
इन पंक्तियों के लिखे जाते समय दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध की कगार पर ठिठकी खड़ी है और सारे देश यह सवाल एक-दूसरे से पूछ रहे हैं। रूसी राष्ट्रपति पुतिन द्वारा यूक्रेन हड़पने के लिए छेड़े युद्ध की आंच रूस द्वारा परमाणु हथियारों की तैनाती के हुकुम के बाद अब दुनिया को दहला रही है। सबसे अधिक पड़ोसी यूरोपीय महासंघ के देशों ने जो दो विश्व युद्धों की भीषण तबाही भोग चुके हैं, विश्व युद्धों से उबर कर सबसे पहले राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा तथा समृद्धि की वापसी के लिए कुछ साझा संगठन बनाए। आधी सदी से अधिक समय तक उनमें से यूएन और नाटो ऐसे संगठन रहे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय टकराव कई बार रुकवाए, युद्ध से क्षतिग्रस्त देशों को राहत दिलवाई और बाजारों में विश्व साझेदारी की पीठिका रची। इतिहास के दबावों से विशालतम एशियाई देश सोवियत यूनियन का विखंडन हुआ जिनको सोवियत रूस जबरन अपने गैर रूसी उपनिवेश बनाने के बाद से मनचाहे हांकता रहा था। उसकी जकड़ से छूटे तमाम छोटे-बड़े देशों ने आजाद हो कर अपने लिए भी नाटो की छतरी और समृद्ध यूरोपीय गुट ईयू की साझेदारी में गहरी रुचि जताई।
21वीं सदी तक अमेरिका- सोवियत रूस का डरावना शीत युद्ध और सोवियत तानाशाही के साथ बिना बड़े विनाश के निबट गया, पर इतिहास की परतों में दबी लंबे समय तक दबी रही साम्राज्यवादी आकांक्षाएं नहीं मरतीं। रूस के भीतर भी जारशाही के युग की खुद को इस महाद्वीप का जन्मना शासक बनाने की आक्रामक इच्छा पनपती रही। पुतिन के क्रमिक उदय और हाल में उसने अपने खाए-खिलाए चाटुकारों की जय-जयकार के बीच खुद को सोवियत रूस का पुराना साम्राज्य फिर कायम करने का ऐलान किया और फिर ताउम्र रूस का शासक भी मनवा लिया।
पुतिन की मानसिक क्रोनोलॉजी साम्यवादी सोवियत रूस की महाशक्ति के दिनों में गढ़ी गई है जो स्टालिन युगीन विस्तारवादी निरंकुश दमनकारी मानसिकता में रची-पगी है। उसके तहत रूस ने 1939-1968 तक लगातार यूरोपीय स्वायत्त देशों, पोलैंड, लातविया, लिथुआनिया, हंगरी और अंत में चेकोस्लोवाकिया को लीला और मास्को से चलाया जाने वाला वह राष्ट्र राज्य कायम किया जिसे इंपीरियम कहा जाता रहा। नोबेल विजेता लेखक सोलझेनित्सिन ने आज से तीन दशक पहले विघटन से पहले के उस सोवियत संघ के बारे में लिखा था: ‘हमको हांकने वाला सिस्टम सामंती दरबारगिरी, वित्त जगत की खूंखार शार्क मछलियों, नकली लोकतंत्र वादियों और (खुफिया एजेंसी) केजीबी का एक अभूतपूर्व संगठन है। मैं इसे कतई लोकतांत्रिक नहीं कह सकता। यह गुट घिनौना और विगत रूसी इतिहास के तत्वों के संकरण से जबरन बना है और हमको किस दिशा में ले जाएगा, कहना असंभव है।’
दमनकारी सरकारी संस्थाओं के शीर्ष ‘केजीबी’ के सरगना रहे पुतिन ने बताया जाता है कि कोविड काल में पुराने रूस के कई नक्शे गौर से जांचे, और उनका यकीनऔर पक्का हो गया कि 'आदर्श रूसी साम्राज्य’ तभी कायम होगा जब उसके छत्र तले पलते रहे तमाम छोटे-बड़े देश इच्छा या अनिच्छा से फिर उसके भीतर समावेशित हों। मेमने जैसा बेलारूस उनमें से एक बनाया गया। पर उधर यूरोप ने रूसी इरादों को देखते हुए नाटो का दायरा बढ़ाकर यूक्रेन को भी उसके तले लाने का मन बनाना शुरू किया। इससे पुतिन को नाटो विस्तार को रूसी सीमा के लिए घोर खतरा कहकर दांत चियारने का मौका मिल गया।
पुतिन मर्दवादी तानाशाह हैं। सत्ता में आने के बाद से मीडिया की मदद से उनकी छवि सायास (कभी घोड़े की पीठ पर छाती खोल कर सवारी करते हुए, तो कभी बर्फीली नदी को तैर कर पार कर मुसाहिबों तथा गोदी मीडिया की सराहना बटोरते हुए) एक सक्षम, दबंग और जुझारू मर्दाना महानायक की बनाई गई है। उनकी नेतृत्व शैली लगातार आलोचकों को गिन-गिनकर दबाने, और भारी जनसमर्थन रखने वालों को भी सलाखों में कैद करने की रही है। बेशुमार दौलत के स्वामी उनके दोस्त ऑलीगार्क्स के एक छोटे से गुट की मार्फत उनको जबर्दस्त आत्मविश्वास और आर्थिक मदद मिलती रही है।
पराई बछिया का गोदान कराने में माहिर चीन महाबली स्पर्धी अमेरिका से खुद न टकरा कर किसी अन्य की मार्फत उससे सींग भिड़ाने के लिए बकरा तलाश रहा था। वह उसे अब इस अति आत्मविश्वासी पुतिन में दिख रहा है जिसकी कई नागवार हरकतों को उसने अपने वीटो की मदद से यूएन में ओट दी है। अन्य वजह यह कि रूस के पास कुदरती गैस और तेल का नायाब भंडार भी है। लिहाजा चीन समेत इस महाद्वीप के सभी एशियाई और यूरोपीय देश उससे रार ठानने या उसकी दमनकारिता के विरोधियों की खुली मदद से लगातार परहेज बरतते हैं।
पर जानकारों की राय है कि साम्राज्य विस्तार की इस अंधी मुहिम में पुतिन से सब तानाशाहों की तरह चंद गलतियां हो गईं। एक, हर तानाशाह की तरह उसे अपनी ताकत के सामने यूक्रेनी नेतृत्व के कमजोर और यूक्रेनियों के दब्बूपने पर पक्का भरोसा था। लेकिन उसकी सेनाओं के सीमा पर घुसते ही यूक्रेन की सेना और नागरिक अपने लोकतंत्र की रक्षा को स्वत:स्फूर्त तरीके से एकजुट हो गए। सोशल मीडिया में उनकी निडर भिड़ंत ने दुनिया को भी जता दिया है कि वे सीधे-सादे खेतिहर भले हों लेकिन पीठ दिखाने वाले जीव नहीं। उनके राष्ट्रपति जेलेंस्की ने तो शुरू में ही साफ कह दिया कि वह रणछोड़जी नहीं हैं।
दूसरी बात, अफगानिस्तान से पिटकर भागे अमेरिका और रूस को देखकर दुनिया ने जाना है कि इस सदी में विजेता चाहे कितना बड़ा देश क्यों न हो, एक छोटे से देश पर भौगोलिक जीत पाकर भी वह जनमत के खिलाफ शासन कायम नहीं कर सकता। पुतिन का सारा गोला-बारूद यूक्रेन को स्थायी रूसी उपनिवेश बना देगा, यह अब असंभव है। तीसरे विश्व के पास खबर पाने का स्रोत महज उनका गोदी मीडिया नहीं है। तमाम बड़ी संचार टेक कंपनियां आज पश्चिमी धड़े के देशों में हैं और रूस का हुक्का-पानी बंद कर चुकी हैं। मस्क जैसे बड़े तकनीकी खिलाड़ी ने यूक्रेन को क्लाउड की मार्फत इंटरनेट से सारी दुनिया से जोड़कर वहां बहते खून, प्रताड़ित परिवार और नेतृत्व की हिम्मत के सीधे दर्शन दुनिया को करा दिए हैं।
इसका प्रताप है कि यूरोप के साठ से अधिक देशों ने अपने आसमान पर रूसी उड़ानों को प्रतिबंधित कर दिया है और यूक्रेन को सैन्य सामग्री और हथियारों की डिलेवरी शुरू कर दी है। रूसी ऑलीगार्क्स की काली कमाई का अधिकतर पैसा भी डॉलरों में अमेरिका, ब्रिटेन और स्विस खातों में जमा है। यह तमाम खरबों के अकाउंट फ्रीज कर दिए गए हैं। और भी तमाम प्रतिबंध लगा कर रूसी अर्थव्यवस्था को पलीता लगाया जा रहा है।
फिलहाल बेलारूस में रूसी और यूक्रेनी प्रतिनिधि मिल कर सुलह वार्ता की मेज तक आ तो पहुंचे हैं। पर चारों तरफ से घिरने पर कई तानाशाह अपने अंतिम समय में ‘आप मुए तो पीछे डूब जाए दुनिया’ वाले मूड में आ जाते हैं। परमाणु बटन पर उंगली रखे हुए पुतिन द्वारा रूसी सेना वापस लेने में उनकी मर्दाना दबंगई आड़े आएगी। फिर सवाल पुरानी अंतरराष्ट्रीय सीमा की बहाली का भी है जहां खड़ी रूस की सेना उसे कुतर रही है। चीन ने रूस के परमाणु इरादों से एक तरह से अपना समर्थन वापस लेकर पर्दा गिरा दिया है कि उसकी सहमति से यह नाटक नहीं होगा। पर तानाशाहों को गलती का अहसास होने पर अक्सर यह लगता है कि कदम वापस लेते ही उनको राजनयिक तौर से घर भीतर और विश्व में भी कमजोर और डरपोक समझा जाने लगेगा। फिर वे बेवजह अड़ जाते हैं।
इस घटनाक्रम में फोन-ओन करने के अलावा भारतीय नेतृत्व का कोई खास बिचौलिए का रोल नहीं दिखता। वैसे भी, उसके सामने इस समय अपनी घरेलू चुनौतियां भी कम नहीं। पहली चुनौती तो यूक्रेन में फंसे हजारों भारतीयों जिनमें बहुतायत छात्रों की है, सुरक्षित निकालने की है। लिहाजा उसका सुर अभी ‘रूसी भाई साहिब जरा जगह दे दें, थैंक यू’ वाला बना हुआ है। घर भीतर की चुनौती यह है कि सरकार की आर्थिक विकास की नीतियां तमाम मीडिया प्रचार के बाद भी शेयर बाजार में युद्ध की आशंका से हो रही गिरावट तथा तेल के दामों में बढ़ोतरी के बाद विफल होती दिखने लगी हैं।
पुरानी नीतियों का यह कि गोदी मीडिया के प्रचार के बावजूद कहीं छुट्टा मवेशियों के रूप में, कहीं बेरोजगार युवाओं और अल्पसंख्यकों के आक्रोश के रूप में जनता की रीस सोशल मीडिया पर ही नहीं, मुख्यधारा मीडिया में भी वहां सतह पर दिख रही है जहां मतदान केन्द्र हैं। आत्मनिर्भर भारत तेल समेत कई तरह के आयात से लेकर उच्च शिक्षा तक के लिए पर निर्भर है। और हालत सुधारने के लिए हमारे नेतृत्व को विश्व में अपनी सरकार की भरोसा बहाली की घोर जरूरत है। यहां वे नेहरू को लाख कोसें, पर उनका दिया गुट निरपेक्षता का नारा ही भारतीय राजनय की लाज पर परदा डाले हुए है।
वैसे, गुटनिरपेक्षता जैसी कोई चीज आज बची नहीं है। दस साल पहले जब ग्लोबल बनती दुनिया लगातार तरक्की पर थी, तो भारत भी अन्य मुर्गों के साथ बांग देने डावोस में कुकड़ू-कूं करता था। लेकिनअमेरिका-चीन और रूस तथा भारत का एक-दूसरे को गले लगाने, चाय पिलाने या हिंडोले में बिठा कर झोंके देने वाला दौर गया। भारत को यह उम्मीद त्याग देनी चाहिए कि बाहरी लड़ाई में उसकी छवि विश्वगुरु की होगी और वह मुनि वशिष्ठ बनकर शांति पाठ करने को न्योता जाएगा। वसुधैव कुटुंबकम् के आप्त वचन कोई सुनने को तैयार नहीं। इसलिए यह चोला छोड़ उसे खांटी भारतीय नजरिये से अपने हित स्वार्थों की परवाह उसी तरह करनी चाहिए जैसे दूसरे कर रहे हैं। लेकिन यह सफलता से हो, इसकी बुनियादी शर्त है कि भारतीय जनता पार्टी नहीं, भारतीय जनता के बीच भी अतुल्य भारत, आत्मनिर्भर भारत की छवि गुच्छों में शीर्ष नेतृत्व का यशोगान करते घूम रहे मंत्रियों की मार्फत या बड़ी-बड़ी मूर्तियां लगवा कर करना बंद हो। संकट की घड़ियों में इतनी लोकतांत्रिक ईमानदारी तो न्यूनतम जरूरत है।
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Published: 06 Mar 2022, 8:12 PM IST