विचार

'भगवा बदलाववाद' के जरिए बीजेपी की नई ऐतिहासिक लूट

लुटियंस की प्रतिमा की जगह राजाजी की प्रतिमा लगाना सबसे बड़ा दिखावटी ‘डीकोलोनाइजेशन’ है

फरवरी में राष्ट्रपति भवन से लुटियन की प्रतिमा हटाकर राजाजी की प्रतिमा स्थापित कर दी गई
फरवरी में राष्ट्रपति भवन से लुटियन की प्रतिमा हटाकर राजाजी की प्रतिमा स्थापित कर दी गई 

23 फरवरी 2026 को, राष्ट्रपति भवन में सांस्कृतिक बर्बरता की एक और बेशर्म हरकत हुई: नई दिल्ली के मुख्य वास्तुकार एडविन लुटियंस की मूर्ति को हटाकर वहां सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) की मूर्ति लगा दी गई। राजगोपालाचारी आजाद हिन्दुस्तान के पहले और इकलौते गवर्नर-जनरल (1948-50) थे। बीजेपी ने इसे ‘डीकोलोनाइजेशन’ से जुड़ा काम बताया और राजाजी के परपोते को प्रवक्ता बनाकर इसे और वैधता देने की कोशिश की। यह आजादी की लड़ाई की विभूतियों- पटेल से लेकर बोस तक, आम्बेडकर से लेकर गांधी तक- को मौकापरस्ती में इस्तेमाल करने की कड़ी में नई चाल है। 

यह पैटर्न जितना खतरनाक है, उतना ही प्रत्याशित। विशालकाय मूर्ति के जरिये पटेल को ऐसे ताकतवर आदमी के तौर पर पेश करने की कोशिश हो रही है जो पाकिस्तान को धूल चटा सकता था। क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस को एक चुनावी होलोग्राम में बदल दिया गया, उनके समाजवाद को सहूलियत से हटा दिया गया। आम्बेडकर ‘सांस्कृतिक पुनरुत्थानवाद’ के भगवा समर्थक बना दिए जाते हैं, हिन्दू धर्म की उनकी तीखी आलोचना को किनारे रख दिया जाता है। गांधी? सावरकर की जीवनी में उनकी तारीफ की जाती है, फिर भी वह (आरएसएस की ‘लोककथाओं’ में) बंटवारे के लिए हमेशा दोषी हैं।

Published: undefined

सीन में राजाजी की एंट्री भी इसी पैटर्न पर हुई है। इस पर विचार करते हैं। उन्होंने गांधी के साथ मार्च किया, 1930 के वेदारण्यम नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया और मद्रास प्रीमियर (1937-39) के तौर पर मंदिर में प्रवेश में सुधार लाते हुए जाति के बंधनों को तोड़ा। और हां, उन्होंने नेहरू के समाजवाद से किनारा करते हुए 1959 में ‘स्वतंत्र पार्टी’ बनाई।

धोखा उन बातों में है जिन्हें बीजेपी की कहानी से हटा दिया गया है। राजाजी 1942 की क्रिप्स बातचीत में गांधी का दाहिना हाथ थे, वह बंटवारे से पहले की रुकावटों को दूर करने के लिए सुझाए गए ‘राजाजी फॉर्मूले’ के लेखक थे, भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में उनकी चुप्पी सांप्रदायिक डर की वजह से थी, बेवफाई की वजह से नहीं। उनकी आत्मा सेकुलर थी। 1950 के एक भाषण में उन्होंने कहा था: ‘भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं... हमें मुसलमानों को सुरक्षित महसूस कराना होगा।’ बीजेपी जिस तरह मंदिर प्रकरण का जीत की तरह जश्न मनाती है, वह इसके एकदम उलट है। उनकी 1957 की किताब ‘अहिंसा एंड दि वे ऑफ ऐक्शन’ में अहिंसा को सार्वभौमिक बताया गया है, न कि हिन्दुओं को अपवाद माना गया है: ‘अहिंसा कमजोर लोगों का हथियार नहीं बल्कि इंसान की सबसे मजबूत ज्ञात शक्ति है’।

Published: undefined

बीजेपी के झूठ का तब पर्दाफाश हो जाता है जब हम राजाजी की हिन्दू महासभा, आरएसएस, जनसंघ के लिए गहरी नफरत को समझते हैं। गौर करने वाली बात है कि इसी वैचारिक कड़ी में आज की बीजेपी भी आती है। 1948 में गांधीजी की हत्या के बाद राजाजी ने हिन्दू महासभा को ‘सांप्रदायिक जहर फैलाने वाला’ कहा और आरएसएस के साथ उसपर भी बैन लगाने की मांग की थी। उन्होंने ‘यंग इंडिया’ (अप्रैल 1948) में लिखा, ‘हिन्दू महासभा और आरएसएस नफरत का माहौल बनाने के लिए जिम्मेदार हैं,’ और इस तरह उन्होंने ‘हिंसक पंथ’ को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका को लेकर तभी आगाह कर दिया था। 

जहां तक आरएसएस की बात है, राजाजी गोलवलकर की जातीय-धार्मिक फंतासी को समझ गए थे। 1952 में नेहरू को भेजे एक खत में उन्होंने लिखाः ‘आरएसएस एक निजी सेना है... लोकतंत्र के लिए खतरा’। उन्होंने हिन्दू राष्ट्र के लिए उनके जुनून का मखौल उड़ाया और 1960 में स्वतंत्र पार्टी की एक रैली में कहा: ‘हिन्दू धर्म जीने का एक तरीका है, अल्पसंख्यकों को दबाने का राजनीतिक कार्यक्रम नहीं।’ सावरकर, जिन्हें राजाजी ने गवर्नर-जनरल के तौर पर माफ किया था (किंतु हिचकिचाहट के साथ), इस जहर के प्रतीक थे। बाद में, राजाजी यह समझते हुए सावरकर से दूर हो गए कि उनके नफरती हिन्दुत्व ने बंटवारे के बीज बोए थे।

Published: undefined

राजाजी बीजेपी के पूर्व संस्करण जनसंघ से लगातार लड़ते रहे। 1967 के चुनावों में स्वतंत्र पार्टी ने कांग्रेस के खिलाफ रैलियां कीं, लेकिन जनसंघ के ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ के नारे से भी खुद को अलग रखा। ‘रिफॉर्मर्स इंडिया’ (1964) में, उन्होंने बहुसंख्यकवाद पर कटाक्ष किया: ‘जनसंघ का धर्म-आधारित देश का सपना पुराने जमाने की याद दिलाता है... भारत को एक सेकुलर लोकतंत्र बनना होगा, वरना वह खत्म हो जाएगा’। उन्होंने लिखा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जोश ‘देशभक्ति के भेष में कट्टरता’ है और आगाह किया कि इससे मुसलमान अलग-थलग पड़ जाएंगे और देश टूट जाएगा।

राजाजी आज की बीजेपी के बारे में क्या कहते? बहुत कुछ। इसका सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) हिन्दू महासभा के उस बहिष्कार की याद दिलाता है जिससे वह नफरत करते थे; एनआरसी ने उन डरों को फिर से जिंदा कर दिया है, जिनसे वह परेशान थे। 1971 में स्वतंत्र पार्टी के एक पर्चे में उन्होंने चेतावनी दी थी: ‘कोई भी सच्चा भारतीय धर्म से परिभाषित राष्ट्र को स्वीकार नहीं कर सकता... यह रास्ता अंतहीन संघर्ष की ओर ले जाता है’।

और अयोध्या? दंगों के बाद समुदायों में समझौता करवाने वाले इस शख्स ने इसे ‘देश की एकता के लिए बेअदबी’ कहा होता। यूनिफॉर्म सिविल कोड? पर्सनल लॉ में सुधार के हिमायती ने जबरदस्ती नहीं, बल्कि सहमति पर जोर दिया होता। बुलडोजर? वह इसके खिलाफ अड़ जाते। 

Published: undefined

लुटियंस की जगह राजाजी को लाना दिखावटी डीकोलोनाइजेशन है। लुटियंस की दिल्ली में मुगल मेहराबों को ब्रिटिश गुंबदों के साथ मिलाया गया है- ऐसा हाइब्रिड जिसे बीजेपी पाखंडी तरीके से पसंद करती है (उनकी जी20 झांकियां याद हैं?)। सिर्फ एक मूर्ति पर क्यों रुकना? इंडिया गेट क्यों नहीं गिराना? लुटियंस जोन का नाम क्यों नहीं बदलना? 

‘भगवा बदलाववाद’ जो कर रहा, वह खतरनाक है। यह चाहता है कि हम भूल जाएं कि पटेल ने सांप्रदायिकता के खिलाफ चेताया था; कि बोस ने फासीवादियों से लड़ाई लड़ी थी; कि आम्बेडकर ने बराबरी का मसौदा तैयार किया था और गांधी ने इसे आकार दिया था। राजाजी के बाद कौन? चुनावों के नजदीक आने पर, सावरकर की मूर्तियों, भगत सिंह की बायोपिक की उम्मीद करें... आप समझ ही गए होंगे।

नागरिकों, अपना इतिहास पुनः प्राप्त करें। राजाजी की प्रतिमा एक जटिल और विविधतापूर्ण विरासत का हिस्सा है, न कि भाजपा के भगवा मंदिर का। उनकी आत्मा हमें 1955 के उनके भाषण का याद दिलाए जिसमें उन्होंने कहा था: ‘भारत का सबसे बड़ा दुश्मन सांप्रदायिकता है।’

(हसनैन नकवी मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में हिस्ट्री फैकल्टी के पूर्व सदस्य हैं।)

Published: undefined

Google न्यूज़नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia

Published: undefined