विचार

सोशल मीडिया के दौर में पिछड़ते जा रहे हैं हाशिये के लोग, संकीर्ण किया जा रहा है दायरा

सोशल मीडिया अनुसूचित जाति का दायरा संकीर्ण करता जा रहा है और उनके इतिहास और अनुभवों को अपने प्लेटफ़ॉर्म से मिटाता जा रहा है। सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया दोनों ही उच्च जाति वालों के हाथ में है, इसलिए लगातार पिछड़ी जातियों की उपेक्षा की जाती है।

सोशल मीडिया के दौर में पिछड़ते जा रहे हैं हाशिये के लोग, संकीर्ण किया जा रहा है दायरा
सोशल मीडिया के दौर में पिछड़ते जा रहे हैं हाशिये के लोग, संकीर्ण किया जा रहा है दायरा फोटोः सोशल मीडिया

यूनाइटेड किंगडम के यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के समाजशास्त्रियों ने अपने अध्ययन में बताया है कि भारत में सामाजिक-आर्थिक हाशिये पर बैठे अनुसूचित जाति के लोग सोशल मीडिया के दौर में पहले से अधिक पिछड़ते जा रहे हैं। सामान्य मीडिया या मेनस्ट्रीम मीडिया तो परंपरागत तौर पर समाज के पिछले वर्ग की उपेक्षा करता रहा है। सोशल मीडिया के दौर में उम्मीद थी कि समाज का पिछड़ा वर्ग भी अपनी आवाज बुलंद कर सकेगा, पर वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के समाजशास्त्री डॉ प्रदीप अत्री के नेतृत्व में इस अध्ययन को किया गया है और “बिजनस एंड सोसाइटी” नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इसके अनुसार सोशल मीडिया असमानता बढ़ा सकता है और सामाजिक न्याय की चर्चाओं से इन्हें गायब भी कर सकता है।

देश में अनुसूचित जाति के लोगों की आबादी 20 करोड़ के लगभग है और ये परंपरागत जाति व्यवस्था में सबसे नीचे के पायदान पर हैं। सरकारी तौर पर इनको आगे बढ़ाने के लिए लगातार योजनाएं बनाई जाती हैं, लगातार नई घोषणाएं की जाती हैं- पर असर कुछ भी नहीं होता। इनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति समझने के लिए एक तथ्य ही काफी है- देश में बहुआयामी गरीबी से जूझती कुल आबादी में से लगभग 83 प्रतिशत अकेले अनुसूचित जाति के हैं। इस आबादी में कुछ लोग आर्थिक तौर पर मध्यम वर्ग तक पहुंच गए हैं पर समाज उन्हें पिछड़ा ही मानता है। लगातार खबरें आती हैं कि नेताओं के सामने पिछड़े वर्ग के बड़े पदों पर बैठे कर्मचारी भी जमीन पर बैठते हैं, उनके साथ हिंसा की जाती है और उनकी आर्थिक भव्यता का विरोध किया जाता है।

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पिछड़ी जातियों की उपेक्षा की जाती है

सोशल मीडिया अनुसूचित जाति का दायरा संकीर्ण करता जा रहा है और उनके इतिहास और अनुभवों को अपने प्लेटफ़ॉर्म से मिटाता जा रहा है। सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया दोनों ही उच्च जाति वालों के हाथ में है, इसलिए लगातार पिछड़ी जातियों की उपेक्षा की जाती है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का अलगोरिथ्म इस तरह का होता है कि पिछड़ी जाती के यूजर्स नजर नहीं आते, या अपना दायरा बढ़ा नहीं पाते। दूसरी तरफ अत्यधिक गरीबी के चलते, पिछड़ी जातियों के अधिकतर लोग स्मार्टफोन या लैपटॉप की पहुंच से दूर हैं, जाहिर है सोशल मीडिया से भी दूर हैं। सोशल मीडिया पर यदि ऐसी पोस्ट दिखती भी है तो कोई ध्यान नहीं देता, समस्याओं से संबंधित अनुभवों को साझा नहीं करता। पिछड़ी जातियों के अधिकतर लोग सोशल मीडिया पर यदि लगातार अपनी समस्याओं को उजागर करते हैं तब फिर उन्हें बड़े पैमाने पर ट्रोल किया जाता है, धमकियां दी जाती हैं और अनेक मामलों में ऐसी धमकियां वास्तविक हिंसा में बदल जाती हैं।

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्युरो के आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित जाति पर हिंसा लगातार बढ़ती जा रही है। वर्ष 2023 में इन पर हिंसा के 57789 मामले दर्ज किए गए थे, जो वर्ष 2022 की तुलना में 0.4 प्रतिशत अधिक हैं। इस संदर्भ में पिछले कुछ वर्षों से लगातार उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर रहा है– वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश में ऐसे 15130 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद राजस्थान में 8449 मामले, मध्य प्रदेश में 8232 मामले और बिहार में 7064 मामले दर्ज किए गए। वर्ष 2023 में कुल 2835 दलित महिलाओं और 1379 दलित बच्चियों का बलात्कार किया गया।

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दलित महिलाओं के साथ सरकारी योजनाओं में भेदभाव

कमला मेशराम यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबोर्न के स्कूल ऑफ मार्केटिंग में प्रोफेसर हैं और उन्होंने भारत में अनुसूचित जाति की महिलाओं की समस्याओं पर विस्तृत अध्ययन किया है। हाल में ही उन्होंने इसी विषय पर प्रकाशित लेख में बताया है कि दलित महिलाओं के साथ उनके विकास की सरकारी योजनाओं में भी भेदभाव किया जाता है। 1970 के दशक में बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस ने पिछड़ी महिलाओं के आर्थिक उत्थान के लिए माइक्रोफाइनैन्स की नीतियों को आर्थिक मुख्यधारा में समाहित किया। इसके बाद भारत समेत अनेक देशों ने इस मॉडेल को अपनाया।

हमारे देश में भी लगभग हरेक बैंक माइक्रोफाइनैन्स स्वीकृत करते हैं, इसके तहत आर्थिक तौर पर पिछड़ी महिलाओं को रोजगार शुरू करने के लिए छोटे लोन दिए जाते हैं। इस पूरे नीति की निगरानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के हाथों में है। इसके तहत अनुसूचित जाति के लिए ब्याज दर सामान्य वर्ग की अपेक्षा आधी है। जाहिर है, यह पूरी नीति पिछड़े वर्ग की माहिलाओं के आर्थिक विकास के लिए तैयार की गई है, पर इसमें भी अनुसूचित जाति की महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है।

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बैंकों में होता है भेदभाव

ऐसी महिलाओं को जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होता है और इसे देखने के बाद से ही बैंक अधिकारियों का व्यवहार बदल जाता है। ऐसी महिलाओं की लोन के फॉर्म भरने में मदद नहीं की जाती, उनके प्रश्नों का जवाब नहीं मिलता और अनेक ब्रांच तो ऐसे भी हैं जहां उन्हें दूसरे प्रतीक्षार्थियों की तरह कुर्सी पर बैठने भी नहीं दिया जाता। इस लेख में बताया गया है कि दलित महिलायें किसी तरह सरकारों द्वारा चलाए जा रहे प्रशिक्षण संस्थानों से प्रशिक्षण तो ले लेती हैं, पर आगे लोन लेकर व्यवसाय नहीं शुरू कर पातीं।

कमला मेशराम ने एक प्रतिष्ठित बैंक के 43 शाखाओं में माइक्रोफाइनैन्स लोन का विस्तृत अध्ययन किया। इन शाखाओं में सम्मिलित तौर पर लोन प्राप्त ग्राहकों की संख्या 20 लाख से अधिक थी। इस अध्ययन में सबसे चौकाने वाला तथ्य यह था कि लोन के जिन आवेदनों को अस्वीकृत किया गया उसमें से 66 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति की महिलाओं के थे। सरकारी स्तर पर इन महिलाओं के विकास के लिए जो योजनाएं तैयार की गई हैं उनका लाभ जमीनी स्तर पर कहीं नहीं मिल रहा है।

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विश्वगुरु विकास की नई परिभाषा गढ़ रहे

दिक्कत यह है कि सामाजिक, आर्थिक और जातीय तौर पर पिछड़ी आबादी के लिए तमाम सरकारी योजनाएं हैं पर उनके प्रभावों का आकलन नहीं किया जाता। सत्ता के लिए विकास का पैमाना नीतियां और खर्च किए जाने वाले पैसे हैं– प्रभाव नहीं। मोदी सरकार में तमाम योजनाओं के आकलन की पूरी व्यवस्था ही ध्वस्त कर दी गई है। पहले सीएजी की रिपोर्ट में योजनाओं की खामियां उजागर होती थीं, मीडिया में बहस होती थी, सदन में प्रश्न उठते थे, पर अब नरेंद्र मोदी सरकार में बिना प्रश्नों वाला और बिना आकलन वाला तथाकथित “विकसित भारत” ही रह गया है। अब केवल राजनीति चमकती है, पूंजीवाद बढ़ता है, समाज विकास में पीछे होता जा रहा है, असमानता बढ़ती जा रही है- और विश्वगुरु विकास की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं।

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