विचार

अपने गठन से ही संघ मानता रहा कि हिन्दुओं को संगठित करने के हिंदुत्ववादी प्रोजेक्ट में बाधा हैं महात्मा गांधी

गांधी जी के खिलाफ संघ का घृणा अभियान उतना ही पुराना है जितना इसका गठन। संघ के संस्थापक हेडगेवार ने हिन्दुत्ववादी वी डी सावरकर से मुलाकात के बाद महसूस किया कि हिन्दुओं को संगठित करने के हिन्दुत्ववादी प्रोजेक्ट में गांधी जी सबसे बड़ी बाधा हैं।

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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरएसएस के लोगों ने जो लोगों ने जो जहर फैलाया हुआ था, गांधी जी की हत्या उसकी वजह से हुई। देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने 11 नवंबर, 1948 को एम एस गोलवलकर (उस समय के आरएसएस के मुखिया) को खत लिखा था। इसमें विभाजन के दौरान आरएसएस के हिंसा में शामिल होने की चर्चा करने के बाद सरदार बहुत स्पष्ट शब्दों में गोलवलकर को बताते हैं कि आरएसएस ने कांग्रेस का विरोध ‘इस कठोरता से किया कि न व्यक्तित्व का खयाल, न सभ्यता व विशिष्टता का ध्यान रखा, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी थी। इनकी सारी तकरीरें सांप्रदायिक विष से भरी थीं। हिन्दुओं में जोश पैदा करना और उनकी रक्षा के प्रबंध करने के लिए यह आवश्यक न था कि यह जहर फैले। उस जहर का फल अंत में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहनी पड़ी और सरकार और जनता की सहानुभूति जरा भी आरएसएस के साथ न रही बल्कि उनके खिलाफ हो गई। उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया था और मिठाई बांटी, उससे यह विरोध और भी बढ़ गया और सरकार को इस हालत में आरएसएस के खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी ही था।’

उससे पहले, 18 जुलाई, 1948 को हिन्दू महासभा के प्रमुख नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे पत्र में भी हिन्दू महासभा के साथ- साथ आरएसएस को भी महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए सरदार पटेल ने लिखा था, ‘जहां तक आरएसएस और हिन्दू महासभा की बात है, गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है और मुझे इसमें इन दोनों संगठनों की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए लेकिन हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर कांड संभव हो सका।’

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गांधी जी के खिलाफ आरएसएस का घृणा अभियान उतना ही पुराना है जितना आरएसएस का गठन। आरएसएस के संस्थापक डॉ. के बी हेडगेवार कांग्रेस के नेता थे लेकिन 1925 में कांग्रेस से अलग हो गए। हिन्दुत्ववादी वी डी सावरकर से मुलाकात के बाद उन्होंने महसूस किया कि हिन्दुओं को संगठित करने के हिन्दुत्ववादी प्रोजेक्ट में गांधी जी सबसे बड़ी बाधा हैं। हेडगेवार ने कांग्रेस इसलिए छोड़ी क्योंकि गांधी जी हिन्दुओं और मुसलमानों को सांझी राष्ट्र मानते थे। दरअसल, हेडगेवार को गांधी जी से इसी मुद्दे को लेकर बेइंतहा नफरत थी। इसी नफरत की वजह से हेडगेवार ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ आरएसएस शुरू की थी। आरएसएस के एक प्रकाशन के मुताबिक, गांधी के हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए अभियान से डॉक्टर हेडगेवार खतरा महसूस करते थे। आरएसएस का एकअन्य प्रकाशन कहता है कि हेडगेवार के कांग्रेस से अलग होने और आरएसएस के गठन का प्रमुख कारण था कि कांग्रेस हिन्दू-मुस्लिम एकता में विश्वास करती है। आरएसएस ने अपना अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गनाइजर जुलाई, 1947 में शुरू किया और 30 जनवरी, 1948 को गांधी जी की हत्या तक उसमें गांधी के खिलाफ घृणास्पद सामग्री प्रकाशित की जाती रही।

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6 दिसंबर, 1947 को गोलवलकर ने आरएसएस कार्यकर्ताओं की एक बैठक गोवर्धन (मथुरा) में बुलाई। इस बैठक की खुफिया विभाग की रिपोर्ट राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद है। इसके दो दिन बाद दिल्ली के रोहतक रोड कैंप में हजारों की तादाद में उपस्थित स्वयंसेवकों की भीड़ को संबोधित किया। पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक, आरएसएस नेता ने कहा कि अगर कोई हमारे रास्ते में आएगा, तो उसे समाप्त कर दिया जाएगा- चाहे वह नेहरू सरकार हो या कोई अन्य सरकार। मुसलमानों के बारे में कहा कि धरती पर कोई ताकत नहीं जो उन्हें हिन्दुस्तान में रख सके। उन्हें इस देश को छोड़ देना चाहिए। अगर मुसलमानों को इस देश में रखा जाता है, जो गांधी जी और नेहरू जी कह रहे हैं, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी भारत सरकार की होगी और अगर कुछ भी होगा, तो उसकी जिम्मेदारी हिन्दू कम्युनिटी की नहीं होगी। महात्मा गांधी को हिन्दुओं को भ्रमित करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। गोलवलकर ने बहुत साफ़ शब्दों में कहा ‘वी हैव द मीन्स ह्वेयरबाई (आवर) अपोनेन्ट्स कुड बी इमेडिएट्ली साइलेन्स्ड’, यानी ‘हमारे पास ऐसे साधन उपलब्ध हैं जिनके द्वारा हमारे विरोधियों को तुरंत खामोश किया जा सकता है।’ इसके छह सप्ताह बाद गांधी जी की हत्या कर दी गई।

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आरएसएस के गांधी जी के ख़िलाफ़ भीषण घृणा अभियान ने गांधी जी की हत्या तो कराई ही, आरएसएस अभी भी घृणा अभियान चलाता रहता है। गांधी जी के हत्यारों को देशभक्त बताया जाता है, कहा जाता है कि इनको देश के सबसे बड़े सम्मान दिए जाएं, उनकी मूर्ति लगाई जाए। छत्तीसगढ़ में 2018 में अपने भाषण में अमित शाह ने गांधी जी को ‘चतुर बनिया’ कहा था। शाह ने गांधी जी को देश का नेता नहीं मानकर, हिन्दुओं का भी नेता नहीं मानकर, उनके लिए जिन्ना के शब्दों का इस्तेमाल किया। इसके अलावा एक प्रमुख हिन्दुत्ववादी संगठन- हिन्दू जनजागृति समिति भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना’ के लिए नियमित रूप से राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करती है। इससे संबंधित ‘सनातन संस्था’ के सदस्य अनेक आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं। मुसलमान बहुल क्षेत्रों और उनके धार्मिक स्थलों में बम विस्फोट की घटनाओं के अलावा गोविंद पानसरे, नारायण दाभोलकर, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश-जैसे प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों की हत्या के आरोपों में भी यह जांच के दायरे में है।

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हिन्दू जनजागृति समिति का गोवा सम्मेलन (7 जून, 2013) गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के शुभकामना संदेश के साथ शुरू हुआ था। इसमें भारत को हिन्दू राष्ट्र में बदलने की अपनी परियोजना की सफलता की कामना की गई थी। इंसानियत की तमाम हदें पार करते हुए इसी मंच से 10 जून को हिन्दुत्ववादी संगठनों, विशेष कर आरएसएस के करीबी लेखक केवी सीतारमैया का भाषण हुआ। उन्होंने आरंभ में ही घोषणा की, ‘गांधी भयानक दुष्कर्मी और सर्वाधिक पापी था’। उन्होंने अपने भाषण का अंत गांधी जी के कातिल गोडसे का महिमामंडन करते हुए इन शर्मनाक शब्दों से किया: ‘जैसा भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, दुष्टों के विनाश के लिए, अच्छों की रक्षा के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में पैदा होता हूं। 30 जनवरी की शाम श्रीराम नाथूराम गोडसे के रूप में आए और गांधी का जीवन समाप्त कर दिया।’ इस भाषण की रिपोर्ट हिंदू जनजागृति समिति की वेबसाइट से हटा दी गर्इ है लेकिन यह अमेरिका की एक वेबसाइट ‘फ़ोरम फ़ॉर हिन्दू अवेकनिंग’ (हिन्दू जागृति के लिए एकमंच) पर उपलब्ध है। इसी तरह, भाजपा आईटी प्रकोष्ठ, इंदौर के प्रभारी विक्की मित्तल ने मांग की है कि यह तय करने के लिए कि गांधी और गोडसे में से कौन अधिक लोकप्रिय है, गोडसे की पिस्तौल की नीलामी की जाए। पता चल जाएगा कि गोडसे आतंकवादी था या देशभक्त? प्रधानमंत्री मोदी तक इस व्यक्ति को फ़ेसबुकपर फॉलो करते हैं। इस सबके बाद भी अगर कोई यह समझता है कि यह सब कुछ आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की जानकारी के बिना हो रहा है, तो वह भारी भूल में है।

(राम शिरोमणि शुक्ल से बातचीत पर आधारित)

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