विचार

कितना अंतर है आज विभाजनकारी राष्ट्रवाद और राष्ट्रपिता के राष्ट्रवाद में

देश में जब हर बात पर राष्ट्रवाद भारी हो तब यह विषय जरूरी हो जाता है। संयोग से गांधी के डेढ़ सौवें साल के आयोजनों की धूम भी है और राष्ट्रवाद का शोर मचाने वालों के अनिवार्यत: गांधी विरोध सुर के चलते भी इस सवाल को जांचना जरूरी लगता है।

फोटो : Getty Images
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गांधी जी से बड़ा राष्ट्रवादी कौन होगा। इसलिये जब हम गांधी के राष्ट्रवाद की चर्चा कर लेंगे या उसके बारे में थोड़ी समझ बना लेंगे तब यह विचार करना भी आसान हो जाएगा कि आज का शोर कितना जरूरी है।

एक विभाजन तो राष्ट्रपिता गांधी के समय ही हो गया और उसे लाख चाहकर भी वे खुद नहीं रोक पाए, पर आज हम जिस विभाजक मानसिकता को बढ़ाते जा रहे हैं, उसमें राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े हों न हों, वह गर्त में जरूर गिरेगा। सारी जरूरतों और भावनाओं पर राष्ट्रवाद ही प्रभावी हो, ऐसा राष्ट्रीय आंदोलन के समय भी नहीं दिखा था, आज तो हम आजाद मुल्क हैं।

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खुद राष्ट्रपिता ने जब देश के लोगों और समाज के लिए काम करना, गुलामी-रंगभेद के अपमान को खत्म करने, मुल्क की आजादी और गोरी सत्ता को खत्म करने के साथ अपने वकालत और परिवार की परवाह न करने का संकल्प किया, तब वे न भारत में थे, न भारतीयों के लिए लड़ने का विचार उनके मन में था। दक्षिण अफ्रीका में उनकी लड़ाई हिन्दुस्तानी मूल के लोगों की थी, लेकिन उसमें हिन्दुस्तान में चलने वाले राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जुड़ने का विचार आ गया था।

गांधी के अंदर जब औपनिवेशिक शोषण, अन्याय और भेदभाव से लड़ने का भाव आया तब उसका स्वरूप ठीक-ठीक वही नहीं था, जो आज राष्ट्रवाद के नाम पर समझाया जा रहा है। बल्कि गांधी के लिए हिन्दुस्तान राष्ट्र नहीं था या उनके हिन्दुस्तान प्रेम में कोई किंतु-परंतु था ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। उपनिवेशवादी शोषण से मुक्ति की उनकी लड़ाई का दायरा सीमित न था, लेकिन यह था तो मुख्यत: हिन्दुस्तान के लिए ही। और जब गांधी और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन से पराजित होकर अंग्रेजों के विदा होने का वक्त आया तो जाते जाते उन्होंने षडयंत्र से मुल्क के दो टुकड़े करा दिए।

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इस बारे में हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं और खासकर गांधी के नजरिए और औपनिवेशिक शासकों (अंग्रेजों) के नजरिए के अंतर को समझना जरूरी है। अंग्रेजों का मानना और दावा था कि हिन्दुस्तान नामक एक मुल्क तो था ही नहीं, इसे तो हमने बनाया है। उनका कहना था कि हिन्दुस्तान तो विभिन्न जातियों, धर्मों/पंथों, भाषा-भाषी लोगों का जमावड़ा था जिसमें कोई एकता नहीं थी और इसे तो हमने एक देश का स्वरूप दिया है। इसके विपरीत गांधी और हमारे राष्ट्रीय नेताओं का मानना था कि भारत में दिखने वाली इतनी विविधता ही बुनियादी एकता है। भारत भले राजनैतिक रूप से अंग्रेजी हुकुमत वाले दौर की तरह एक इकाई न रहा हो पर उसके सभी प्रदेशों, लोगों, मजहबों, भाषाओं और बोलियों में कोई आपसी बैर नहीं रहा। हजारों साल से सभी एक साथ रहे और इनके बीच एक बुनियादी एकता है। गांधी के पहले के नेता इस स्थापना को सामने लाने के साथ ही उन सभी मोर्चों पर सक्रिय रहे जिनसे यह एकता दिखे या बढ़े। तिलक ने इसके लिए गणेश पूजा की मुहिम चलाई, तो बंगाल में सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत उसी दौर में हुई, वरना पूजा पहले अपनी-अपनी बाड़ी की ही चीज थी।

लिखने-पढ़ने-बोलने से लेकर अनेक तरह के आयोजनों के जरिए इस राष्ट्रीयता को स्थापित किया गया। राष्ट्रीयता की यह अवधारण काफी हद तक यूरोपीय थी और भारत ही नहीं पूरब के समाजों के लिए अनजान थी, लेकिन जब पश्चिमी औपनिवेशिक सत्ता से लड़ना हो तो उसे उसी की जुबान में जवाब देना जरूरी था। केशव चन्द्र सेन जैसे लोगों ने ईसाई मत अपना लिया था, लेकिन सार्वजनिक दुर्गा पूजा के आयोजनों से उन्होंने अपना राष्ट्रवादी विमर्श आगे किया।

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एक बड़ी पहल विवेकानंद ने की - हिंदुस्तान में समाज की जड़ता को तोड़ने और झकझोरने की। ऊंचे-ऊंचे दर्शन के बीच हिंदुस्तानी ज्ञानी कथनी और करनी के भेद को भूल गया था। वह छुआछूत बरतने या महिला से दोयम दर्जे के व्यवहार को अनैतिक नहीँ मानता था जबकि दर्शन और आध्यात्म की बहुत ऊंची-ऊची बातों का ज्ञान उसे हासिल था। गांधी ने ‘तिलक-पाल-सेन’ वाली लाइन के साथ विवेकानंद की लाइन को भी माना, अपनाया और आगे बढाया। समाज को एक करने, कमजोर और गरीब का पक्ष लेने से लेकर आर्थिक और राजनैतिक रूप से मजबूत राष्ट्र का निर्माण और दुनिया मेँ अच्छे मूल्यों को आगे बढाने वाले स्वतंत्र मुल्क के तौर पर भारत को विकसित करने के सपने को विवेकानद से भी ज्यादा गांधी ने आगे बढ़ाया।

दरअसल गांधी जी ने हिंदुस्तान लौटने के पहले ही यह राय साफ कर ली थी कि उन्हें कैसा हिंदुस्तान बनाना है, उसकी दुनिया में क्या भूमिका होगी और पश्चिमी सभ्यता का क्या विकल्प होगा। ‘हिन्द स्वराज’ वही कुंजीनुमा किताब है जो गांधी के पूरे नजरिए को साफ करती है और जिसके काफी बड़े हिस्से पर गांधी जी ने राष्ट्रीय आंदोलन के साथ ही काम किया-कराया।

हम यहाँ हिन्द स्वराज पर चर्चा नहीँ करेंगे, पर हमने देखा है कि जो गांधी दक्षिण अफ्रीका की लडाई में हिन्दू-मुसलमान एकता और औरतों की भागीदारी के साथ लड़ते हैं, भारत आते ही पंचम वर्ण अर्थात अछूतों के साथ काम की रूपरेखा को अंजाम देने लगते हैं। चम्पारण पहुंचकर सबसे पहले महिलाओं की स्थिति पर चर्चा करते हैं। अपने पहले राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में खिलाफत के सवाल को केन्द्रीय बनाते हैं और चम्पारण से ही वैकल्पिक शिक्षा, ग्रामोद्योग, गोशाला-पशुपालन और स्वच्छता-स्वास्थ्य के प्रयोग शुरु करते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा और शराबबंदी की मुहिम चलाते हैं, हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का अभियान शुरु करते हैं, दक्षिण में हिन्दी प्रचार के लिए अपने बेटे समेत अनेक प्रियजनों को भेजते हैं। और, देश को आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनाने के लिए खादी की मुहिम उनके लिए जनून का रूप लेती है, तो हरिजन उद्धार के लिए भीख मांगना उनकी राष्ट्रीय पहचान बन जाती है। वे पश्चिमी पोशाक और शानोशौकत को अपनाने की जगह आम हिन्दुस्तानी की तरह लंगोट पर आ जाते हैं। उनके ‘राष्ट्र’ अर्थात रामराज्य में सिर्फ बराबरी, भाईचारा, सबकी बुनियादी जरूरतों का खयाल ही रखने की बात न थी, सबको सम्मान और निर्भयता का वायदा भी था। उनका हिंदुस्तान सबको बराबरी का अधिकार अर्थात सार्वभौम मताधिकार की बात पहले दिन से करता है, तो दुनिया में अन्याय के खिलाफ लडी जाने वाली लडाइयों में भी साथ होता है। गुजरात की बाढ, बिहार के भूकम्प जैसी आपदाओं को भी अपने से संभालने लगा था।

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गांधी ने तिरंगे की परवाह न की हो इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन गरीब के शरीर पर कपड़ा डालना उनका जनून था। उनके लिए राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा जरूरी चीज थी लेकिन किसी पड़ोसी को दुश्मन मानना जरूरी न था। उनके लिए खादी का खुरदुरापन या मोटे अनाज का भदेसपन समान व्यवहार की चीज थे। हर किसी को शिक्षित, स्वस्थ बनाना, सबके सिर पर छप्पर का इंतजाम करने, सबके लिए भरपेट भोजन का इंतजाम करना सबसे बड़ी चिंता थे। हर औरत मर्द से बराबरी का व्यवहार, सादगी, मितव्ययिता और अनुशासन में से कुछ भी दिखावटी और दूसरों के करने की चीज न थी। पक्का वैष्णव होते हुए भी मन्दिर जाने की जरूरत तभी महसूस हुई जब दलितों को मन्दिर प्रवेश कराना था। कई विश्वविद्यालय/विद्यापीठ और हजारों स्कूल-कालेज बनवाने का जतन किया, पर कहीं मन्दिर-मस्जिद या ऊंची मूर्ति लगवाकर राष्ट्रवाद को आगे नहीं बढ़ाया। गांधी ने क्या-क्या किया, कैसे किया, किस सोच से किया यह गिनवाना आसान नहीं है, पर उनकी दिशा, सोच और मंशा को बताना मुश्किल नहीं है।

अगर उनको राष्ट्रपिता कहा और गिना जाता है तो इसक सीधा सा मतलब है कि आज जो राष्ट्र है उसको बनाने, मौजूदा स्वरूप देने में उनकी भूमिका सबसे बड़ी, सबसे ज्यादा थी। और जो राष्ट्र उन्होंने बनाया वह सिर्फ औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए दुनिया का माडल ही नहीं बना, अन्याय से लड़ाई में उनका हथियार सत्याग्रह आज सबका हथियार बन रहा है। गांधी जी की अहिंसा ही नहीं, विकास का वैकल्पिक मॉडल दुनिया को मुक्ति का रास्ता नजर आता है। और, वह लोहिया की इस बुनियादी स्थापना को सही साबित करता है कि भारत जब-जब उदार हुआ है, दुनिया में उसका विस्तार हुआ है और वे यह भी कहते हैं कि जब-जब कट्टरता बढ़ी है भारत कमजोर हुआ है, खंडित हुआ है।

आज राष्ट्रपिता के राष्ट्रवाद के साथ इस चीज को भी याद करने की जरूरत है।

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