकर प्राप्त की है। देश ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की रहनुमाई में अहिंसा और सत्याग्रह के बल पर आजादी प्राप्त की थी। कांग्रेस के महान नेताओं के त्याग, बलिदान और संघर्ष से आजादी हासिल हुई। आजादी के बाद कांग्रेस के नेताओं ने नक्सलवाद, अलगाववाद और आतंकवाद- जैसी चुनौतियों का भी डटकर सामना किया। श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सरदार बेअंत सिंह ने तो अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए, लेकिन देश की एकता और अखंडता पर आंच नहीं आने दी। आज फासिस्ट ताकतों के हावी होने से लोकतंत्र पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।

श्रीमती इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाक सेना के जनरल से लेकर 92 हजार जवानों को समर्पण करवाकर बांग्लादेश का निर्माण कर दुनिया का भूगोल बदल दिया। ऐसी दूसरी मिसाल नहीं। पं. नेहरू, सरदार पटेल, डाॅ. आंबेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद, राधाकृष्णन, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि नेताओं ने भारतीय लोकतंत्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में अनुकरणीय योगदान दिया। हमें लोकतंत्र की मजबूत विरासत सौंपी। आजादी के बाद से ही कांग्रेस नेताओं ने नवनिर्माण और लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने का काम किया। इसी का परिणाम है कि 70 सालों के बाद भी विभिन्न विचारधारा की सरकारों के बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं संस्थाएं अपने मूल स्वरूप में बरकरार रहीं।

Published: 10 Aug 2019, 7:59 AM IST

लोकतंत्र में भारी जनादेश जनप्रतिनिधियों और सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारियों को बढ़ा देता है। सत्तारूढ़ दल के नेताओं से शालीनता की अपेक्षा की जाती है। किंतु आज हम देख रहे हैं कि अहंकार हावी हो रहा है। यह लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं है। भारी जनादेश का यह तात्पर्य बिल्कुल नहीं कि जनता सत्ता दल की सभी नीतियों से सहमत हो। आज लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि सत्तारूढ़ दल अपने फैसलों को जनता की मुहर मानने लग गया है। अनेक फैसले आमजन की राय जाने बगैर लिए जा रहे हैं। नोटबंदी इसका बड़ा उदाहरण है जिसने देश की अर्थव्यवस्था तबाह कर दी। आज प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में नोटबंदी का जिक्र नहीं करते क्योंकि यह उनकी विफलता का सबसे बड़ा स्मारक है।

एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार, देश में 45 वर्षों में सर्वाधिक बेरोजगारी दर्ज की गई है। आम चुनाव से पहले एनएसएसओ को आंकड़े बताने से रोका गया जिस कारण दो अधिकारियों ने इस्तीफे दे दिए। चुनाव खत्म होते ही सरकार ने स्वीकार किया कि बेरोजगारी दर 6.1 है। ये आंकड़े जनता से छुपाए गए, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

हमारा मुल्क जब आजाद हुआ तब नीति-निर्माताओं ने संवैधानिक संस्थानों की स्वायत्तता पर जोर दिया था। संविधान निर्माताओं ने एक शक्तिशाली विधायिका, स्वतंत्र न्यायपालिका, मजबूत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और स्वतंत्र निर्वाचन आयोग की अवधारणा रखी थी। इन संस्थानों की स्वायत्तता को कांग्रेस सरकारों ने मजबूत किया, उनकी गरिमा गिरने नहीं दी। साल 2014 में बीजेपी सरकार बनने के साथ ही इनकी स्वायत्तता खतरे में पड़ गई और इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे।

Published: 10 Aug 2019, 7:59 AM IST

पिछले पांच सालों में हमने देखा है कि किस प्रकार चुनाव आयोग, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सीबीआई, रिजर्व बैंक- जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता में हस्तक्षेप कर इन्हें कमजोर किया गया। स्वतंत्र एवं निर्भीक समझा जाने वाला मीडिया भी कमजोर दिखाई देने लगा। बीजेपी के नेतृत्व में मीडिया के ध्रुवीकरण में कोई कमी नहीं रखी गई। स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने वाले कई वरिष्ठ पत्रकार दबाव झेलने को विवश हैं। या तो आप सरकार के गुणगान करें या सोशल मीडिया पर हो रहे प्रोपेगेंडा का शिकार बनने को तैयार रहें। ऐसे पत्रकारों की फेहरिस्त भी है जिन्हें सच लिखने के लिए नौकरी गंवानी पड़ी।

यूपीए सरकार के समय देश में पहली बार यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अधिकार आधारित युग की शुरुआत हुई। कांग्रेस ने संसद में कानून बनाकर देश को विश्व का सबसे बड़ा रोजगार कार्यक्रम मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, खाद्यान्न का अधिकार और सूचना का अधिकार दिया। अब तो ऐतिहासिक सूचना के अधिकार की मूल भावना को समाप्त कर इसे कमजोर कर दिया गया है।

देश के अब तक के अप्रत्याशित घटनाक्रम के तहत जनवरी, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने प्रेस काॅन्फ्रेंस कर अपनी पीड़ा मीडिया को बताई थी। मीडिया के सामने जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट-जैसी संस्था की स्वायत्तता खतरे में है। जब तक यह स्वायत्तता बरकरार नहीं रखी जाती, लोकतंत्र पर खतरा मंडराता रहेगा। हालांकि चारों माननीय न्यायाधीशों ने यह बात सुप्रीम कोर्ट में कार्य विभाजन को लेकर कही थी लेकिन यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

Published: 10 Aug 2019, 7:59 AM IST

संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है। अभिव्यक्ति की आजादी को मौलिक अधिकारों में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। विशेष परिस्थितियों को छोड़कर कोई भी राज्य इस अधिकार को नहीं छीन सकता। कानून का भय दिखाकर अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाना संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता का हनन है। अब तो वित्त मंत्रालय ने बिना पूर्व अनुमति पत्रकारों के अधिकारियों से मिलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व लोकतंत्र के आधार स्तंभ माने जाते हैं लेकिन आज ये कहां नजर आ रहे हैं?

पिछले पांच साल में देश के कई हिस्सों में माॅब लिंचिंग की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। मई, 2019 में नरेन्द्र मोदी ने दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली लेकिन असहिष्णुता एवं नफरत भरे माहौल में कोई कमी नजर आती दिखाई नहीं दे रही। बेगुनाह और निर्दोष लोगों पर अनियंत्रित भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेकर की जाने वाली अमानवीय घटनाओं को रोकने के लिए राजस्थान सरकार द्वारा पहल करते हुए राजस्थान माॅब लिंचिंग से संरक्षण विधेयक 2019 लाया गया है। इसी प्रकार ऑनर किलिंग की रोकथाम के लिए राजस्थान सम्मान और परंपरा के नाम पर वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप संबंधी विधेयक, 2019’’ के माध्यम से सख्त कानून लाने की पहल की गई।

देश में असहिष्णुता बढ़ रही है और असहमति को दबाने की घटनाएं आए दिन अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। सरकार के खिलाफ बोलने वालों को राष्ट्रविरोधी करार देकर उनका मुंह बंद करने का प्रयास किया जा रहा है। पत्रकार एवं सोशल एक्टिविस्ट गौरी लंकेश और साहित्यकार एम.एम कलबुर्गी की हत्या इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

Published: 10 Aug 2019, 7:59 AM IST

बीजेपी ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए पूरे देश में नफरत का माहौल बना दिया है। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपना राष्ट्रधर्म भूल गए हैं। सत्ता के लालच में नफरत का जहर घोला जा रहा है। आज नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी) के नाम पर जिस प्रकार से समुदाय विशेष के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, वह निश्चित ही संवैधानिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए एक बड़ा खतरा है।

बीजेपी ने महात्मा गांधी, सरदार बल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री और डाॅ. भीमराव आंबेडकर का 70 सालों तक कभी नाम नहीं लिया और उनकी विचारधारा के खिलाफ रहे। अब इनके योगदान को पहचाना और इनका नाम लेकर चुनाव जीतने की राजनीति कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी और इनके नेताओं को इनका नाम लेने से पहले देशवासियों से माफी मांगनी चाहिए।

गांधी जी ने सिद्धांतहीन राजनीति को ‘महापाप’ कहा था। आज सत्ता में बैठे राजनीतिक दल ने सारे नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दे दी है और सत्ता में बने रहने के लिए हर तरह के हथकंड़े अपनाए जा रहे हैं। सांप्रदायिकता, ध्रुवीकरण और नफरत की राजनीति चारों तरफ दिखाई दे रही है। लोकतंत्र के मजबूत ताने-बाने को एक साजिश के तहत कमजोर किया जा रहा है। स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व- जैसे संवैधानिक मूल्यों का निरंतर हृास हो रहा है।

Published: 10 Aug 2019, 7:59 AM IST

आज हम सभी की यह जिम्मेदारी बनती है कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर हो रहे कुठाराघात, संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की सभी नापाक कोशिशों के खिलाफ पूरी ताकत के साथ उठ खड़े हों और उन फासिस्ट शक्तियों के खिलाफ आवाज बुलंद करें जो नफरत का माहौल पैदा करने की कोशिशों में लगी हुई हैं। कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी ने पिछली लोकसभा में कांग्रेस के 44 सांसद होते हुए भी मुद्दों पर आधारित राजनीति की। कभी भी यह अहसास नहीं होने दिया कि हम कम संख्या में हैं। हमेशा देश और जनता के हितों को ध्यान में रखा और एक मजबूत विपक्ष के नेता की भूमिका निभाई।

इसके विपरीत बीजेपी ने छद्म राष्ट्रवाद, धर्म की राजनीति और सेना की आड़ लेकर जनता को भ्रमित कर जीत हासिल की जो लोकतंत्र की परंपरा के विरुद्ध है लेकिन सच्चाई हमारे पक्ष में है। सत्य परेशान हो सकता है किंतु पराजित नहीं हो सकता। कांग्रेस द्वारा देश को सौंपी गई देश की मजबूत अर्थव्यवस्था बीजेपी के सत्ता में आते ही चैपट होकर रह गई। इतिहास में पहली बार काॅरपोरेट जगत के अदी गोदरेज, किरण मजूमदार शाॅ, राहुल और रवि बजाज, ए.एम नायक आदि ने बीजेपी सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। काॅफी किंग वी.जी. सिद्धार्थ की आत्महत्या सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता का ज्वलंत उदाहरण है।

आज युवाओं, विशेषकर विद्यार्थियों और पहली बार मतदान करने वाली युवा पीढ़ी के वोट बटोरने के लिए उन्हें गुमराह कर उनके नाम पर राजनीति की जा रही है। युवा पीढ़ी को यह बात समझनी होगी कि भ्रमित करने वाली राजनीति से उनका भविष्य कभी उज्ज्वल नहीं हो सकता। युवाओं पर आज बहुत बड़ा दायित्व है क्योंकि युवा पीढ़ी ही इतिहास बनाती है। पूरा देश लोकसभा के हाल ही संपन्न चुनाव परिणामों को लेकर हतप्रभ है। इतनी भारी जीत के बावजूद सत्तारूढ़ दल में उत्साह क्यों नहीं है? यह देश की जनता के लिए विचारणीय प्रश्न है।

(नवजीवन के लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का लेख)

Published: 10 Aug 2019, 7:59 AM IST

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Published: 10 Aug 2019, 7:59 AM IST