विचार

ट्रांसजेंडर कानून नालसा मामले के न्यायिक फैसले को करता है धराशायी, क्या खतरे में हैं मौलिक अधिकार?

नए लैंगिक कानूनों को लेकर बहस तेज हो गई है, जहां सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर और लैंगिक पहचान से जुड़े अधिकारों पर नियंत्रण के आरोप लग रहे हैं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं।

ट्रांसजेंडर कानून नालसा मामले के न्यायिक फैसले को धराशायी करता है।
ट्रांसजेंडर कानून नालसा मामले के न्यायिक फैसले को धराशायी करता है। 

राज्य  ही अब लैंगिक पहचान और यौन उन्मुखीकरण भी तय करेगी। दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र में ट्रांसजेंडर के हक को वैधानिक तौर पर कुचलने की तैयारी जारी है। 2026 में करीब बाईस कानून अमेरिका में पारित हुए जो ट्रांसजेंडर विरोधी हैं। भारत में आनन-फानन बिना व्यापक चर्चा के संसद में वह पारित हो गया। गोयाकि अनेक विपक्षी दलों ने बहिर्गमन किया, विधेयक पर विरोध दर्ज कराया।

आखिर सरकार इतनी जल्दी में क्यों है? लैंगिक अल्पसंख्या की इतनी चिंता क्यों?

वैश्विक अस्थिरता, युद्ध के बीच अन्य दीगर विषयों के बजाय इस पर सदन गुंजायमान रहा। जबकि लाखों भारतीय मूल के लोग मध्य एशियाई युद्ध के कारण असुरक्षा से गुजर रहे हैं, अपने मुल्क में रसोई गैस की किल्लत मुंह बाए खड़ी है, तब संसद में तमाम कूटनीतिक चर्चाओं को छोड़ इस विधेयक की गरज कैसे आन पड़ी!

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अमेरिका में भी इन दिनों पूर्वगामी शक्तियां हावी है। मगर लंबे लोकतांत्रिक चैतन्य के कारण न्यायपालिका, प्रशासन, मीडिया की आवाज अभी जमींदोज नहीं हुई है, हालांकि एप्सटीन फाइल्स ने वीभत्स स्वरूप को उजागर किया है। क्या कूटनीतिक विजय के लिए बाल यौन शोषण नया माध्यम है? वह भी तथाकथित सबसे बड़े समृद्ध मुल्क में इसका होना क्या दर्शाता है? इधर बच्चे यौन उत्पीड़न का शिकार हुए, उधर दो मुल्कों की अधिनायकीय हवस में एक सौ सत्तर से अधिक मासूम बच्चियां हमेशा के लिए चली गईं। 

यह सब यूं ही नहीं हो रहा। कोई इत्तिफाक नही है। दक्षिणपंथी वर्चस्ववादी ताकतें अपने दबदबे को कायम रखने हेतु सदैव से पितृसत्ता को वाहक बनाती रही हैं। आखिर यौनिक कब्जे से ही तो वंश परम्परा बरकरार रहेगी। यह मातृभूमि नहीं, पितृभूमि का बीजारोपण है।

पशुजगत में हर कुनबे के पास हरम होता है। उसकी मादा पर नियंत्रण के लिए भयंकर युद्ध होता है। पर पशु-पक्षी संसार में मादा को लुभाया भी जाता है। नर आकर्षक होते हैं। पशु संसार में समलैंगिकता पर अधिक शोध मौजूद नहीं। शायद इसलिए कि वे अल्प वयी हैं। प्रजनन की ज्यादा आजादी है, लैगिंकता जैसा सामाजिक बंधन मौजूद नहीं। यौनिक अभिव्यक्ति बेहद सरल और नैसर्गिक है।

इसके ठीक विपरीत मानव समाज ने कृषि की शुरुआत के बाद से जर, जमीन और जोरू को समतुल्य रखा, ताकि यौनिक रखवाली हो सके। स्त्री की कोख क्षेत्र या प्राकृत में खेत कहलाने लगी। ऐसी स्थिति में खेत की मर्जी का क्या मायना? मायने तो मालिकाना आधिपत्य के है।

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यह नवीन पूर्वगामी विधेयक वैश्विक अधिनायकीय संघर्ष के बीच लैंगिग अधिनायकत्व को संस्थापित करने की कवायद है। आखिर व्यक्ति होता कौन है अपनी लैगिंग पसन्द तय करने वाला! वह तो व्यवस्था करेगी। वही व्यवस्था जो कहती है कि वह शिक्षा नहीं दे सकती, स्वास्थ सेवा देना नामुमकिन है। सड़क बनाना, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था करना, रोजगार देना सरकार का काम नहीं। पीने का पानी मुहैया कराना कि सबसे साफ शहर में मासूम अपनी जान न गवां बैठे, निकासी की व्यवस्था करना असम्भव बताती है। वह हर व्यक्ति की यौनिक उन्मुखीकरण को स्वयं तय करेगी। 

पिछले दिनों ऐसा ही कानून सत्तारूढ़ दल की राज्य सरकारों ने विवाह के सम्बंध में बनाया है जहां प्रेम विवाह में अभिभावकों की रजामंदी जरूरी करार कर दी गई है। क्या बालिग होने के बाद अपना जीवन साथी चुनना हक नहीं? लव जिहाद की आड़ में यह स्त्री की यौनिकता पर कब्जा है। यह मात्र मजहबी मुद्दा नहीं है, यह जात से भी जुड़ा है। स्त्री पर पहरा बिठाने की नीयत है। इसी सोच ने वैवाहिक बलात्कार को खारिज किया। संस्कार और संस्कृति का हवाला दिया गया। यही सोच सवाल करती रही हैं कि समलैंगिक विवाह कैसे हो सकता है? क्योंकि इसमें पति या अधिकारी कौन होगा। विवाह में जीवन साथी की शब्दावली से इस सोच को गुरेज है।

अब ट्रांसजेंडर विधेयक ने सुरक्षा का नाम देकर समय के चक्र को पीछे धकेल दिया है। इस विधेयक में एक देश, एक भाषा, एक आस्था की अनुगूंज स्पष्ट सुनाई पड़ती हैं। हर राज्य में पारम्परिक तौर पर ट्रांसजेंडर समुदाय के कई नाम संज्ञा पहचान है। वह एक रूप नही है। वह बहुलतावादी समुदाय है। इस विधेयक में किन्नर, जोगता आदि कुछ तो पारम्परिक नाम सूची में निहित है। अन्य नाम जैसे तमिलनाडु में तिरुनंगई , तिरुनम्बी, उत्तर पूर्व में नूपा मनबा, नूपी मनबी, मध्य क्षेत्र में कोथि, मंगलामुखी, कुछ अन्य प्रांतों में दुर्रानी आदि शामिल नहीं हैं। अब यह समूह कहां जाकर अपनी पहचान सिद्ध करे? ट्रांस पुरूष, ट्रांस महिला, कुईर सूची से गायब हैं। यह भी बेहद अफसोसजनक है कि अंग्रेजी हुकूमत की अपराधिक जाति कानून में सूचित “युनक”पुनः नामावली में दर्ज किया गया है।

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यह कहा जा रहा है कि मात्र शारीरिक लैगिंग भिन्नता को मान्य किया जाएगा, बाकी को चिकित्सक से परीक्षण कराना पड़ेगा। हॉर्मोन और शल्य क्रिया होने पर बीमा मिलेगा, न कि इसको पाने के लिए जबकि ट्रांस समुदाय के लिए वह बेहद जरूरी है। सरकार क्या यह नहीं समझती कि बहुत से ट्रांस समूह की यौनिक इच्छा मनोवैज्ञानिक है। तो क्या उन पर यौनिक पसन्द थोपी जाएगी? यानी वे मर्जी से अपना साथी नहीं चुन सकेंगे। सरकार तय करेगी कि वह किसको चुनें।

यह सब ट्रांसजेंडर को बचाने के नाम पर हो रहा है। यह कहा जा रहा है कि जबरदस्ती प्रभाव में आकर, कोई खुद के विलग यौनिक पसन्द को अभिव्यक्त न करे। यह जबरदस्ती से बचाने की मुहिम है या जबरदस्ती यौनिक पसन्द थोपने की पहल! 

इस विधेयक में जो कोई संगठन, मनोवैज्ञानिक रायशुमारी करने वाले परामर्शदाता यौनिक अल्पसंख्य कठिनता से गुजरते लोगों की मदद करेंगे, वे सब अपराधी ठहराए जाएंगे।

यह इस मानसिकता से बनाया गया कानून है जहां व्यक्ति को गौण और बेवकूफ समझा जाये। जैसे अंतर्धार्मिक विवाह में लड़की को मूर्ख माना जाता है, वह बरगलाई जा सकती है, उसकी मर्जी मायने नहीं रखती क्योंकि उसको कुछ पता नहीं। वैसे ही ट्रांस व्यक्ति नादान हैं, बरगलाए जाकर समलैंगिक हुए हैं- यह कानून का लब्बोलुआब है। यह नालसा मामले के न्यायिक फैसले को धराशायी करता है जो बहुत अनुकूल नहीं था मगर कम-से-कम यह मान्य करता था कि लैंगिग पहचान व्यक्तिगत हक है। यही संविधान के मौलिक हक 14, 15, 19 और इक्कीस की आत्मा है। नया कानून सारे मौलिक हक पर प्रहार करता है। नालसा मामले में अदालत ने बायोलॉजिकल टेस्ट को खारिज किया था, जो औपनिवेशिक हुकूमत की देन थी। अदालत ने माना था कि शारीरिक क्रिया से विलग भी यौनिक पसंद हो सकती हैं। नए कानून में मेडिकल टेस्ट को बहाल किया है। अन्तर यौनि को पहचान से महरूम कर दिया है। अंतर यौनि को आनुवंशिकीय भिन्नता के रूप में जोड़ा गया है। उन्हें मात्र नपुंसक कहकर दरकिनार किया है।

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कहां जरूरत थी समलैंगिक सम्बन्धो को वैधानिक मान्यता देने की, वहां हम पीछे जा रहे हैं। यह असल में हर तरह के अधिनायकत्व का क्लाइमेक्स भी है और आधार बिंदु भी है।

यह महज इत्तिफाक नहीं कि बाल यौन शोषण उजागर हुआ, युद्ध में बच्चियों पर हमला हुआ, इधर कतिपय राज्य विवाह में अभिभावकों की मर्जी को अवांछनीय मानते है और अब शासन यौनिक पसन्द तय करने की जिम्मेदारी ओढ़ रही हैं। यह निसर्ग को पराभूत करने की मानसिकता है। वही सोच जो नदियों का रुख मोड़ना हक समझती है, हिमालय को तार-तार करती हैं, प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाती है, चाहे जिसको खदेड़ सकती हैं। यह मानसिकता पितृसत्ता को अपना कवच बनाती है, यह जिसको चाहती है अपने स्वार्थ अनुकूल उसको बढ़ाती है। उसके लिए गाजा में सदियों से रहे लोग, एक वीभत्स साधन सम्पन्न के हाथों यौन शोषण झेलने पर विवश बच्चे, स्त्री और लैंगिग अल्पसंख्यक, प्रकृति सब निम्न जीव हैं। अधिनायकीय सोच उनका मुस्कबिल तय करेगी। उनकी लक्ष्मण रेखा खिंचेगी। इस दौर में पितृसत्ता के यही रूप हैं।

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