
इन दिनों विभिन्न वजहों से स्वयंसेवी संस्थाएं (एनजीओ) खबरों में हैं। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री और आरएसएस प्रचारक नरेन्द्र मोदी ने दावा किया था कि आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि यह एनजीओ अपंजीकृत है जो सिर्फ सांस्कृतिक गतिविधियां करता है। इस मुद्दे पर कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खड़गे ने कहा कि आरएसएस को अपना पंजीकरण करवाना चाहिए। आरएसएस ने इससे इंकार करते हुए दावा किया कि वह केवल व्यक्तियों का एक समूह है। यह दावा मान भी लिया जाए तो उसे मिलने वाले भारी-भरकम चंदे के बारे में उसकी क्या सफाई है?
एक अलग घटनाक्रम संसद में हुआ। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने नए एफसीआरए अर्थात विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम को लागू करने की घोषणा की है जिसमें विदेशों से धन प्राप्त करने वाले एनजीओ की गतिविधियों पर रोक लगाए जाने का प्रावधान है। सत्ताधारी दल का मानना यह है कि ईसाई एनजीओ द्वारा धर्मपरिवर्तन करवाया जा रहा है। उनका मानना यह है कि इन एनजीओ द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं उपलब्ध करवाना धर्मपरिवर्तन के लिए लोगों को लालच देना है। उनकी नजर में ईसाई एनजीओ द्वारा जबरिया धर्मपरिवर्तन भी करवाया जाता है। यह दावा किस हद तक सच है? वैसे हमारे संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को अपने धर्म को अबाध रूप से मानने, पालन करने और उसका प्रचार करने का मूलभूत अधिकार देता है।
सत्ताधारी यह दावा करते हैं कि यह अनुच्छेद हमें अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने का अधिकार तो देता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति का धर्मपरिवर्तन करवाने का अधिकार नहीं देता। हिंदू राष्ट्रवादियों की समझ यह है कि मिशनरियां लालच और जबरदस्ती का सहारा लेती हैं। वे यह मानते हैं कि जो लोग धर्मपरिवर्तन करते हैं उसमें उनकी कोई भूमिका होती ही नहीं है। ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया गया है जिससे हमें पता लग सके कि ईसाई मिशनरी स्कूलों में पढ़े कितने लोग ईसाई बन गए। यह जानकारी देने वाले आंकड़ें भी उपलब्ध नहीं हैं कि कितने दलित और आदिवासी लालच या बलप्रयोग की वजह से धर्मपरिवर्तन कर ईसाई बने।
भारत में ईसाई धर्म बहुत लंबे समय से मौजूद है। भारत में इसका आगमन सन् 52 में सेंट थामस के साथ हुआ। उन्होंने गिरजाघरों का निर्माण करवाया और कई स्थानीय लोगों ने इस धर्म को अपनाया। यदि हम आंकड़ों को देखें तो हमें पता लगता है कि भारत में ईसाई धर्म का विस्तार काफी धीमी रफ्तार से हुआ है। पिछली जनगणना (2011) के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्या में ईसाईयों का प्रतिशत केवल 2.30 था। जिस दौर में जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाए जाने के आरोप बार-बार लगाए गए, उस दौर के जनगणना के आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं। जनसंख्या में ईसाईयों का प्रतिशत 1971 में 2.60 था जो लगातार घटता गया और 1981 में 2.44 प्रतिशत, 1991 में 2.34 प्रतिशत, 2001 में 2.30 प्रतिशत और 2011 में भी 2.30 प्रतिशत ही रहा।
इन आंकड़ों के बावजूद बलपूर्वक या लालच देकर धर्मपरिवर्तन करवाने का प्रोपेगेंडा जमकर चलता रहा। इसके कारण भयावह हिंसा हुई। सबसे खौफनाक हिंसा क्योंझर, मनोहरपुर, ओडिशा में 1999 में हुई जब पास्टर ग्राहम स्टेन्स को उनके दो मासूम लड़कों के साथ जिंदा जला दिया गया। लोगों को भड़काने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बजरंग दल के दारा सिंह उर्फ राजेन्द्र सिंह पाल की थी, जो आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है। इस भयावह हत्या को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने बर्बर कार्य की संज्ञा दी थी जो ‘दुनिया में हुई कलुषित घटनाओं में से एक‘ थी। इस घटना की जांच के लिए वाधवा आयोग की नियुक्ति की गई। आयोग ने पाया कि ‘‘पास्टर धर्मपरिवर्तन का काम नहीं कर रहे थे बल्कि वे कुष्ठ रोगियों की सेवा में जुटे हुए थे‘‘।
आयोग की रपट के बारे में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उसने पाया कि इलाके में ईसाईयों की संख्या में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हुई थी। रपट के मुताबिक ‘‘क्योंझर जिले की कुल जनसंख्या 15.30 लाख थी। इनमें से 14.93 लाख हिंदू थे, ईसाई, जिनमें से ज्यादातर आदिवासी थे, केवल 4,707 थे। 1991 की जनगणना के अनुसार उस समय ही जिले में ईसाईयों की संख्या 4,112 थी। इस प्रकार ईसाईयों की जनसंख्या में केवल 595 की बढ़ोत्तरी हुई‘‘। यह कोई बड़ी वृद्धि नहीं है।
इसके बाद डांग (गुजरात) और कंधमाल (ओडिसा) में गतिविधियां तेजी से बढ़ीं। स्वामी असीमानंद और स्वामी लक्ष्मणानंद सहित विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े कई लोगों ने इन क्षेत्रों में अपने आश्रम स्थापित किए। इन इलाकों में बहुत हिंसा हुई, जिसकी पराकाष्ठा थी 2008 की कंधमाल हिंसा। अब इस प्रोपेगेंडा की ही वजह से दूरदराज के इलाकों में कार्य कर रहे ईसाई मिशनरियों को छुटपुट हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी ओर ज्यादा ध्यान नहीं जाता। प्रार्थना सभाओं को धर्मपरिवर्तन का औजार बताया जाता है और उन पर हमले होते हैं।
बीजेपी/आरएसएस के एक प्रमुख विचारक राम माधव ने अपने एक लेख में नए एफसीआरए के माध्यम से किए जाने वाले बदलावों का समर्थन किया और याद दिलाया कि नियोगी समिति पहले ही मिशनरियों पर पाबंदियां लगाने के पक्ष में राय दे चुकी है। नेहरू सरकार ने उसकी अनुशंसाओं पर अमल न करने का फैसला किया था। इसके बाद माधव यह जोड़ते हैं अब मोदी उन्हीं सिफारिशों पर अमल कर रहे हैं (इंडियन एक्सप्रेस 17 जून 2026)। आखिर नियोगी समिति ने क्या सिफारिशें कीं थीं?
नियोगी समिति, जिसने सन् 1956 में ईसाई मिशनरियों के क्रियाकलापों पर रपट दी थी, ने भारत में धर्मांतरण के विवादास्पद मुद्दे की जांच की थी। समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि धर्मांतरण मुख्यतः शिक्षा और चिकित्सा संबंधी प्रलोभनों के जरिए किया जा रहा था और यह चेतावनी दी थी कि विदेशी मिशनरियों का लक्ष्य भारत में एक अलग ईसाई राष्ट्र बनाने का है।
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने नियोगी समिति की सिफारिशों को खारिज कर दिया था क्योंकि उसके द्वारा प्रस्तावित प्रतिबंध हाल में लागू हुए संविधान के प्रावधानों के विपरीत थे, विशेषकर धर्म का प्रचार करने के मूलभूत अधिकार के संदर्भ में। नेहरू ने रपट में की गई सिफारिशों को धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा माना था।
माधव का दावा है कि गांधी धर्मांतरण के खिलाफ थे। यह सच है, लेकिन वे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं थे। अब धार्मिक स्वतंत्रता को ही धर्मांतरण के रूप में प्रस्तुत और प्रचारित किया जा रहा है। गांधीजी ने जो कहा वह धर्म को मानने और उसका पालन करने के अधिकार के खिलाफ कतई नहीं था। दिनांक 22 मार्च 1931 को दिए गए एक साक्षात्कार (द हिन्दू) में गांधीजी ने जाहिर तौर पर कहा कि यदि स्वतंत्र भारत में मिशनरी चिकित्सा सहायता और शिक्षा आदि के माध्यम से धर्मांतरण जारी रखेंगे तो मैं निश्चित ही उनसे हट जाने को कहूंगा। हर देश का धर्म किसी दूसरे देश के धर्म जितना ही अच्छा है। निश्चित ही भारत के धर्म उसमें रहने वालों के लिए पर्याप्त हैं। हमें आध्यात्मिक दृष्टि से धर्मपरिवर्तन करने की जरूरत बिल्कुल नहीं है।‘‘
यह उनके उद्धरण का पहला हिस्सा है। इसके बाद की पंक्तियों में एकदम विपरीत विचार व्यक्त किए गए हैं - जो गांधीजी का वास्तविक नजरिया दर्शाते हैं। गांधीजी आगे लिखते हैं ‘‘ये बातें संवाददाता ने मेरे मुंह में ठूसीं... मैं इतना ही कहूंगा कि यह जो मैं जो हमेशा कहता रहा हूं और मानता रहा हूं, उसके खिलाफ है‘‘।
वे आगे अपना नजरिया और स्पष्ट करते हैं ‘‘मैं धर्मांतरण के खिलाफ नहीं हूं... हर देश अपने धर्म को अन्य देशों के धर्मों जितना ही उत्तम मानता है। निश्चित ही भारत की जनता द्वारा माने जाने वाले धर्म उसके लिए पर्याप्त हैं...। इसके बाद वे भारत के धर्मों के नाम लेते हैं, ‘‘ईसाई और यहूदी धर्म के अलावा, हिन्दू धर्म और उससे निकले धर्म, इस्लाम और पारसी धर्म भारत के जीवित धर्म हैं‘‘ (गांधीज कलेक्टिड वर्क्स, खंड 46 पृष्ठ 27-28)।
माधव जैसों की नजर में ईसाई धर्म एक विदेशी धर्म है, जिसे बलप्रयोग और लालच के जरिए फैलाया गया है। यह उनकी समझ में मूलभूत कमी है।
(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)
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