विचार

कोरोना ने समझाया, विज्ञान भरोसे की चीज है लेकिन आंख मूंदकर मान लेने की जगह नहीं

कोरोना वायरस आज भी एक अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट बना हुआ है। दिसंबर, 2019 में यह फैलना शुरू हुआ और देखते-देखते इसने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया प्रतीकात्मक तस्वीर

कोरोना वायरस आज भी एक अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट बना हुआ है। दिसंबर, 2019 में यह फैलना शुरू हुआ और देखते-देखते इसने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया। जितनी तेजी से वायरस फैला, उससे तेजी से दुष्प्रचार और उससे भी तेजी से फैली अफवाहें। सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहों ने सच को ढक लिया। ऐसे में यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि हमने इन सब से आखिर क्या सीखा।

23 जनवरी, 2020 को चीन ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए पूरे शहर को अन्य इलाकों से पूरी तरह काट दिया। इधर तेजी से बढ़ते वायरस ने जैसे पूरी मानव जाति की समाप्ति की शंका पैदा कर दी। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था और ऐसे में दुनिया ने चीन के मॉडल को अपनाते हुए लॉकडाउन का सहारा लिया और मार्च के अंत तक लगभग पूरी दुनिया लॉकडाउन की स्थिति में आ गई। जिन देशों ने पूर्णबंदी को अमल में लाया, वहां शुरू में वायरस को फैलने से रोकने में जरूर सफलता मिली लेकिन जैसे ही इसमें ढील दी गई, वायरस एक बार फिर तेजी से फैलना शुरू हो गया, यानी हमारे अनुभव से जो पहली सीख मिलती है, वह यह कि लॉकडाउन कुछ काम नहीं करता।

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विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में संक्रमण की पैटर्न को देखने से साफ होता है कि इसका ग्राफ एक निश्चित तरीके से चलता है। भौगोलिक आकार और आबादी के घनत्व से यह तय होता है कि ग्राफ में कब पीक आएगा और कब यह नीचे आने लगेगा। बड़े देशों में यह चक्र लंबा होगा तो छोटे देशों में छोटा। यहां तक कि अपेक्षाकृत ठोस उपाय नहीं करने वाले अमेरिका के भी विभिन्न शहरों और राज्यों में भी चढ़ाव और उतार का वैसा ही पैटर्न रहा जैसा अन्य देशों में। अतः दूसरी सीख यह मिलती है कि एक तय समय चक्र के दौरान संक्रमण अपने शीर्ष पर पहुंचेगा और फिर धीरे-धीरे नीचे आने लगेगा चाहे आप कुछ भी कर लें।

अब हमारे सामने संक्रमण का दूसरा दौर है। हमने देखा कि कुछ देशों में तो इस चरण में पहले की तुलना में ज्यादा तेजी से नए मामले बढ़े। लेकिन राहत की बात यह है कि इस दौर में गंभीर मामलों में कमी आई है और इस कारण मौत का आंकड़ा भी पहले चक्र की तुलना में कहीं कम है। पूरी दुनिया में ऐसा ही देखा जा रहा है। इसकी स्वाभाविक वजह प्रतिरोधक क्षमता का विकसित होना है। भले सामुदायिक प्रतिरोधक क्षमता के सिद्धांत पर तमाम लोग अविश्वास करें लेकिन व्यावहारिक हकीकत इसके पक्ष में है, यानी तीसरी सीख यह है कि संक्रमण को लेकर लोगों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही है।

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ऐसे में जब पूरी दुनिया संक्रमण के आगे बेबस है, वैज्ञानिक और उद्योग लगातार इस कोशिश में जुटे हैं कि इसका या तो इलाज खोजा जाए या फिर वैक्सीन। हड़बड़ी में कई उपाय खोजे गए और मुनाफे की आस में उद्योग दवा को बिना सही तरीके से जांचे-परखे खपाने में जुट गया। इस दिशा में पहला प्रयोग रहा हाइड्रॉक्सीक्लोक्वीन। उसके बाद डॉक्सीसाइक्लीन, रेमडेसिविर, प्लाज्माथेरेपी, आइवरमेक्टिन-जैसी तमाम दवाओं की बारी आई। लेकिन फायदा कुछ नहीं। इस तरह चौथी सीख यह है कि बेहतर है कि बेसब्री को छोड़कर उफान के थमने का इंतजार किया जाए।

लब्बो लुबाब यह है कि विज्ञान सवाल करने, परिकल्पना करने, प्रयोग करने और बिना किसी हित के सबूतों और पारदर्शी तरीके से परिणाम को साझा करते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का नाम है। इसमें हड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं होती। लेकिन दिक्कत यह है कि संगठन से लेकर सरकारों तक ने आधी सच्चाई के आधार पर ही आगे बढ़ने को फैसला किया जो विकास के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। पांचवीं सीख यह है कि विज्ञान भरोसे की चीज है लेकिन इसमें भी आंख मूंदकर मान लेने की कोई जगह नहीं।

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सीखना एक अनवरत प्रक्रिया है, इसमें संदेह नहीं लेकिन कुछ सवालों के जवाब खोजने की कोशिश तो करनी ही चाहिए। सबसे पहला सवाल तो यही है कि आखिर कोरोना वायरस है क्या बला और इससे होता क्या है। चिकित्सा की दुनिया में एक मजाक चल पड़ा है- प्रिगनेन्सी और फ्रैक्चर को छोड़कर कोरोना वायरस से कुछ भी हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा निर्देशों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति संक्रमित पाया जाता है और उसकी मौत हो जाती है तो उस स्थिति में इसे कोरोना वायरस से हुई मौत के तौर पर दर्ज किया जाएगा- चाहे जान किसी भी कारण से गई हो। इसलिए हम कभी नहीं जान पाएंगे कि वायरस के कारण हकीकत में कितने लोगों की मौत हुई।

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बहरहाल, मौत के आंकड़े सही हों या गलत, यह बात जरूर उलझाने वाली है कि आखिर क्यों कुछ भौगोलिक क्षेत्रों में दूसरे की तुलना में प्रकोप ज्यादा रहा। उदाहरण के लिए, अगर हम प्रतिदस लाख व्यक्तियों पर मौत के आंकड़ों को देखें तो अमेरिकी देशों में यह सात सौ से अधिक मिलेगा तो पश्चिमी यूरोप में पांच से सात सौ के बीच और अपेक्षाकृत कम विकसित चिकित्सीय सुविधाओं के बाद भी एशिया में सौ से भी कम। भारत में भी महाराष्ट्र-जैसे राज्य में मौत का आंकड़ा बीमारू राज्यों से कहीं अधिक है। इस सवाल का तर्क संगत जवाब खोजना अभी बाकी है। हर बुरे वक्त की तरह यह भी गुजर जाएगा और तब देशों, सरकारों और विभिन्न समाजों को बैठकर देखना होगा कि कौन-से फैसले अच्छे रहे जिन्हें आगे अपनाया जाए और कौन-से फैसले वैसे रहे जिन्हें हाशिए पर डाल दिया जाए। लेकिन तब भी आखिर हम गलतियों के लिए भला किसे दोषी ठहराएंगे?

इस लेख के लेखक वीके सिन्हा हैं।

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