
‘आधार’ के आधार पर अदालत तक में उठे तमाम शोरगुल में तरह-तरह की आशंकाएं जताई गईं। याचिकाकर्ता ने डाटा की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए और इसे निजता का उल्लंघन भी करार दिया। लेकिन यूआईडीएआई ने इसके बचाव में सारे घोड़े खोल दिए। बहरहाल, मुद्दा समाज के लिए अहम था, इसलिए इसे एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में सामने रखने की जरूरत महसूस करते हुए इंस्टीट्यूटऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद में अर्थशास्त्र और पब्लिक सिस्टम ग्रुप में एसोसिएट प्रोफेसर<b> </b>रीतिका खेड़ा ने तमाम विशेषज्ञों के लेखों को एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया। यह पुस्तक बताती है कि निजी संवेदनशील सूचनाओं के साथ कैसा खिलवाड़ किया जा रहा है। हम इस पुस्तक के चंद लेखों के संपादित अंश आपके सामने रख रहे हैं। आज की कड़ी में पेश है रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता <b>ज्यां द्रेज</b> का लेख:
आधार को ‘सर्वव्यापी’ बनाने का इरादा था, जैसा कि यूआईडीएआई के पूर्व अध्यक्ष नंदन नीलेकणी स्वयं इस बात को कहते रहे हैं। यह समस्याओं से भरा क्यों है? बायोमीट्रिक्स की अविश्वसनीयता से लेकर गोपनीयता के संभावित उल्लंघनों तक, विभिन्न चिंताजनक मुद्दे उठाए गए हैं। परंतु मुख्य संकट यह है कि आधार व्यापक जन निगरानी का द्वार खोल देता है। अधिकतर ‘आधार-सक्षम’ डाटाबेस, सरकार के लिए सुलभ होंगे, इसके लिए सरकार को अधिनियम के तहत उपलब्ध विशेष शक्तियों को भी लागू करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
कहीं भी और किसी पर भी नजर रखना खुफिया संस्थाओं के लिए बच्चों का खेल होगा- हम कहां रहते हैं, कब हम चलते हैं, हम किन कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, हम किससे शादी करते हैं या मिलते हैं या फोन पर बातें करते हैं- हर गतिविधि पर निगरानी रखी जा सकेगी। किसी भी अन्य देश ने, और निश्चित रूप से किसी भी लोकतांत्रिक देश ने, कभी भी अपने नागरिकों को निगरानी की ऐसी शक्तिशाली अवसंरचना का बंधक नहीं बनाया है।
यदि यह पागलपन की तरह लगता है, तो एक बार फिर से सोचें। जैसा कि हम एडवर्ड स्नोडेन और अन्य अंदरूनी लोगों के हवाले से जानते हैं, हर जगह, हर तरह से निगरानी खुफिया संस्थाओं का सपना होता है। हाल के वर्षों में, अपने सभी विरोधियों पर निगरानी और नियंत्रण रखने का भारत सरकार का रुझान खुलकर सामने आया है। निजता का अधिकार, विरोध की स्वतंत्रता की एक अनिवार्य आधारशिला है।
बड़े पैमाने पर निगरानी, नागरिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के ऐतिहासिक विस्तार के रुक जाने का खतरा उत्पन्न करती है। जिन स्वतंत्रताओं का आनंद आज हम बिना सोचे लेते हैं और उनका मूल्य नहीं समझते हैं, उन्हें पाने के लिए लंबा और कठोर संघर्ष करना पड़ा- जैसे हम चाहें वैसे ही घूमने की स्वतंत्रता, जिससे चाहें उसके साथ जुडें, बिना किसी भय के बोलें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये स्वतंत्रताएं अभी भी जनसंख्या के बड़े हिस्से, विशेष रूप से दलितों और सुरक्षाबलों के अधीन रहने वालों के लिए दूर का सपना होंगी। किंतु यह हमारे पास पहले से जो स्वतंत्रताएं हैं, उनके विस्तार का मामला है, प्रतिबंध का नहीं।
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यूआईडीएआई, अपने गठन के आठ साल बाद भी, इससे हुए नुकसान की तुलना में इसके अधिक फायदे बताने में नाकाम रहा है। मेरी जानकारी से तो, अभी तक आधार के किसी भी एप्लीकेशन का गंभीर मूल्यांकन नहीं हुआ है। और इससे भी बुरी बात यह है कि, कुछ विफल प्रयोगों को केवल प्रोपेगेंडा और प्रचार के माध्यम से सफलताओं के रूप में प्रदर्शित किया गया है- झारखंड के रातू में बिजनेस कोरेसपॉडेंट्स और राजस्थान के कोटकासिम में केरोसिन सब्सिडी का ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ तो दो उदाहरण मात्र हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि आधार के, अगर न्याचोचित हों, तो कुछ उपयोगी एप्लीकेशन हो सकते हैं। हालांकि, जोखिमों को देखते हुए, मूल सिद्धांत ‘न्यूनतम उपयोग, अधिकतम सुरक्षा उपाय’ होना चाहिए। सरकार ने इसके उलट अपनी प्राथमिकता दर्शाई है- अधिकतम उपयोग, न्यूनतम सुरक्षा उपाय। आधार अधिनियम में कुछ उपयोगी सुरक्षा उपाय शामिल हैं, परंतु वे आधार के उपयोग को सीमित करने अथवा जन निगरानी के उपकरण के रूप में इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ भी नहीं करते हैं। और तो और, सुरक्षा उपाय जनता से ज्यादा यूआईडीएआई की ही सुरक्षा करते हैं।
आधार का स्वागत, तो निजता अलविदा
इन मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय और भारत सरकार के बीच की खींचतान समाप्त होते नहीं दिखती है। 24 अगस्त, 2017 को, सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से इस बात की अभिपुष्टि की है कि निजता एक मौलिक अधिकार है। जाहिर है कि, इस आदेश से आधार का जनसंपर्क तंत्र डैमेज कंट्रोल में व्यस्त हो गया। वर्षों तक निजता के अधिकार को मानने से इनकार करने के बाद, सरकार ने तुरंत पाला बदल दिया और फैसले का स्वागत किया।
यूआईडीएआई के सीईओ अजय भूषण पांडे ने अचानक से कहा कि ‘आधार अधिनियम इस तथ्य पर आधारित है कि निजता एक मौलिक अधिकार है।’ उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय का निर्णय आधार को प्रभावित नहीं करेगा क्योंकि आवश्यक सुरक्षा उपाय पहले से ही लागू थे। सच्चाई यह है कि आधार, अपने वर्तमान स्वरूप में, निजता के मौलिक अधिकार के लिए एक बड़ा खतरा है।
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आम समझ यह है कि आधार के साथ निजता संबंधी मुख्य चिंता सेंट्रल आइडेंटिटिज डाटा रिपोजिटरी (सीआईडीआर) की गोपनीयता है। यह तो हाथी की पूंछ मात्र है। उसके तर्क से, अगर आधार को सिम कार्ड के लिए अनिवार्य कर दिया जाता है, तो सरकार की आपके जीवन भर के कॉल विवरण तक पहुंच होगी। आधार वस्तुत: बिना किसी प्रतिबंध के, सरकार को इन सभी व्यक्तिगत सूचनाओं को एकत्रित करने में सक्षम बनाता है।
इस प्रकार, आधार व्यक्तिगत सूचना की माइनिंग संबंधी एक अभूतपूर्व हथियार है। आधार अधिनियम में ऐसा कुछ भी नहीं है जो सरकार को विभिन्न डाटाबेस को जोड़ने या उन डाटाबेस से व्यक्तिगत जानकारी निकालने के लिए आधार का उपयोग करने से रोकता हो। दरअसल, कई राज्य सरकारें (केंद्र सरकार से अलग) राज्य निवासी डाटा हब (एसआरडीएच) परियोजना के तहत पहले से ही इस कार्य में लगी हैं, जो एसआरडीएच वेबसाइटों के अनुसार ‘सभी विभागीय डाटाबेस को एकीकृत करता है और उन्हें आधार क्रमांक से जोड़ता है । मध्य प्रदेश की वेबसाइट और इससे आगे बढ़ते हुए एसआरडीएच को ‘संपूर्ण राज्य के लिए सत्य का एकमात्र स्रोत’ के रूप में प्रस्तुत करती है- इससे कम कुछ नहीं। राज्य निगरानी का द्वारा पूर्ण रूप से खुला है।
लेकिन प्राइवेट एजेंसियों का क्या? विभिन्न डाटाबेस तक उनकी पहुंच अधिक प्रतिबंधित है, लेकिन उनमें से कुछ के पास उनके स्वयं के डाटाबेस के माध्यम से काफी बड़ी मात्रा में व्यक्तिगत सूचना तक पहुंच है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं- रिलायंस जियो के पास 10 करोड़ भारतीयों की पहचान सूचना है, जो सीआईडीआर के माध्यम से उस समय प्राप्त की गई जब लोगों ने खुद को जियो सिम कार्ड खरीदने के लिए सत्यापित किया।
यह डाटाबेस, जियो एप्लीकेशंस (फोन कॉल्स, संदेश, मनोरंजन, ऑनलाइन खरीदारी और अन्य) के रिकॉर्ड के साथ जोड़े जाने पर एक संभावित सोने की खदान होगी- जो ‘बिग डाटा’ विश्लेषकों के लिए एक सपना है। यह पूर्णतया स्पष्ट नहीं है कि इस डाटाबेस के उपयोग पर, व्यवहार में, आधार अधिनियम किन प्रतिबंधों को लगाता है।
संक्षेप में, निजता एक मौलिक अधिकार है पर ‘आधारित’ होने से उलट, आधार निजता के अधिकार का विरोधी है। कदाचित, आगे सुरक्षा उपाय किए जा सकते हैं, लेकिन व्यक्तिगत सूचना की माइनिंग के लिए एक उपकरण के रूप में आधार की मौलिक शक्ति के कारण इसे रोकना कठिन है। निजता के अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के आलोक में आधार की बुनियाद पर पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता है।
(लेखक रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर)
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