विचार

लोकसभा-राज्यसभा में 2/3 बहुमत जुटाने के मिशन में जुटी बीजेपी, विपक्षी दलों से 'ऑपरेशन सांसद चोरी' जारी

बीजेपी इस बात को बिल्कुल भी नहीं छिपा रही है कि वह विपक्ष के चुने हुए सांसदों को पार्टी छोड़ने के लिए उकसा रही है। यहां तक कि संसद के अंदर और बाहर बीजेपी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कड़े और मुखर आलोचक रहे मेताओं का भी खुले दिल से स्वागत किया जा रहा है।

पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की फाइल फोटो
पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की फाइल फोटो 

इस हफ़्ते जब शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के सांसद और प्रवक्ता संजय राउत ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि उन्हें जानकारी मिली है कि महाराष्ट्र के सांसदों को उसी रात '15 करोड़ रुपये का एडवांस' मिलने वाला है, तो वे असल में उस चर्चा की पुष्टि कर रहे थे कि लोकसभा में शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के कई सांसद सत्ताधारी एनडीए गठबंधन में शामिल होने वाले हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, 'अपना सपना, मनी, मनी।'

दरअसल केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी इस बात को बिल्कुल भी नहीं छिपा रही है कि वह विपक्ष के चुने हुए सांसदों को पार्टी छोड़ने के लिए उकसा रही है। यहां तक कि संसद के अंदर और बाहर बीजेपी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कड़े और मुखर आलोचक रहे तृणमूल कांग्रेस की सायनी घोष जैसे लोगों का भी खुले दिल से स्वागत किया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस के एक नाराज़ सांसद और ममता बनर्जी के कुछ बचे हुए वफादारों में से एक, कीर्ति आज़ाद ने इस बाबत कहा है कि तृणमूल के बागी नेता अपनी निष्ठा बदलने की शर्तें तय करने के लिए बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे से मिल रहे थे। उन्होंने कहा कि जब बीजेपी नेता अंदर बागियों के साथ बैठक कर रहे थे, तब पुलिस बाहर गेट पर तैनात थी।

इस दौरान तृणमूल कांग्रेस के ‘बागी’ नेताओं ने पुष्टि की है कि उन्होंने नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के आवास पर उनसे मुलाकात की थी। प्रधान पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी के प्रभारी थे। इसके बाद वे सभी साथ मिलकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के आवास पर गए, उनके साथ तस्वीरें खिंचवाईं और उन्हें एक पत्र सौंपा। इस पत्र में उन्होंने एनडीए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ‘दूरदर्शी नेतृत्व’ का समर्थन करने का अपना संकल्प जताया।

ध्यान रहे बीजेपी राज्यसभा और लोकसभा, दोनों में अपनी संख्या बढ़ाने के लिए जीतोड़ कोशिश में लगी हुई है-- और अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किसी और चुनाव का इंतज़ार करने के मूड में नहीं है। दरअसल दो साल पहले हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी को खासा बड़ा झटका लगा था, क्यों कि वह लोकसभा में अपने बूते बहुमत हासिल करने में नाकाम रही थी। उसने सिर्फ 240 सीटों जीती थीं। किसी तरह नीतीश कुमार की जेडीयू और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी की मदद से उसने सरकार बनाई थी। लेकिन बीजेपी कानून में जो बदलाव करना चाहती है, उसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है।

ऐसे में माना जा सकता है कि बंगाल विधानसभा चुनावों में जीत और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस के बिखरने के बाद बीजेपी ने तय कर लिया है कि अब अगले चुनाव से पहले दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश की जाए। तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों के हालिया बागी रुख के बाद, सरकार के पक्ष में वोटिंग करने वालों की संख्या कागजों पर तो 312 हो गई है, जबकि 'वन नेशन वन इलेक्शन' बिल या परिसीमन बिल जैसे संवैधानिक संशोधनों को पास कराने के लिए उसे लोकसभा में कम से कम 361 सांसदों के समर्थन की ज़रूरत है।

संविधान में बदलाव के लिए ज़रूरी है कि मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों में से दो-तिहाई सदस्य इसके पक्ष में वोट करें। दूसरी शर्त यह है कि वोटिंग के समय मौजूद सांसदों की कुल संख्या सदन की कुल क्षमता की आधी होनी चाहिए। लोकसभा की कुल क्षमता 543 है और आधी संख्या 272 होती है। महिला आरक्षण बिल से जुड़े परिसीमन बिल पर वोटिंग के दौरान लोकसभा के 528 सदस्य मौजूद थे और उन्होंने वोट किया। इसलिए, यह शर्त पूरी हो गई। लेकिन दूसरी शर्त - मौजूद और वोट करने वाले सांसदों का दो-तिहाई (528 का दो-तिहाई, यानी 352) - पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि सरकार बिल के पक्ष में सिर्फ़ 278 से 298 वोट ही जुटा पाई।

इसलिए, कुल क्षमता के दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत नहीं होती। ऐसे हालात में, वोट न देने वाले सदस्य भी अहम हो जाते हैं। लेकिन बीजेपी कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहती।

बीजेपी का मानना ​​है कि हर पांच साल में एक बार पूरे देश में चुनाव होने से वह हमेशा सत्ता में बनी रहेगी और उसे हर साल किसी न किसी राज्य में जनता का सामना करने की परेशानी से भी छुटकारा मिल जाएगा। जैसा कि जम्मू-कश्मीर और असम में देखा गया है, पूरे देश में सीटों के नए सिरे से बंटवारे (परिसीमन) की प्रक्रिया से भी उसे अपने फ़ायदे के हिसाब से चुनावी क्षेत्रों को फिर से व्यवस्थित करने में मदद मिलेगी, जिससे उसकी चुनावी जीत पक्की हो सकेगी।

4 मई 2026 को विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद से पिछले कुछ हफ़्तों में जो कुछ दिखा है, उससे साफ़ है कि बीजेपी चुने हुए प्रतिनिधियों को लालच देकर, डरा-धमकाकर, खरीदकर या ब्लैकमेल करके अपने समर्थन में लाने और संसद में एनडीए की संख्या बढ़ाने के अभियान में जुट गई है।

जो लोग आदर्शवादी हैं, उन्हें यह लोकतंत्र का मज़ाक और मतदाताओं का अपमान लग सकता है, क्योंकि 2024 में जनता ने बीजेपी को अपना एजेंडा आगे बढ़ाने का जनादेश नहीं दिया था। सांसदों से दल-बदल करवाना बहु-दलीय व्यवस्था और जनता के साथ एक क्रूर मज़ाक और अनैतिक व स्वार्थी काम है। लोगों को शायद यह भ्रम हो कि उन्होंने किसी खास विचारधारा, कार्यक्रम और नीतियों के आधार पर अपने प्रतिनिधि चुने हैं। लेकिन बीजेपी का उन्हें यही संदेश है कि उसे असल में जनता के जनादेश की कोई परवाह नहीं है।

सांसदों पर आजमाया जा रहा लालच और/या दबाव का यह सिलसिला तृणमूल कांग्रेस या शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के सांसदों तक ही सीमित रहने की संभावना नहीं है।

देश को विपक्ष से पूरी तरह मुक्त करने का बीजेपी का राजनीतिक मिशन 2016 में नोटबंदी और उसके ठीक अगले साल शुरू की गई इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के साथ शुरू हुआ। ये दोनों ही विपक्ष को बैकफुट पर लाने की सोची-समझी और चालाकी भरी रणनीतियां थीं। ऐसे कई कारण और सबूत हैं जिनसे यह माना जा सकता है कि बीजेपी को नोटबंदी के बारे में पहले से पता था और उसने अपने फंड को सुरक्षित रखने की तैयारी पहले ही कर ली थी, जबकि विपक्ष को इसकी भनक तक नहीं लगी और उसे इस उथल-पुथल का खामियाजा भुगतना पड़ा।

इसी तरह, इलेक्टोरल बॉन्ड रिश्वत को एक जगह इकट्ठा करने का ज़रिया थे, जिसके तहत दान देने वाले लोग पॉलिसी में बदलाव, फ़ायदे और लेन-देन के बदले बीजेपी के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदते थे। इसने बीजेपी को संरक्षण का एक ढांचा बनाने और अपने संसाधनों को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ाने में मदद की। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद भी यह सिस्टम अनौपचारिक रूप से जारी है। भारत के चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों द्वारा सौंपे गए ताज़ा आंकड़ों से पता चलता है कि ₹10,000 करोड़ के चंदे के साथ बीजेपी, सभी अन्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को मिलाकर भी उनसे कहीं ज़्यादा अमीर है।

इससे पता चलता है कि बीजेपी चुनावों में बेहिसाब पैसा खर्च करने — जिस पर कोई कानूनी सीमा नहीं है — और देश के हर ज़िले में आलीशान दफ़्तर बनाने में कैसे कामयाब रही है। पार्टी ने वह कर दिखाया है जो पुरानी पार्टियां नहीं कर पाईं। पार्टी ने सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट जैसी सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने और असहमति जताने वालों की आवाज़ दबाने के लिए भी किया है। जहां तक मुख्यधारा की मीडिया की बात है, जो कमाई के लिए तरह सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है, तो उनके लिए सरकार से सवाल पूछना अब कोई विकल्प नहीं रह गया है।

इसी मुश्किल हालात के बीच, बीजेपी ने चुनावी अनिश्चितताओं के जोखिम के बिना संसद में अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश शुरू की है। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में शामिल होने – जिसे राज्यसभा के चेयरमैन सी पी राधाकृष्णन द्वारा ‘विलय’ के तौर पर मान्यता और मंज़ूरी दिए जाने से राज्यसभा में एनडीए की ताकत बढ़कर 148 हो गई है। राज्यसभा चुनावों के मौजूदा दौर में एनडीए को और भी कई सीटें मिलने की संभावना है।

बीजेपी पहले ही मध्य प्रदेश से तीन सीटें जीत चुकी है और उसे झारखंड और मिजोरम से तीन और सीटें हासिल होने की उम्मीद है। तृणमूल कांग्रेस के तीन सांसदों के राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद, एनडीए इस साल के अंत में होने वाले उपचुनावों के बाद पश्चिम बंगाल से सभी तीन सीटें सुरक्षित करने के लिए तैयार है, जिससे उसकी संख्या 154 हो जाएगी, 163 सीटों में से नौ कम और उच्च सदन में दो-तिहाई बहुमत होगा।

नवंबर तक एनडीए की राज्यसभा में ताकत कम हो सकती है, क्योंकि उत्तर प्रदेश से 10 सांसद रिटायर हो रहे हैं। इससे समाजवादी पार्टी को राज्य विधानसभा में अपनी बेहतर संख्या के कारण कुछ सीटें मिल सकती हैं। लेकिन क्या होगा अगर बीजेपी अगले दौर से पहले उसके कुछ सांसदों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब हो जाती है? आठ सांसदों वाली डीएमके, तीन सांसदों वाली आप, सात और छह सीटों वाली वाईएसआरसीपी और बीजेडी, और एमडीएमके जैसी एक-दो छोटी पार्टियां राज्यसभा में किसी भी तरफ जा सकती हैं।

इस सबके बावजूद लोकसभा में एनडीए अभी भी 363 के जादुई आंकड़े से काफी दूर है, लेकिन विपक्ष को सावधान रहना होगा।

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