विचार

‘भारत मेरा भी देश है’

भारतीय इतिहास के इस यादगार पन्ने के साक्षी रहे लोगों की नजर से जंतर-मंतर के आंदोलन को देखने का अनुभव ही कुछ और है।

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Getty Images Hindustan Times

जब भी मैं सरकार की किसी नीति या कदम की जरा भी आलोचना करती, तो मेरे पिता मुझसे कहते थे- ‘अगर तुम्हें सरकार में कुछ गलत लगता है, तो खुद प्रधानमंत्री बन जाओ!’ जब मैं कहती कि देश में इस चीज को बदलने की जरूरत है, तो उनका जवाब होता- ‘केवल बातें करने से कुछ नहीं बदलता।’

मुझे उनकी बात हमेशा तर्कसंगत लगती थी: अगर मैं किसी चीज को बदलना चाहती हूं, तो मुझे खुद उसके लिए कुछ करना होगा। मैं अपने आसपास के लोगों से बात करती, अपनी राय बनाती, लेकिन यह देखकर निराशा भी होती कि इसका कोई असर नहीं हो रहा।

फिर आई 25 जुलाई 2026 की वह ऐतिहासिक तारीख- जिस दिन भारत के केन्द्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। उस दिन मुझे पहली बार अहसास हुआ कि जिसे मैं सही मानती हूं, केवल उसके पक्ष में खड़े होने भर से भी एक बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

इस साल जून के शुरू में अभिजीत दीपके द्वारा शुरू किया गया एक व्यंग्यात्मक अभियान देखते ही देखते डिजिटल दुनिया से बाहर निकल आया। यह अभियान भारत के बेरोजगार युवाओं को ‘कॉकरोच’ कहे जाने के विरोध में शुरू हुआ था। जल्द ही यह मेरे पसंदीदा ऐप इंस्टाग्राम से निकलकर दिल्ली के जंतर-मंतर की सड़कों तक पहुंच गया। यह प्रदर्शन नीट परीक्षा के पर्चा लीक होने और भारत की उस चरमराती शिक्षा प्रणाली के खिलाफ था, जिसका यह लीक एक प्रतीक बन चुका था।

इस पर्चा लीक के कारण उपजी मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर कम से कम 12 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी। इस दुखद घटना ने मेरे समेत देश के लाखों लोगों के दिलों को झकझोर कर रख दिया। अभी दो साल पहले ही मैं खुद कई प्रवेश परीक्षाएं दे रही थी। ऐसी व्यवस्थागत नाकामियों के कारण-जिन्हें आसानी से रोका जा सकता था- छात्रों को दम तोड़ते देख मेरे अंदर आक्रोश भर गया। इसी आक्रोश ने हममें से बहुत से युवाओं को सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया।

शुरू में जब मैं इस आंदोलन से जुड़ी, तो मुझे किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं थी। हमारी संख्या बहुत कम थी और हमारे खिलाफ खड़े लोगों की तादाद बहुत ज्यादा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते, यह तादाद बदलने लगी और हमारे दिलों में उम्मीद की एक नई लौ जल उठी। पूरे भारत से छात्र इस आंदोलन में शामिल होने लगे-इतनी बड़ी संख्या में कि प्रदर्शन स्थल भी छोटा पड़ने लगा। यह विशुद्ध रूप से छात्रों का आंदोलन था, और इसमें शामिल प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा हिस्सा उस पीढ़ी से था जिसे हम से ‘जेन जी’ कहते हैं।

जेन जी सबसे बेहतर क्या करती है? हम मीम्स बनाते हैं और सोशल मीडिया चलाते हैं। हमने वही किया। मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया की कार्यशैली को उजागर करने के लिए शायद न्यूज रिपोर्टिंग सबसे अच्छा जरिया नहीं थी, और न ही न्यूज चैनल इसके लिए सही मंच थे। टीवी समाचारों में जो दिखाया जा रहा था और जमीनी हकीकत में जो घट रहा था, उसमें जमीन-आसमान का अंतर था। इसीलिए, न्यूज चैनलों की तुलना में इंस्टाग्राम समाचार का अधिक विश्वसनीय जरिया बन गया। सोचिए, एक रविवार के विशेष समाचार बुलेटिन की तुलना में एक मीम सच को ज्यादा ईमानदारी से बयां कर रहा था!

जो लोग ऑनलाइन रहकर इस आंदोलन का समर्थन कर सकते थे, उन्होंने अपना काम किया। वहीं, जो लोग जमीन पर मौजूद थे, उन्होंने संगीत, नुक्कड़ नाटक, देश के स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते नारों, व्यंग्यात्मक तख्तियों और 'कॉसप्ले' के जरिये अपने दर्द और गुस्से को आवाज दी। प्रदर्शन स्थल पर कम-से-कम तीन स्पाइडर-मैन, दो गांधी, पावरपफ गर्ल्स और एक गोरिल्ला तक पहुुंचे।

आंदोलन ने तेजी से लोगों का ध्यान खींचा और प्रदर्शन स्थल के पास भारी भीड़ जुटने लगी। मैं आमतौर पर अपनी सुरक्षा के लिए पेपर स्प्रे साथ रखती हूं, इसलिए शुरू के कुछ दिन इसे साथ ले गई। लेकिन फिर मैं इसे घर पर ही छोड़ने लगी। एक महिला होने के नाते, इतनी बड़ी भीड़ के बीच खुद को इतना सुरक्षित महसूस करना मेरे लिए एक बड़ी राहत जैसा था। दुनिया में आप कहीं भी चले जाएं, अगर आप एक महिला हैं तो आपको हमेशा एक अनजाना डर घेरे रहता है। मुझे नहीं पता यह कैसे हुआ, लेकिन इस आंदोलन में एक भी पल ऐसा नहीं आया जब मुझे खुद को सचेत या चौकन्ना रखने की जरूरत महसूस हुई हो। मैं पूरी तरह स्वतंत्र थी-यह सोचने के लिए कि मैं उस भीड़ का हिस्सा क्यों बनना चाहती थी।

20 जुलाई भारतीय लोकतंत्र का काला दिन था, जिसने एक साथ कई कड़वी सच्चाइयों को उजागर किया। एक तरफ अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण मार्च करते छात्र थे, तो दूसरी तरफ उन पर बरसाई जा रही भयानक बर्बरता थी-उन्हीं लोगों द्वारा जिनका काम सुरक्षा करना था। इसके साथ ही उन लोगों की हृदयहीनता भी दिखी जो यह मानते थे कि छात्र इसी लाठीचार्ज के लायक थे। लेकिन इन सबके बीच, छात्रों का अदम्य साहस और संकल्प भी दिख रहा था, जिन्होंने हिंसा का जवाब कभी हिंसा से नहीं दिया।

छात्रों के शरीर से खून बहा, कई बेहोश हुए, रोए, उन्होंने पुलिस के सामने गुहार लगाई, लेकिन एक बार भी पलटकर वार नहीं किया। हमारी संख्या पुलिस बल से कहीं अधिक थी। यदि हम चाहते तो उन्हें काबू कर सकते थे, लेकिन हमारी लड़ाई यह थी ही नहीं। यह लड़ाई हमारी शिक्षा और भविष्य के लिए थी, और हवा का रुख अपनी हमारी तरफ मोड़े बिना हम इसे खत्म नहीं होने देना चाहते थे।

भारत में किसी से उलझना बहुत आसान है; आप ट्रैफिक में गलत धुन में हॉर्न बजा दें तो लड़ाई हो सकती है। इसके बावजूद, छात्रों ने उन पुलिसकर्मियों को गुलाब के फूल भेंट किए जो उन्हें बेरहमी से पीट रहे थे। हमने ताकत का जवाब ताकत से नहीं, बल्कि संयम और संवेदना से दिया। हमने पुलिसकर्मियों को खाना और पानी की पेशकश की, खुद को यह समझाते हुए कि वे केवल अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। अगले कुछ दिनों में हमारे नारों में ‘दिल्ली पुलिस, वी लव यू’ जैसे आत्मीय नारे शामिल थे- और कुछ ऐसे तीखे नारे भी थे जो शायद अखबार के पन्नों पर जगह न पा सकें।

24 जुलाई की रात, मैं एक ऐसी लड़की के साथ बैठी जो किसी दूसरे राज्य से आई थी और 17 जुलाई से प्रदर्शन स्थल पर ही सो रही थी। उसने मुझे बताया कि वह वापस अपने घर लौट रही है। उसका कॉलेज में दाखिला हो चुका था और उसकी पढ़ाई का नुकसान हो रहा था। उसने कहा कि वह शिक्षा के लिए किए जा रहे आंदोलन के कारण अपनी ही शिक्षा का बलिदान नहीं दे सकती।

हमने चर्चा की कि कैसे सरकार अगले दिन कुछ सुधारों की घोषणा कर सकती है, लेकिन इसमें प्रधान के इस्तीफे की बात शायद नहीं मानने वाली। लेकिन अगले दिन पासा पलट गया। जिस दिन उसने दिल्ली छोड़ी, वह यह जानकर गई कि यह देश उतना ही उसका भी है जितना किसी और का, और उसके पास खुद की और अपने लोगों की रक्षा करने की ताकत है। मुझे भी यही अहसास हुआ। लंबे समय में पहली बार, मैं विश्वास कर सकी कि यह देश मेरा भी उतना ही है जितना किसी राजनेता का।

इस आंदोलन में शायद कुछ कमियां रही हों, कुछ गलत कदम उठाए गए हों- कुछ उन लोगों द्वारा जो इसे नुकसान पहुंचाना चाहते थे, और कुछ उन लोगों द्वारा जो इसे सफल बनाना चाहते थे। इसका जो भी परिणाम निकले, वह शायद हमारी हर इच्छा को पूरा न करे। फिर भी, इसने सरकार को झुकने पर मजबूर किया और हमें यह यकीन दिलाया कि अपने देश में जो कुछ हो रहा है, उसमें हमारी भी एक आवाज है।

कम-से-कम एक बार के लिए, हमारी राष्ट्रीय प्रतिज्ञा का पहला वाक्य सही साबित हुआ: ‘भारत मेरा देश है।’