
तीन दशक से अधिक समय तक जंतर-मंतर प्रतिरोध का सिंबल बना रहा
धीरे-धीरे जंतर-मंतर ने देश की लोकतांत्रिक चेतना में जगह बना ली
प्रदर्शन का उद्देश्य जिम्मेदारों को जवाबदेही के लिए बाध्य करना होता है
सरकार के लिए दूर-दराज में होने वाले प्रदर्शन की अनदेखी करना आसान होगा
साठ साल से भी पहले, जब मैं केरल के पथानमथिट्टा में स्कूली छात्र था, एक बुज़ुर्ग ने विरोध को अपनी दिनचर्या बना लिया था। हर कार्यदिवस पर वह तालुका दफ्तर के गेट के पास अपना छोटा-सा फोल्डिंग तंबू गाड़ते और बैठ जाते। वह यह एक ऐसे मकसद के लिए लड़ रहे थे जिसे वह वाजिब मानते थे। वह एक प्राकृतिक चिकित्सक थे, और उनकी मांग थी कि सरकार सभी प्रकार के मांसाहारी भोजन पर प्रतिबंध लगाए।
सैकड़ों दिन उनका आंदोलन चलता रहा। आखिरकार उनका निधन हो गया और इसी के साथ उनका धरना भी खत्म हो गया। स्कूल जाते समय मैं उन्हें लगभग हर रोज देखता था। एक बच्चे के रूप में मैं उनकी मांग का तर्क नहीं समझ पाता था। यह पूरी तरह अव्यावहारिक नहीं, तो कम-से-कम अतार्किक तो जरूर लगती थी। फिर भी किसी ने उनके शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर सवाल नहीं उठाया।
बचपन की वह याद मुझे तब ताजा हो आई जब मैं लंदन गया। जिन जगहों को मैं सबसे पहले देखना चाहता था, उनमें हाइड पार्क और खासकर उसका ‘स्पीकर्स कॉर्नर’ था, जहां लोग पारंपरिक रूप से किसी भी विषय पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए जुटते रहे हैं।
मुझे याद आया कि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार और पारंपरिक सोच को चुनौती देने के लिए इस पार्क की सार्वजनिक भाषण परंपरा का इस्तेमाल किया था। स्पीकर्स कॉर्नर लंबे समय से दृढ़ विश्वास, असामान्य सिद्धांतों और कभी-कभी विचित्र मान्यताओं वाले लोगों को आकर्षित करता रहा है। किसी की बात से सहमत हुए बिना भी उसके बोलने के अधिकार का सम्मान किया जा सकता है।
इसके बाद मैंने वाशिंगटन डीसी, बर्लिन और पेरिस में सार्वजनिक प्रदर्शनों से जुड़े स्थलों का दौरा किया। हर शहर में सार्वजनिक जीवन में विरोध की साफ मौजूदगी दिखती है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और वीगन समर्थकों से लेकर समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विरोधियों तक- लोग अपनी मांगें उठाने के लिए सार्वजनिक स्थलों का रुख करते हैं। कुछ लोग सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन करते हैं, तो कुछ सामाजिक कुरीतियों, आर्थिक नीतियों या अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के खिलाफ।
मुझे जिस बात ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह यह थी कि ये प्रदर्शन स्थल किसी गुमनाम कोने में नहीं छिपाए गए थे। वे अक्सर प्रमुख स्थानों पर होते थे, कई बार तो उन संस्थानों की सीधी नजर के सामने जिन्हें वे प्रभावित करना चाहते थे। वाशिंगटन में लाफायेट स्क्वायर व्हाइट हाउस से पेंसिल्वेनिया एवेन्यू के ठीक उस पार है। ऐसे स्थल अब पर्यटन सर्किट का भी हिस्सा बन चुके हैं। सैलानी सिर्फ स्मारकों और इमारतों को देखने नहीं आते, बल्कि उन जगहों को भी देखने आते हैं जहां नागरिकों ने अपने अधिकारों का दावा किया है।
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दिल्ली का विरोध-प्रदर्शनों के साथ रिश्ता कहीं अधिक उलझा हुआ रहा है। वर्षों तक इंडिया गेट के पास बोट क्लब के लॉन प्रदर्शनों और सार्वजनिक सभाओं के लिए पसंदीदा जगह हुआ करते थे। वह स्थान आदर्श था। वह शहर के केन्द्र में था, पहुंचना आसान था और वह सरकारी सत्ता के संस्थानों के बेहद करीब था। वहां जुटने वाली किसी बड़ी भीड़ की न तो हुक्मरान अनदेखी कर सकते थे और न आम जनता।
1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों के विशाल जमावड़े ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया। दसियों हजार किसान बोट क्लब क्षेत्र में उमड़ पड़े, जिससे राजधानी ठहर सी गई और सरकार को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या शहर के बीचों-बीच इतने बड़े प्रदर्शनों की अनुमति दी जानी चाहिए।
सरकार ने आखिरकार जंतर-मंतर को आधिकारिक विरोध स्थल के रूप में तय किया। 1990 के दशक के शुरू तक यह उस जगह के तौर पर उभरा जहां नागरिक अपनी शिकायतें दर्ज कराने के लिए इकट्ठा हो सकते थे। इस व्यवस्था का एक स्पष्ट प्रशासनिक लाभ था। पुलिस सीमित प्रवेश द्वारों के जरिये प्रदर्शनकारियों की आवाजाही को नियंत्रित कर सकती थी, जिससे भीड़ प्रबंधन आसान हो जाता था।
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तीन दशक से अधिक समय तक इस व्यवस्था ने दोनों पक्षों का काम बखूबी संभाला। प्रदर्शनकारी संसद, सरकारी कार्यालयों और मंत्रियों व वरिष्ठ अधिकारियों के आवासों के वाजिब दायरे में इकट्ठा हो सकते थे। वहीं सत्ता में बैठे लोग प्रदर्शनों पर नजर रख सकते थे और उन्हें नियंत्रण में रख सकते थे। प्रदर्शनकारियों को मनोवैज्ञानिक संतोष रहता था कि वे उन लोगों के करीब हैं जिनका वे सामना करना चाहते थे, जबकि प्रशासन खुद को यह दिलासा दे सकता था कि राजधानी भर में फैलाए बिना असंतोष को एक जगह समायोजित किया जा रहा है।
जंतर-मंतर धीरे-धीरे दिल्ली के एक भूखंड से कहीं ज्यादा बन गया। उसने देश की लोकतांत्रिक चेतना में जगह बना ली। किसान, छात्र, मजदूर, सरकारी कर्मचारी, सामाजिक कार्यकर्ता और हाशिए के समुदायों के प्रतिनिधि इंसाफ की मांग लेकर वहां जुटते रहे। कुछ अभियानों में मुट्ठी भर लोग ही जुटते, जबकि अन्य ने भारी भीड़ खींची और राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान बटोरा। यह स्थल नागरिकों और हुकूमत के बीच चलने वाली निरंतर बहस का एक जाना-पहचाना मंच बन गया।
लेकिन प्रशासन शायद यह भूल चुका है कि ऐसी जगह देने का असल मकसद क्या था। विरोध स्थल का मतलब पुलिस के लिए प्रदर्शनों को सुविधाजनक बनाना नहीं होता। इसका असली मकसद यह है कि लोग अपनी शिकायतें उन तक पहुंचा सकें जो उन पर शासन करते हैं।
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दिल्ली में हालिया विरोध प्रदर्शनों ने सार्वजनिक असंतोष के प्रति सरकार की सहनशीलता की कड़ी परीक्षा ली है। सरकार को जो समझना चाहिए था, वह यह था कि भीड़ का आकार जनता के आक्रोश की गहराई और इकट्ठा हुए लोगों की भावनाओं की तीव्रता को दर्शा रहा था। इस संदेश को समझने के बजाय, प्रशासन ने एक कथित प्रशासनिक समाधान निकाला: जंतर-मंतर को आधिकारिक विरोध स्थल की सूची से बाहर करना और उसकी जगह रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और सीबीडी ग्राउंड जैसे वैकल्पिक ठिकाने तय करना। रामलीला मैदान पहले से ही बड़ी जनसभाओं और धार्मिक आयोजनों से जुड़ा रहा है, जबकि बाकी प्रस्तावित स्थल सत्ता के केन्द्र से काफी दूर हैं।
इसका व्यावहारिक नतीजा साफ है। दूर-दराज के मैदान में होने वाले प्रदर्शन पर पुलिस व्यवस्था बनाए रखना भले आसान हो, लेकिन सरकार के लिए उसकी अनदेखी करना भी आसान हो जाता है। अगर दस लाख लोग भी मंत्रियों और संवैधानिक संस्थाओं के दफ्तरों से दूर इकट्ठा होते हैं, तो उनकी मौजूदगी से सत्ताधीशों को कोई खास असुविधा नहीं होगी। वे प्रदर्शनकारियों की नजरों से ओझल रहकर अपना सरकारी कामकाज सामान्य रूप से जारी रख सकते हैं।
हालांकि, यह कदम विरोध के बुनियादी मकसद को ही खत्म कर देता है। कोई प्रदर्शन उन लोगों का जमावड़ा नहीं होता जो आपस में वक्त बिताना चाहते हैं। यह असहमति का एक सार्वजनिक ऐलान होता है, जिसका उद्देश्य ध्यान आकर्षित करना और जिम्मेदार लोगों को जवाब देने के लिए बाध्य करना होता है। इसलिए प्रदर्शन का स्थान कोई मामूली प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है; यह उस संदेश का ही एक हिस्सा होता है।
विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था को सरकार अब खत्म करना चाहती है, उसे बनाने में उसने खुद मदद की थी। बोट क्लब से प्रदर्शनों को हटाकर जंतर-मंतर पर सीमित करने के बाद, प्रशासन अब प्रदर्शनकारियों को राजधानी के मुख्य केन्द्र से और दूर धकेलने की तैयारी में है। जो व्यवस्था कभी नियंत्रण योग्य मानी जाती थी, वह अचानक असुविधाजनक हो गई है क्योंकि लोग इसका इस्तेमाल उस स्तर पर गुस्सा जाहिर करने के लिए कर रहे हैं जिसकी सरकार ने उम्मीद नहीं की थी।
साठ से अधिक साल पहले मैंने जिस बुज़ुर्ग प्राकृतिक चिकित्सक को देखा था, उनकी मांग शायद नामुमकिन रही हो। उन्होंने शायद सैकड़ों दिन एक ऐसे मकसद के पीछे गंवाए जिसे कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता था। फिर भी उनके छोटे से तंबू ने सार्वजनिक जीवन में अपनी एक जगह बनाई थी, और वहां से गुजरने वाले लोग उन्हें देखकर यह समझ सकते थे कि वह किसी बात से असंतुष्ट हैं।
यही लोकतंत्र का असली मर्म है। विरोध का अधिकार सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं है जिनकी मांगें समझदारी भरी हों, जिनके तर्क अकाट्य हों या जिनके अभियानों को भारी जनसमर्थन हासिल हो। यह उन लोगों का भी उतना ही अधिकार है जिनके विचारों को हम नापसंद करते हैं, जिनके तर्कों को हम खारिज करते हैं और जिनके अभियानों को हम निरर्थक मानते हैं। यही कारण है कि जंतर-मंतर को एक ऐसी जगह बने रहना चाहिए जहां असहमति की आवाज सुनी जाए, न कि उसे खामोश कर दिया जाए।
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