विचार

गौरक्षा, कंकाल और गणतंत्र

गौरक्षा के नाम पर हिंसा बढ़ी है- उन बीजेपी शासित राज्यों को छोड़कर जहां राजनीतिक हितों के लिए गोमांस खाने की इजाजत है। हिंसा से खौफ का माहौल है। ढुलाई करने वाले मवेशी ले जाने में हिचकते हैं।

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फोटो: Getty Images Debajyoti Chakraborty

भारत की पशु अर्थव्यवस्था गहरे विरोधाभास से ग्रसित है। जो सरकार गाय को पवित्र मानती है, लेकिन पशुओं का व्यापार करने वालों पर होने वाले हिंसक हमलों को रोकने में नाकाम रहती है, वही दुनिया के सबसे बड़े गोमांस निर्यात उद्योगों में से एक को चलने देती है और इसके निर्यात से अरबों कमाती है। सरकार ग्रामीण भारत की रक्षा का दावा करती है, लेकिन किसानों, व्यापारियों, चमड़ा कारखानों, ट्रांसपोर्टरों और चमड़ा श्रमिकों को जोड़ने वाली आर्थिक कड़ी को अस्थिर कर देती है। हाल ही में, ईद-उल-अजहा से ऐन पहले पश्चिम बंगाल में यह विरोधाभास बड़ी स्पष्टता से सामने आया।

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सुवेंदु अधिकारी के पदभार संभालने के फौरन बाद, बंगाल की बीजेपी सरकार ने नियमों को सख्त कर दिया। 14 साल से कम उम्र के मवेशियों की हत्या पर प्रभावी रूप से रोक लगा दी गई, जब तक कि उन्हें प्रजनन या काम के लिए अयोग्य प्रमाणित न कर दिया जाए। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि गाय की बलि देना ईद के अनुष्ठानों का जरूरी हिस्सा नहीं।

उत्पीड़न, जब्ती और सांप्रदायिक रूप से निशाना बनाए जाने के खौफ के बीच, बंगाल के पशु बाजारों की रिपोर्टें बताती हैं कि मुस्लिम पशु व्यापारी और खरीदार बेहद सतर्क हैं। वे न केवल पशुपालकों को अपने पशु को हत्या के लिए बेचने से रोक रहे हैं, बल्कि वे बिक्री करने वालों को मना भी कर रहे हैं। इसके अलावा, हिन्दू पशुपालकों ने कथित तौर पर शिकायत की है कि कम मांग से कीमतें गिर रही हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाएं बाधित हो रही हैं। पश्चिम बंगाल के कुछ पशु बाजारों में खरीदार नहीं। ईद के लिए गायों को पालने-पोसने में पैसा लगाने के बाद, कई किसानों को कर्ज में डूबने का डर है। हिन्दू किसानों और मुस्लिम पशु व्यापारियों की आपसी निर्भरता पर टिकी अर्थव्यवस्था पर स्वयंभू गौरक्षकों के खौफ का साया है। इस बीच, मांस निर्यात का कारोबार खूब फल-फूल रहा है।

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अरबों डॉलर का विरोधाभास

भारत में आधिकारिक तौर पर गोमांस के निर्यात पर रोक है। लेकिन भैंस का मांस जिसे दुनिया भर में ‘कैराबीफ’ के नाम से बेचा जाता है, भारत के सबसे बड़े कृषि निर्यात क्षेत्रों में एक है। एपीडा (कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) के पशु उत्पाद निर्यात डेटाबेस के मुताबिक, भारत ने 2024-25 में 4 अरब डॉलर का 12.5 लाख मीट्रिक टन भैंस मांस निर्यात किया; यह पशु उत्पादों के कुल निर्यात का 80 फीसद है।

हाल ही में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया गया कि भारत में एपीडा रजिस्टर्ड 94 एक्सपोर्ट-ग्रेड बूचड़खाने हैं, जो उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में हैं। बीफ की राजनीति यह छिपा देती है कि हमारी एक्सपोर्ट इंडस्ट्री में ज्यादातर भैंस का मांस होता है, न कि गाय का। इसी अस्पष्टता की वजह से, मवेशियों की ढुलाई पर बने डर के माहौल में भी निर्यात अर्थव्यवस्था फल-फूल रही है।

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पिछले एक दशक में ‘गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा’ अहम सामाजिक घटना बन गई है। पत्रकारों, मानवाधिकार समूहों और शोधकर्ताओं के आंकड़ों से पता चलता है कि गाय से जुड़ी भीड़ हिंसा ज्यादातर 2014 के बाद हुई, जिनमें खास तौर पर मुसलमानों को निशाना बनाया गया। यह साल अहम है। तभी नरेन्द्र मोदी केन्द्र की सत्ता में आए थे। 2017 में, रॉयटर्स ने रिपोर्ट दी थी कि 2010 से 2017 के मध्य तक गाय से जुड़ी हिंसा में 28 लोग मारे गए जिनमें 24 मुसलमान थे। इस हिंसा ने पशुधन अर्थव्यवस्था को बदल दिया।

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टूटी ग्रामीण श्रृंखला

कई पीढ़ियों से, ग्रामीण भारत में एक चक्रीय पशुधन अर्थव्यवस्था थी। किसान बूढ़े या अनुत्पादक पशुओं को व्यापारियों को बेचते और व्यापारी बूचड़खानों और मांस प्रसंस्करणकर्ताओं को पशु आपूर्ति करते। खालें चमड़ा कारखानों में जातीं और हड्डियां, चर्बी वगैरह सहायक उद्योगों तक। बूढ़े पशुओं को बेचने से किसानों को बीज खरीदने, ऋण चुकाने या खराब कृषि मौसम में गुजारा करने की नकदी मिलती थी। गौरक्षा हिंसा ने इस श्रृंखला को बाधित किया जिससे किसान संकट के क्षणों में असुरक्षित हो गए।

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देशभर में गौरक्षा के नाम पर हिंसा बढ़ी है- उन बीजेपी शासित राज्यों को छोड़कर जहां राजनीतिक हितों के लिए गोमांस खाने की इजाजत है। खैर, हिंसा से चक्रीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी है। ढुलाई करने वाले रात में मवेशी नहीं ले जाते। व्यापारी राजमार्गों पर हमलों से डरते हैं। कई राज्यों में किसान बूढ़े मवेशियों को छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें बेचना जोखिम भरा है। नतीजा यह है कि आवारा पशुओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, जो खड़ी फसलों को नष्ट कर रहे हैं, खासकर उत्तर प्रदेश में।

भारत की जानी-मानी पशु वैज्ञानिक डॉ. चंदा निंबकर का तर्क है कि महाराष्ट्र में गोहत्या पर पाबंदी ने पशुधन अर्थव्यवस्था को बिगाड़ दिया। मराठी दैनिक ‘लोकसत्ता’ में लिखे लेख में उन्होंने मवेशियों की बिक्री और हत्या पर लगे प्रतिबंध को हटाने की अपील की। उनका कहना है, ‘यहां तक ​​कि भैंसों का व्यापार करने वालों को भी अब ‘गौरक्षक’ निशाना बना रहे हैं... जिससे छोटे पशुपालकों का सीधा नुकसान है।’

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वह सही कह रही हैं। दो साल पहले, महाराष्ट्र में लगातार हमले झेल रहे कुरैशी व्यापारियों ने राज्य के सभी बड़े बाजारों में मवेशी व्यापार का बहिष्कार किया था। नर बछड़ों और भैंसों की कीमतें गिर गईं, जिससे किसानों में रोष भर गया। बिक्री तभी शुरू हुई जब सरकार ने भरोसा दिया कि व्यापारियों को नुकसान नहीं पहुंचेगा। आज तक, हालात सामान्य नहीं हो पाए। आर्थिक रूप से पिछड़े सूखाग्रस्त इलाकों पर पशु व्यापार में बाधा का सबसे बुरा असर पड़ा है; इसने छोटे किसानों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

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डॉ. निंबकर का तर्क है कि सरकारें भीड़भाड़ वाली गौशालाओं को सब्सिडी देती हैं, जबकि किसानों को उन पशुओं के मामले में आर्थिक आजादी नहीं देतीं जो किसी काम के नहीं रहे। वह कहती हैं कि विडंबना है कि महाराष्ट्र में ‘गौरक्षा’ की जोरदार राजनीति के बावजूद, देसी गायों और बैलों की आबादी लगातार घट रही है; वहीं बकरियों की आबादी- जो ज्यादा आजाद और लचीले बाजार से जुड़ी है- तेजी से बढ़ी है।

सत्ताधारी शासन द्वारा संरक्षित ‘गौरक्षा’ गौ-राजनीति के मूल में छिपे एक बुनियादी विरोधाभास को उजागर करती है: संरक्षण के नाम पर बनाए गए कानून, असल में पशुधन के संरक्षण और ग्रामीण आजीविका, दोनों को कमजोर करते हैं।

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भारत के चमड़ा उद्योग से ज्यादा साफ तरीके से यह विरोधाभास शायद ही कहीं दिखे; यह उद्योग चमड़े के लिए पशु-हत्या से जुड़ी अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। यदि पशु-हत्या, उनके परिवहन और पशु-बाजारों में कोई बाधा आती है, तो चमड़ा क्षेत्र को इसका झटका फौरन महसूस होता है।

1950 में ही केन्द्र सरकार ने राज्यों को चेतावनी दी थी कि जानवरों की हत्या पर पूर्ण रोक से टैनिंग उद्योग और निर्यात को नुकसान होगा। आज वह चेतावनी सच साबित हुई है। भारत का चमड़ा उद्योग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 40-45 लाख लोगों को रोजगार देता है; इनमें बड़ी संख्या में दलित और मुसलमान हैं, जो मुख्य रूप से टैनिंग, चमड़े की प्रोसेसिंग और जूते-चप्पल बनाने के काम में लगे हैं। अनुमानों के मुताबिक, जब घरेलू बाजार के मूल्य और निर्यात को मिला दिया जाए तो यह क्षेत्र सालाना लगभग 5 अरब डॉलर का योगदान देता है। वित्त वर्ष 2024-25 में, चमड़ा उद्योग की निर्यात कमाई 4.8-5.7 अरब डॉलर रही। घरेलू बाजार तो इससे भी बड़ा है। 2025 में, चमड़ा निर्यात परिषद ने अनुमान लगाया कि घरेलू चमड़ा और जूते-चप्पलों का बाजार करीब 19 अरब डॉलर का था। कानपुर, उन्नाव, चेन्नई और कोलकाता में चमड़ा उद्योग के प्रमुख केन्द्र, खाल की आपूर्ति पर निर्भर हैं। बंगाल चमड़ा-प्रसंस्करण के महत्वपूर्ण केंद्रों में एक है; कोलकाता और बंतला में भारत की कुल टैनिंग गतिविधियों का लगभग एक-चौथाई काम होता है। जिस राज्य की औद्योगिक प्रगति पहले ही धीमी हो, वहां के चमड़ा उद्योग को कोई भी चोट जानलेवा हो सकती है।

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जैसे-जैसे हत्या दर गिरी और मवेशियों के परिवहन में जोखिम बढ़ा, घरेलू चमड़े की आपूर्ति घटती गई। आर्थिक तर्क बेहद सरल है: कम बिक्री से किसानों की अर्थव्यवस्था चरमराती है, हत्या में रुकावट से चमड़े की आपूर्ति घटती है, चमड़ा कारखानों का काम धीमा पड़ता है, निर्यात सुस्त होता है और श्रमिकों का रोजगार जाता है।

और सबसे अधिक प्रभावित होने वाले लोग अक्सर वे होते हैं जो पहले से ही हाशिये पर हैं-मुस्लिम व्यापारी, दलित चमड़ा श्रमिक, परिवहनकर्ता और अनौपचारिक मजदूर।

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बीफ अर्थव्यवस्था का मालिक कौन

भारत के भैंस मांस के सबसे बड़े निर्यातक हिन्दू-स्वामित्व वाली कंपनियां हैं; कुछ मुस्लिम चलाते हैं और कुछ मिश्रित कारोबारी परिवार। फिर भी, मवेशियों को लेकर सार्वजनिक चर्चा ने पूरे व्यापार को सांप्रदायिक बना दिया है। अफसोस है कि जहां नारे सांस्कृतिक सुरक्षा की दुहाई देते हैं, वहीं इसका असल नतीजा गरीबों के लिए आर्थिक बिखराव होता है।

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चौराहे पर गणतंत्र

भारत की पशु-अर्थव्यवस्था में हमेशा से धर्म, जाति, आजीविका, खेती और व्यापार का पेचीदा ताना-बाना रहा है। लेकिन मोदी सरकार के दौर में, यह राष्ट्रवाद का अखाड़ा भी बन गया।

वही राज्य जो निर्यात-उन्मुख भैंस के मांस के उत्पादन को बढ़ावा देता है-क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा मिलती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा- वही राज्य इस अर्थव्यवस्था को चलाने वालों को अपराधी करार दे रहा है। इसका बोझ उस किसान पर पड़ता है, जिसे अनुपयोगी जानवर को पालना पड़ता है; उस ट्रांसपोर्टर पर पड़ता है जिसे हाईवे पर रोका जाता है; चमड़ा-कारखाने के उस मजदूर पर पड़ता है जिसके पास कच्ची खाल नहीं होती; उस पशु-व्यापारी पर पड़ता है जो डर के मारे बाजार छोड़ देता है; और आपसी सहयोग से बंधे उन समुदायों पर पड़ता है जो एक-दूसरे पर अविश्वास करना सीख रहे हैं।

भारतीय राजनीति में गाय भले ही पवित्र बनी रहे, लेकिन इसके इर्द-गिर्द की अर्थव्यवस्था अपवित्र है। यह पहले से कहीं ज्यादा नाज़ुक और कहीं ज्यादा सांप्रदायिक हो चुकी है।

(जयदीप हार्दिकर नागपुर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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