विचार

योगी कैसे बन गए बाबा गोरखनाथ के वारिस?

बाबा गोरखनाथ ने तत्कालीन समाज में फैली कुरीतियों और अंधविश्वासों का जैसा पुरजोर विरोध किया, मुख्यमंत्री के रूप में योगी उसका दसवां हिस्सा भी करते तो उत्तर प्रदेश का बहुत भला होता।

फोटो: Getty Images
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किसी भी सच्चे लोकतंत्र में सत्ताधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी शक्तियों का ऐसा विवेकपूर्ण उपयोग करें कि उनका शासन उन मतदाताओं को भी अपना लगे, जिन्होंने चुनाव में उनको वोट नहीं दिए, ताकि न उनमें अविश्वास पनपे और न वे स्वयं को उपेक्षित या तिरस्कृत महसूस करें। लेकिन कई बार उनसे कर्तव्य का पालन संभव नहीं हो पाता और वे वजह-बेवजह नए-नए मोर्चे खोलते रहते हैं।

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन दिनों जिस तरह स्वयं को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से नाहक उलझा रखा है, उसे कुल मिलाकर इसी रूप में देखा जा सकता है। लेकिन पहले तो उन्होंने ऐसा करने का कर्तव्य नहीं निभाया, फिर प्रयागराज के माघ मेले के दौरान स्नान के लिए जा रहे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पालकी रोकने, उनके शिष्य बटुकों की चोटी खींचकर घसीटने एवं पीटने और स्वामी से शंकराचार्य होने का प्रमाण मानकर अपमानित करने के सिलसिले में उत्तर प्रदेश विधान सभा तक में (जहां स्वामी अपना बचाव नहीं कर सकते थे) उनके शंकराचार्यत्व पर सवाल उठाने पर उतर आए तो स्वामी ने भी नहले पर दहला की तर्ज पर प्रत्युत्तर देने से परहेज नहीं किया।

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जिन बाबा गोरखनाथ की पीठ के योगी अधीश्वर हैं, उनके उपदेशों के संदर्भ देकर स्वामी ने यह तक कह डाला कि चूंकि सत्ता भोग के लिए योगी ने उनके सुविचारित पथ को त्याग दिया है, इसलिए 'योगी' और 'हिन्दू' कहलाने के पात्र नहीं रह गए हैं।

स्वामी के अनुसार, बाबा गोरखनाथ ने 'गोरखवाणी' में साफ कहा है कि कोई राजा चाहे तो गद्दी छोड़कर योगी बन सकता है, लेकिन किसी योगी को राजा की गद्दी पर बैठने की तो छोड़िए, राजा के दरवाजे तक भी नहीं जाना चाहिए। उनकी पीठ के अधीश्वर होने के बावजूद योगी उनकी इस मान्यता के विपरीत पिछले नौ साल से मुख्यमंत्री यानी 'राजा' बनकर न सिर्फ उनकी शिक्षाओं को ठुकरा, बल्कि उनकी पवित्र गद्दी को लज्जित कर रहे हैं।

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प्रत्युत्तर में स्वामी ने यह भी कहा कि केवल गेरुआ वस्त्र पहनने या कान फड़वाने से कोई साधु नहीं हो जाता। यह याद दिलाते हुए कि बाबा गोरखनाथ की गद्दी गौ माता की रक्षा के लिए जानी जाती रही है, योगी को चुनौती भी दी कि इस गद्दी के वारिस के तौर पर 40 दिन के भीतर गौ मांस के निर्यात पर रोक लगाकर अपने हिन्दू होने का प्रमाण दें।

ईद और होली और अली एवं बजरंग बली में भेदकर उनको एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की योगी की संकीर्ण, कट्टर हिन्दुत्ववादी और मुस्लिम विरोधी रीति नीति के विपरीत बाबा गोरखनाथ अपनी एक सबदी में यह भी कह गए हैं : हिन्दू ध्यावै देहुरा, मुसलमान मसीत, जोगी ध्यावै परमपद जहां देहुरा न मसीत। अर्थ यह कि योगी परम पद का ध्यान करता है, न कि मंदिर मस्जिद का। इसके अतिरिक्त उन्होंने भेदभाव न करने, मीठा बोलने और शांत रहने की नसीहत भी दी है: मन में रहिणां, भेद न अभिमान, बोलियां अमृत वाणी। इसीलिए देश के विभिन्न धर्मों और समाजों में भी उतने ही समादृत हैं जितने साहित्य में। उनको भारतीय साहित्य के निर्माताओं में तो शामिल किया ही जाता है, हठयोग परंपरा का प्रवर्तक, मत्स्येन्द्रनाथ का मानसपुत्र और भगवान शिव का अवतार भी माना जाता है।

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आमतौर पर उन्हें उदारचेता और कर्मठ संगठनकर्ता, समाजोद्धारक, लोकरक्षक और योग साधना के विशिष्ट पुरस्कर्ता महासिद्ध संत के रूप में जाना जाता है। एक किंवदंती कहती है कि उन्होंने समय-समय पर कुल चार अवतार लिए। सतयुग में पेशावर में, त्रेता में गोरखपुर में, द्वापर में द्वारिका में और कलिकाल में काठियावाड़ की गोरखमढ़ी में। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बिना किसी राग या द्वेष के अपने समय में प्रचलित समस्त साधना मार्गों से उचित भाव ग्रहण किया, जबकि योगी आदित्यनाथ उनके ऐसे वारिस हैं कि उनका राग द्वेष के बगैर एक पल भी काम ही नहीं चलता।

ओशो (आचार्य रजनीश) तो बाबा गोरखनाथ को कृष्ण, पतंजलि और बुद्ध के साथ भारत के चार दिशावाहकों में से गिनते हैं। एक बार उन्होंने हिन्दी के महाकवि सुमित्रानन्दन पंत को बताया था, ‘जैसे चार दिशाएं हैं, वैसे ये चार व्यक्तित्व हैं। जैसे काल और क्षेत्र के चार आयाम हैं, वैसे ये चार हैं। जैसे परमात्मा की हमने चार भुजाएं सोची हैं, वैसे ही ये चार भुजाएं हैं।’

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उनकी मानें तो गोरखनाथ से इस देश में एक नए प्रकार के धर्म का जन्म हुआ। उनके बिना न तो कबीर हो सकते थे, न नानक, न दादू, न वाजिद, न फरीद, न मीरा। इन सबके मौलिक आधार गोरख में हैं और भारत की सारी संत-परंपरा गोरख की ऋणी है। जैसे पतंजलि के बिना भारत में योग की कोई संभावना न रह जायेगी, जैसे बुद्ध के बिना ध्यान की आधारशिला उखड़ जायेगी, जैसे कृष्ण के बिना प्रेम की अभिव्यक्ति को मार्ग न मिलेगा, वैसे ही गोरख के बिना उस परम सत्य को पाने के लिये विधियों की जो तलाश शुरू हुई, साधना की जो व्यवस्था बनी, वह न बन सकेगी।... उन्होंने मनुष्य की अंतरतम की खोज की इतनी विधियां दीं कि उनके हिसाब से वह सबसे बड़े आविष्कारक हैं।

यहां स्मरण रखना चाहिए कि उनके समय में देश की धार्मिक और सामाजिक स्थिति जटिल थी। विभिन्न धर्मों और संप्रदायों में ‘जितनी गद्दियां, उतने पंथ’ की स्थिति थी तो खंडन-मंडन, विघटन और संगठन की प्रवृत्तियां भी कुछ कम नहीं थीं। अच्छी बात यह थी कि समाज में ऊंच-नीच के प्रति विद्रोह और असंतोष भी फैला हुआ था, जिसको उपयुक्त दिशा पाने के लिए किसी ऐसे महापुरुष की प्रतीक्षा थी जो उसी समाज से हो और उसकी ‘आदर्श की भूख’ शांत कर सके।

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यह प्रतीक्षा गोरखनाथ पर आकर समाप्त हुई तो उन्होंने निराश नहीं किया। अपने गुणों, नैतिकताओं और शक्तियों के समन्वय को कार्यरूप में परिणत करके उन्होंने बिखरे हुए बारह पंथों को संगठित किया, जिनमें छह उनके द्वारा ही प्रवर्तित थे, जबकि छह अन्य शिव द्वारा। एक बड़ा कदम उठाकर उन्होंने वर्णाश्रम व्यवस्था के भेद-विभेदों, यौगिक सिद्धियों के जनपीड़क रूपों और भांग, मद्य एवं मांस को नकार दिया। साथ ही, नारी के केवल मातृरूप की पूजा पर जोर दिया और जीवन के लिए ब्रह्मचर्य और संयम के साथ उद्वेगरहित मार्ग को उचित बताया।

गोरखनाथ ने कहा था, मैं पृथ्वी पर सोता हूं। मेरे पास बिस्तर नहीं ओढ़ावन नहीं। कंकड़ पत्थरों पर सोता हूं और बियाबान में रहता हूं। योगी तो निर्धन होते हैं। उनके पास धन नहीं होता और सबसे बड़ी बात कि उनका किसी से वैर नहीं होता। गोरखनाथ ने तत्कालीन समाज में फैली कुरीतियों और अंधविश्वासों का जैसा भरपूर विरोध किया, मुख्यमंत्री के रूप में योगी उसका दसवां हिस्सा भी करते तो उत्तर प्रदेश का बहुत भला होता। विडंबना यह कि इनमें जिन तीन बुराइयों के उन्मूलन को बाबा गोरखनाथ ने सबसे ऊपर रखा -अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियां और रूढ़िवाद- उनके प्रति योगी आदित्यनाथ इस सीमा तक सहिष्णु हैं कि उनको यह बात शायद ही कभी खलती हो कि ये तीनों आज भी चुनौती बने हुए हैं।

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बाबा गोरखनाथ को इसका भान था कि ये तीनों आसानी से उन्मूलित नहीं होने वाले, इसलिए वह ‘समाज’ की उन दिनों प्रचलित असामाजिक धारणा को नहीं मानते थे और उसे बदलना चाहते थे। उनके पंथ में गुरु का स्थान सबसे ऊंचा है, लेकिन गुरु वह है जो ज्यादा जानता है और अवधूत है, न कि वह जो जाति, वर्ण और वंश वगैरह के आधार पर गुरु की गद्दी चाहता है या उस पर आसीन है और गुणमय वर्ण एवं गुणमय आश्रम का अभिमानी है। इसी तरह नाथ वह है, जो वर्णाश्रम धर्म से परे है और समस्त गुरुओं का साक्षात गुरु है। न उससे कोई बड़ा है और न बराबर।

सोचिए जरा, क्या योगी आदित्यनाथ की निगाह में भी इन सबका रूप यही है? अगर नहीं तो वह बाबा गोरखनाथ के कैसे वारिस हैं?

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