
भारत समेत दुनिया में इस दौर में पूंजीपतियों की बैसाखी के सहारे खड़ी दक्षिणपंथी और सत्ताभोगी सरकारों का वर्चस्व हैI जाहिर है, ऐसी सरकारों के लिए लोकतंत्र, पर्यावरण संरक्षण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार जैसे मुद्दों के कोई मायने नहीं हैंI हाल में ही फ्रंटलाइन डिफेंडर्स नामक संस्था द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘ग्लोबल एनालिसिस 2020’ के अनुसार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हत्या के मामले में भारत दुनिया में 10वें स्थान पर है और इस सन्दर्भ में देश की स्थिति चीन, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, लीबिया, पाकिस्तान और सीरिया से भी बदतर हैI
Published: undefined
इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष, यानि 2020 में दुनिया के कुल 25 देशों में 331 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हत्या की गई, जबकि 2019 में 31 देशों में 304 कार्यकर्ताओं की हत्या की गई थीI वर्ष 2020 के 25 देशों में भारत भी शामिल हैI यही नहीं बल्कि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दुनिया के बहुत सारे देशों में इन कार्यकर्ताओं को पीटा जा रहा है, बेवजह हिरासत में लिया जा रहा है और उन पर बिना किसी सबूत के आपराधिक मुकदमे चलाए जा रहे हैंI
ऐसे देशों की चर्चा में भारत और चीन का विशेष उल्लेख हैI मानवाधिकार कार्यकर्ता सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय मुद्दों, नस्ल भेद और लैंगिक समानता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं, पर दुनिया भर में की गई कुल हत्याओं में से 69 प्रतिशत का सरोकार पर्यावरण संरक्षण, जमीन से जुड़े मसलों और आदिवासियों के अधिकारों से थाI कुल 331 हत्याओं में से लगभग तीन-चौथाई दक्षिण अमेरिकी देशों में की गई हैंI
Published: undefined
रिपोर्ट के अनुसार ऐसी सबसे अधिक 177 हत्याएं अकेले कोलंबिया में की गई हैंI इसके बाद क्रमवार स्थान पर फिलीपींस (25), होंडुरास (20), मेक्सिको (19), अफगानिस्तान (17), ब्राजील (16), ग्वाटेमाला (15), इराक (8), पेरू (8), भारत (6), चिली (4), इंडोनेशिया (2) और निकारागुआ (2) हैंI बोलीविया, कनाडा, चीन, कोस्टा रिका, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक कांगो, लीबिया, नेपाल, पाकिस्तान, साउथ अफ्रीका, स्वीडन, सीरिया और थाईलैंड में से प्रत्येक देश में ऐसी एक-एक हत्याएं की गई हैंI
मारे गए कुल मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में से 13 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि 28 प्रतिशत हत्याएं लैंगिक समानता के लिए आवाज उठाने वालों की हुई हैI मारे गए कुल कार्यकर्ताओं में से 6 ट्रांसजेंडर हैंI दुनिया में आदिवासियों और वनवासियों की संख्या कुल आबादी का महज 6 प्रतिशत है, पर मारे गए कुल 331 कार्यकर्ताओं में से लगभग 33 प्रतिशत कार्यकर्ता इसी वर्ग के हैंI साल 2020 में 20 मानवाधिकार कार्यकर्ता ऐसे थे जो अपने देशों में फैले भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थेI रिपोर्ट के अनुसार कोलंबिया, अफगानिस्तान और पेरू जैसे देशों में ऐसी हत्याएं साल-दर-साल बढ़ती जा रही हैंI
Published: undefined
इस रिपोर्ट की खासियत यह है कि इसमें मारे गए कुल 331 व्यक्तियों की सूचि भी प्रस्तुत की गई हैI भारत में बिहार के आरटीआई एक्टिविस्ट पंकज कुमार, ओडिशा के आरटीआई एक्टिविस्ट रंजन कुमार दास, उत्तर प्रदेश के पत्रकार शुभम मणि त्रिपाठी और पत्रकार राजेश सिंह निर्भीक, कश्मीर के वकील और एक्टिविस्ट बाबर कादरी और गुजरात के अल्पसंख्यक मामलों के वकील और एक्टिविस्ट देवजी माहेश्वरी के नाम सम्मिलित हैंI जितने भी प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता इस दौर में देश की विभिन्न जेलों में कैद किये गए हैं, लगभग सभी के नाम रिपोर्ट में उपलब्ध हैंI
इस रिपोर्ट में चीन में उइगर मुस्लिम आबादी पर किये जाने वाले जुल्म का विस्तृत उल्लेख हैI भारत के सन्दर्भ में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों कार्यकर्ताओं को तरह-तरह से प्रताड़ित करने और जेल में बंद करने की बात कही गई हैI कोविड 19 के दौर में भी बहुत सारे बुजुर्ग मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को आवश्यकता से अधिक भरी जेलों में बिना किसी सुरक्षा के बंद कर दिया गयाI इसमें 80 वर्षीय वरवर राव का नाम भी लिया गया है, जिन्हें जेल के भीतर ही कोविड19 का सामना करना पड़ाI
Published: undefined
रिपोर्ट में कहा गया है कि मानवाधिकार पर काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों को फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट का हवाला देकर बार-बार चुप कराने की साजिश की जाती हैI यही नहीं सरकार ने देश में मानवाधिकार हनन पर उठती अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की आवाजों को भी दबाने का प्रयास किया हैI पिछले वर्ष जब यह तय हो गया कि यूरोपीय संसद भारत में मानवाधिकार हनन से संबंधित प्रस्ताव को पारित करने वाली है, तब भारत सरकार ने अपनी कूटनीति के तहत इसे पारित नहीं करने दियाI भारत सरकार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को कुचलने के लिए साइबर क्राइम, आतंकवाद विरोधी कानून और अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट का व्यापक इस्तेमाल कर रही हैI
सबसे दुखद तो यह है कि भारत सरकार और विभिन्न राज्यों की सरकारें आज भी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का दमन कर रही हैं और अंतरराष्ट्रीय आवाजों को खारिज कर रही हैI वर्ष 2021 की शुरुआत से ही भारत सरकार की भाषा, मंशा और गतिविधियों से यह स्पष्ट हो चुका है कि देश में मानवाधिकार हनन बदस्तूर चलता रहेगा, आखिरकार सत्ता का यही एजेंडा है और सरकार का वजूद इसी पर टिका हैI
Published: undefined
Google न्यूज़, नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia
Published: undefined